411 REFERENCE · Wikipedia
शार्ङ्गधरसंहिता
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
सार्ङगधरसंहिता, आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके रचयिता शार्ङ्गधर हैं। इसकी रचना १२वीं शताब्दी में हुई थी। इसमें तीन खण्ड हैं - प्रथम खण्ड, मध्यम खण्ड तथा उत्तर खण्ड। श्री शार्ङ्गधराचार्य ने इस ग्रन्थ की विषयवस्तु को प्राचीन आर्ष ग्रन्थों (चरक एवं सुश्रुत संहिताओं तथा कुछ रसायनशास्त्रीय ग्रन्थों) से संग्रह करके इसमें साररूप में प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थ पर कम से कम तीन टीकाएं हैं- हरि स्वामी, सायन और कवीन्द्र के भाष्य।
यह संहिता मध्यकाल की एकमात्र संहिता है जो तत्कालीन प्रवृत्तियों एवं विचारों का प्रतिनिधित्व करती है। उस युग में राजपूतों की छत्रछाया में प्राचीन विज्ञान अपने स्वरूप की रक्षा में तत्पर था। तान्त्रिकों और सिद्धों का सम्प्रदाय भी फल-फूल रहा था। चिकित्सा में सैद्धान्तिक पक्ष दुर्बल हो गया तथा कल्पों की प्रमुखता हो गई। इसीलिए इस संहिता की रूपरेखा प्राचीन संहिताओं के आधार पर न होकर नए क्रम से नियोजित की गई है तथा कल्पानुसार ही चिकित्सा का निरूपण है। इस प्रकार मध्यकालीन प्रवृत्तियों का पूर्ण प्रतिनिधित्व ग्रन्थ होने के कारण इसका महत्व स्वयंसिद्ध है। यह स्वल्प काल में ही अपने महत्त्व के कारण लोकप्रिय हो गई। वोपदेव और हेमाद्रि जैसे विद्वान् इसकी ओर आकृष्ट हुए। दिन-प्रतिदिन यह चिकित्सा समाज के लिए पथ प्रर्दशक बन गया है। अतः मध्यकालीन लघुत्रयी में इसका नाम आदर से लिया जाता है।
आचार्य ने इसकी भाषा को सरल एवं समझने योग्य रखा है। वे इसमें अति विस्तार से बचे हैं।http://www.keralaayurvedics.com/ayurveda-history/books/sarngadhara-samhita-ancient-ayurvedic-books.html Sarngadhara Samhita 5 जुलाई 2016 https://web.archive.org/web/20160711183257/http://www.keralaayurvedics.com/ayurveda-history/books/sarngadhara-samhita-ancient-ayurvedic-books.html 11 जुलाई 2016 dead
शार्ङ्गधरसंहिता, लघुत्रयी का एक महत्वपूर्ण संहिता है। इस संहिता में आयुर्वेद की विषयवस्तु चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता से ली गयी है।
ध्यातव्य है कि दार्शनिक शार्ङ्गधर, ज्यतिर्विद शार्ङ्गधर, नाटककार शार्ङ्गधर और आयुर्वेदज्ञ शार्ङ्गधर - इस प्रकार एक ही नाम के अनेक आचार्य हुए हैं। आयुर्वेदज्ञ सार्ङ्गधर, दामोदर के पुत्र थे। शिव की पूजा का विधान कई स्थलों पर होने से यह शैव प्रतीत होते हैं। इनके अपने ग्रन्थ में इनके जीवनकाल के बारे में कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। फिर भी कुछ साक्ष्यों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है। वोपदेव ने १४वीं शती में शार्ङ्गधरसंहिता पर टीका लिखी है। नाडीविज्ञान, अफीम, रसौषधियों की प्रमुखता का समावेश उस काल के आयुर्वेदीय ग्रन्थों में प्राप्त होता है। इस ग्रन्थ की शैली सोढल (१२वीं शती) कृत गदनिग्रह पर आधारित है। अतः इनका काल 13 वीं शती का पूर्वार्ध माना जा सकता है।
संरचना एवं विषय-वस्तु
शार्ङ्गधरसंहिता में 32 अध्याय और 2600 श्लोक हैं। ग्रन्थान्त के श्लोकों में संहिता शब्द का प्रयोग हुआ है। इसमें तीन खण्ड हैं और खण्डों के फिर अध्याय हैं-
पूर्वखण्ड
इसमें सात अध्याय है सभी अध्यायों के पृथक-पृथक् वर्ण्यविषय हैं-
अध्याय 1 - परिभाषा
अध्याय 2 - भैषजाख्यानक
अध्याय 3 - नाडीपरीक्षादि-विधि
अध्याय 4 - दीपनपाचन
अध्याय 5 - कालादिकाख्यान
अध्याय 6 - आहारादिगति
अध्याय 7 - रोगगणना
मध्यमखण्ड
अध्याय 1 - स्वरस
अध्याय 2 - क्वाथ
अध्याय 3 - फाण्ट
अध्याय 4 - हिम
अध्याय 5 - कल्क
अध्याय 6 - चूर्ण
अध्याय 7 - गुटिका
अध्याय 8- लेह
अध्याय 9 - स्नेह
अध्याय 10 - सन्धान
अध्याय 11 - धातुशोधन
अध्याय 12 - रस
उत्तरखण्ड
अध्याय 1- स्नेहपान
अध्याय 2 - स्वेदविधि
अध्याय 3 - वमन
अध्याय 4- विरेचन
अध्याय 5 - स्नेहवस्ति
अध्याय 6 - निरूहण
अध्याय 7 - उत्तरवस्ति
अध्याय 8 - नस्यविधि
अध्याय 9 - धूमपान
अध्याय 10 - गाण्डूषाधिविधि
अध्याय 11 - लेपादिविधि
अध्याय 12 - शोणितविस्त्रुति
अध्याय 13 - नेत्रकर्म
महत्व एवं विशेषता
मध्यकाल की यह एक मात्र संहिता है। नाड़ी ज्ञान द्वारा रोग-परीक्षा आयुर्वेद शास्त्र की एक विलक्षण विद्या है। कुशल वैद्यों द्वारा नाड़ी में सूत (धागा) के एक सिरे को बांधकर, दूसरे सिरे को पकड़कर नाड़ी गति का ज्ञान करके, रोग एवं रोगी के सम्बन्ध में सब कुछ सत्य-सत्य बता देने की घटना प्रसिद्ध है। नाडीशास्त्र के प्राचिन आचार्यो में कणाद आदि का नाम आता हैं। इसी परम्परा क्रम में आचार्य शार्ङ्गधर भी हैं जो नाड़ी शास्त्रज्ञ कहे गये है। शार्ङ्गधर ने अपने पूर्वविर्ती समय के उपलब्ध सभी ग्रन्थों का सम्यक आलोचन एवं सूक्ष्म निरिक्षण करके एक विकसित ग्रन्थ का निमार्ण किया है। कुल ३ खण्डों में और ३२ अध्यायों सहित संपूर्ण विषयों का वर्णन किया है।
मध्य काल की यह एक मात्र संहिता है। उस काल में चिकित्सा की प्रधानता थी, तथा इस समय राजपूत और मुगल दोनों का शासन था। तांत्रिक और सिद्ध संप्रदाय अपने चर्मोत्कर्ष पर थे, अतः मध्य काल से पूर्ण प्रभावित होने के कारण यह संहिता काफी लोकप्रिय हुई थी।
इसमें वर्णित विषयों की निम्न विशेषताएं हैं-
1. राशि भेद से ऋतुओं का विभाजन।
2. नाड़ी परीक्षा का सर्वप्रथम वर्णन।
3. दीपन पाचन, शुक स्तम्भन, पुरीष स्तम्भन आदि नाम से औषधियों का वर्गीकरण तथा मात्रा आदि का विचार है।
4. दोष धातु मल की निरूक्ति, दोषों के प्रकार, उनकी प्रधानता, धातुओं का पोषण क्रम, विष्णु पादामृत या आक्सीजन का शरीर के भीतर तृप्त होना, पाचन क्रिया एवं मूत्र निर्माण का वर्णन है।
5. रक्त को भी दोष मानकर एवं रोगों के भेद का वर्णन एवं कृमियों के 20 भेदों के अतिरिक्त स्नायुक कृमि का वर्णन ।
6. रोगों का वर्गीकरण विस्तार से किया गया है, जैसे आमवात का 4 प्रकार।
7. दृष्टि रोग और गर्भ दोष के 8 भेद, स्त्री रोग के तीन भेद तथा शीतोपद्रव, शल्योपद्रव, क्षार उपद्रव आदि का वर्णन।
8. चिकित्सा में विषों का प्रयोग जैसे- वत्सनाभ आदि विषों का प्रयोग, जैसे- कृष्ण सर्प विष, विष के वेगों का वर्णन ।
9. धातुओं का शोधन, मारण, अनेक रस औषधियों का निर्माण एवं प्रयोग का वर्णन किया गया है।
10. शार्ङ्गधरसंहिता में चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट, चक्रद्रप्त और सौढ़ल के प्राचीन ग्रंथों का एवं रस शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों का संकलित रूप है।
11. प्राचीन आयुवैदिक संहिताओं से हटकर नाड़ी विज्ञान का विस्तृत वर्णन प्राप्त है।
12. अहिफेन, आकारकरभ आदि नए द्रव्यों का प्रयोग हुआ।
13. भंगा का औषधीय प्रयोग प्रारम्भ हुआ।
14. रोगों का वर्गीकरण ग्रन्थ में विस्तार से किया गया है।
15. चिकित्सा में विषों का प्रयोग अत्यधिक बढ़ा था।
16. दीपन-पाचन की स्पष्ट परिभाषाएँ उदाहरण सहित लिखी गई हैं।
17. दोष-धातु मलों का निरूपण और वायु की प्रधनता बतायी गई है।
18. रस, भस्मों और रसौषधियों का वर्णन किया गया है।
19. श्वसनक्रिया द्वारा विष्णुपदामृत (आक्सीजन) शरीर के भीतर जाकर सम्पूर्ण शरीर का पोषण तथा अग्नि को प्रज्वलित करता है। इस प्रकार वायु के संयोग से धातुओं का पोषण बताया है। रक्तज रोगों को दोषज रोगों से भिन्न माना है।
20. चिकित्साविधियों में पञ्चकर्म, धारास्वेद, शिरोवस्ति, मूर्धतैल आदि का विशेष वर्णन प्राप्त होता है।
21. कुछ रोगों के लिए विशिष्ट औषधियों तथा औषध योगों का वर्णन किया गया है।
22. वाजीकरण के विविध प्रकारों और प्रयोगों का वर्णन भी प्राप्त होता है।
टीकाएँ एवं अनुवाद
लोकप्रिय ग्रन्थ होने के कारण इसकी अनेक टीकाएँ लिखी गई जिनमें निम्न अत्यधिक प्रसिद्ध हुई हैं-
1. शार्ङ्गधरशारीर टीका
2. दीपिका - आढमल्लकृत
3. गूढार्थदीपिका - काशीरामकृत
4. आयुर्वेददीपिका - रूदभटकृत
इस संहिता की उपादेयता के कारण ही इसका हिन्दी, गुजराती, मराठी, एवं बंगला भाषाओं में अनुवाद हुआ है जो प्राप्त भी होता है।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
शार्ंगधरसंहिता (संस्कृत विकिस्रोत)
शार्ङ्गधरसंहिता (यूनिकोड देवनागरी में)
शार्ङ्गधरसंहिता
शार्ङ्गधरसंहिता (हिन्दी व्याख्या - ब्रह्मानन्द त्रिपाठी)
श्रेणी:आयुर्वेद
श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ