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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

नन्दिकेश्वर (गणेश)

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Kangitenबौद्ध काङ्गितेन(नन्दिकेश्वर) जापानी 歓喜天 (shinjitai)歡喜天 (kyūjitai) पुरुष महेश्वर पार्वती सेनायक (भ्राता; बाद में पुनर्जन्म लेकर पत्नी; अवलोकितेश्वर का अवतार) कार्तिकेय (भ्राता) किगेइतेन विघ्न, आनन्द और सिद्धि के देव 毘那夜迦(大悲胎藏大曼荼羅 仁和寺版) - Vināyaka (Ninna-ji Taizō Mandala).png एक‑देही (単身, tanshin) काङ्गितेन, परशु और मूली धारण करते हुए, १८६९ देव वैरोचन एकादशमुख अवलोकितेश्वर अमृतकुण्डलिन् सन्बो कोजिन शōतेन / शōदेन (聖天) शōतेन‑ / शōदेन‑समा (聖天様 / 聖天さま) दैशō काङ्गितेन (大聖歓喜天) काङ्गि जिज़ैतें (歓喜自在天) दैशō काङ्गि दैजिज़ैतें (大聖歓喜大自在天) दैशō काङ्गि सōशिन तेनō (大聖歓喜双身天王) नन्दै जिज़ैतें (難提自在天) ज़ōबितेन (象鼻天) बिनायक / बिनायक्य (毘那夜迦) गनाबाची / गनाहाची / गनाहत्तेई (誐那缽底) तेन्सोन (天尊) Oṃ hrīḥ gaḥ huṃ svāhā(On kiri(ku) gyaku un sowaka) कैलास पर्वत परशु, त्रिशूल सेनायक काङ्गिदान (मोदक), मूली, किन्चाकु महार्य नन्दिकेश्वर अथवा नन्दिकेश्वर (sa नन्दिकेश्वर), जिन्हें जापान में काङ्गितेन (ja 歓喜天Buhnemann 2006 19–20), काङ्कितेन, बिनायक (ja 毘那夜迦), गनाबाची (ja 誐那鉢底), गनाहाची, गनाहत्तेई, अथवा अधिक प्रचलित रूप में शोतेन / शोदेन (ja 聖天) कहा जाता है, जापानी बौद्ध परम्परा, विशेषतः शिङ्गोन तथा तेन्दाइ सम्प्रदायों, में पूजित एक देव तत्त्व हैं।Hanan 2003 245–6 प्रारम्भिक काल में काङ्गितेन का चित्रण कुछ नकारात्मक रूप में हुआ, उन्हें विघ्न उत्पन्न करने वाला तथा उन दुष्ट प्राणियों (विनायक) का अधिपति माना गया जो साधना में बाधा डालते थे। परवर्ती परम्परा में इन विनायकों और उनके अधिपति के मध्य भेद स्थापित किया गया, और काङ्गितेन को धीरे‑धीरे अवलोकितेश्वर बोधिसत्त्व (जापानी: कान्नोन) अथवा वैरोचन बुद्ध के एक रूप के रूप में समझा जाने लगा। जापान में काङ्गितेन के प्रति दृष्टि द्विविध है। एक ओर वे अत्यन्त कृपालु एवं सिद्धिदाता देवता माने जाते हैं, ऐसे देव, जो असम्भव प्रतीत होने वाली कामनाओं को भी पूर्ण कर देते हैं। यह भी कहा जाता है कि जिन व्यक्तियों का उनसे कर्म‑सम्बन्ध होता है, उनके गर्भाधान‑क्षण से ही वे उनकी अदृश्य रूप से रक्षा करते हैं और जीवनभर उनके सहचर बने रहते हैं। दूसरी ओर, यह भी माना जाता है कि वे अभी भी लौकिक वासनाओं (क्लेशों) से पूर्णतः मुक्त नहीं हैं; अतः कभी‑कभी उन्हें शीघ्र अप्रसन्न होने वाले, दण्ड देने वाले देव‑तत्त्व के रूप में भी देखा जाता है। अपने हिन्दू समकक्ष, भगवान् गणेश, के विपरीत, जिनकी मूर्तियाँ सार्वजनिक रूप से प्रतिष्ठित रहती हैं, काङ्गितेन की प्रतिमाएँ अत्यन्त पवित्र मानी जाती हैं और सामान्य जनदृष्टि से सदैव ओझल रखी जाती हैं। मन्दिरों में उनकी मूर्तियाँ आवरणों के भीतर सुरक्षित रहती हैं; उनसे सम्बन्धित अनुष्ठान केवल योग्य भिक्षुओं द्वारा, जन‑सामान्य की दृष्टि से दूर, सम्पन्न किये जाते हैं; और गृहस्थों को उनके प्रतिमात्मक रूपों की निजी पूजा से विरत रहने की सलाह दी जाती है। यद्यपि कभी‑कभी उन्हें गणेश के समान एकदन्त मुख वाले एकल पुरुष‑देव के रूप में भी चित्रित किया जाता है, परन्तु अधिक प्रचलित रूप द्वि‑देह (द्वि‑आकृति) काङ्गितेन का है, एक पुरुष और एक स्त्री, दोनों गजमुख, परस्पर आलिङ्गनबद्ध। इस रूप को सōशिन काङ्गितेन अथवा आलिङ्गन‑रूप काङ्गितेन कहा जाता है। नामावली काङ्गितेन ने अनेक नाम और विशेषताएँ उस बौद्ध देव‑तत्त्व से ग्रहण कीं जिन्हें सामान्यतः विनायक कहा जाता था। ‘विनायक’ नाम का रूपान्तर विभिन्न भाषाओं में भिन्न‑भिन्न रूपों में हुआ; इसी प्रकार ‘गणपति’ नाम का भी विविध रूपान्तरण हुआ। ‘विनायक’ शब्द का प्रयोग उन प्राणियों के एक वर्ग के लिये भी होता था जिनमें विनायक‑देव तथा उनके अनुचर सम्मिलित माने जाते थे।http://www.buddhism-dict.net/cgi-bin/xpr-ddb.pl?6b.xml+id(%27b6b61-559c-5929%27) 歡喜天 (Gaṇeśa) Digital Dictionary of Buddhism 2021-06-02Faure 2015b 81–82, 86–87 जापान में यह देवता प्रायः शोतेन / शोतेन (अर्थ: “पवित्र / श्रेष्ठ देव”) अथवा काङ्गितेन (अर्थ: “आनन्द‑प्रदाता देव”) के नाम से विख्यात है। ‘शोतेन’ उपाधि शुभ‑लाभ और सौभाग्य से सम्बन्धित है तथा सम्भवतः अवलोकितेश्वर बोधिसत्त्व के प्रति संकेत करती है, जिन्हें जापान में शो‑कान्नोन कहा जाता है और जो द्वि‑देही काङ्गितेन‑रूप के एक अङ्ग माने जाते हैं।Krishan 1999 164, 168Faure 2015b 99 ‘काङ्गितेन’ विशेषतः उनके उसी द्वि‑आकृति रूप से सम्बद्ध है, जिसे आनन्द, सम्पन्नता और कल्याण का दाता माना जाता है। भक्त‑समुदाय में उन्हें कभी‑कभी आदरपूर्वक तेन्सोन (“पूज्य देव‑तत्त्व”) भी कहा जाता है।Krishan 1999 164Faure 2015b 77 इस लेख में ‘विनायक’, ‘गणपति’, ‘शोतेन’ और ‘काङ्गितेन’—इन सभी नामों का प्रयोग इसी बौद्ध देव‑तत्त्व के लिये किया गया है; किन्तु ‘काङ्गितेन’ विशेषतः उनके द्वि‑देही रूप को सूचित करता है। ऐतिहासिक विकास और साहित्य दैत्य रूप और देव रूप अंगूठाकार|हिन्दू गणेश, गुप्त काल (चौथी-छठी शताब्दी ईस्वी), मथुरा की कला। हिन्दू परम्परा में भगवान् गणेश के उद्भव के विषय में अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं। ऐतिहासिक अभिलेखों में उनका शास्त्रीय रूप निःसन्देह रूप से लगभग चौथी–पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में प्रकट होता है। एक मत यह है कि गणेश का महत्व धीरे‑धीरे उन विनायकों के सम्बन्ध में बढ़ा, ये चार विघ्नकारी प्राणी थे जिनका उल्लेख मानव‑गृह्यसूत्र (कृष्ण यजुर्वेद की मानव शाखा का ग्रन्थ) तथा महाभारत में मिलता है।http://www.buddhism-dict.net/cgi-bin/xpr-ddb.pl?6b.xml+id(%27b6b61-559c-5929%27) 歡喜天 (Gaṇeśa) Digital Dictionary of Buddhism 2021-06-02Krishan 1999 viiThapan 1997 26–28 जहाँ हिन्दू धर्म में गणेश को मुख्यतः विघ्न‑विनाशक माना गया, वहीं बौद्ध परम्परा में प्रारम्भ में उनके विघ्न‑सर्जक और दैत्य‑राज रूप पर अधिक बल दिया गया। बौद्ध ग्रन्थों में ‘विनायक’ नाम के प्रारम्भिक प्रयोग प्रायः नकारात्मक अर्थ रखते हैं, ऐसे दुष्ट प्राणी (या प्राणियों) के लिये जो विघ्नों का कारण भी हैं और उनका प्रतीक भी।Rosseels 2015–2016 15 ताङ् काल के भिक्षु ईजिङ्ग ने महमायूरी विद्यराज्ञी सूत्र की एक टिप्पणी में विनायक को “अवरोध‑देवता” के रूप में परिभाषित किया है और यह भी लिखा है कि भारत में उनकी व्यापक पूजा होती थी। महावैरोचन तन्त्र (वैरोचनाभिसम्बोधि सूत्र) में भी विनायकों और राक्षसों जैसे दैत्य‑समूहों को मन्त्र‑शक्ति द्वारा तितर‑बितर किये जाने का वर्णन है। इसी ग्रन्थ पर भिक्षु ई‑शिङ्ग की टीका में विनायकों को “मोह‑जनित चित्त से उत्पन्न अवरोध” कहा गया है। गूढ़ (तान्त्रिक) बौद्ध साहित्य में विनायक को साधक का शत्रु माना गया है—जिसे मन्त्रों द्वारा दूर किया जाता है अथवा विशेष नैवेद्य द्वारा शांत किया जाता है। इन नैवेद्यों को साधक स्वयं ग्रहण करता है जिससे उसकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। उचित प्रकार से तुष्ट होने पर यही विनायक साधक का रक्षक‑देव बन जाता है और सभी विघ्नों को दूर करता है। विनायक—जिसे कभी‑कभी विघ्नराज भी कहा गया—तिब्बती तथा पूर्वी एशियाई बौद्ध कला में महाकाल या अचल जैसे उग्र देवताओं द्वारा रौंदे जाते हुए भी चित्रित होता है।Faure 2015b 87–88 गूढ़ (तान्त्रिक) बौद्ध धर्म के उदय और उसके नेपाल, तिब्बत तथा पूर्वी एशिया तक प्रसार के साथ विनायक का रूप अधिक सकारात्मक हुआ—अब वह दुष्ट शक्तियों का दमन करने वाला देव माना जाने लगा। तिब्बत में उन्हें विघ्न‑निवारण और धन‑प्राप्ति के लिये पूजित किया गया और कभी‑कभी उन्हें बहु‑भुजाओं वाले उग्र देव के रूप में भी चित्रित किया गया। एक नेपाली ग्रन्थ में गणपति के मन्त्रों की सूची मिलती है जो न केवल धन प्रदान करते हैं, बल्कि शत्रुओं को हानि पहुँचाने की शक्ति भी रखते हैं। चीन के दूनहुआङ् स्थित मोगाओ गुफा संख्या २८५ की भित्ति‑चित्रों में विनायक को महेश्वर (शिव) और स्कन्द के साथ बौद्ध धर्म के रक्षक के रूप में दर्शाया गया है।https://www.himalayanart.org/items/594 Achala (Buddhist Deity) – Blue, Standing Himalayan Art 2020-12-09 जापान में प्रवेश बाएँ|अंगूठाकार|देवता ईशान (इशानातेन) उनकी पत्नी इशानी, महाकला (मककारा/दाइकोकुतेन) और विनायक (बिनायक) जैसा कि पूर्वोत्तर में दर्शाया गया है (गर्भ क्षेत्र के ऊपरी बाएँ कोने में) पूर्वी एशिया के गूढ़ (ताङ्‑मी) बौद्ध धर्म के दो प्रमुख मण्डलों में भी विनायक का स्थान है। गर्भकोशधातु (वूम्ब रियल्म) मण्डल—जो महावैरोचन तन्त्र पर आधारित है—में विनायक, दिशाओं के अधिपति ईशान के गण में महाकाल के साथ स्थित है; ये दोनों देवता मूलतः हिन्दू शिव‑परम्परा से ग्रहण किये गये रूप हैं। वज्रधातु मण्डल—जो वज्रशेखर सूत्र पर आधारित है—के बाह्य खण्डों में चार दिशाओं में चार समूह हैं, प्रत्येक में पाँच देवता; प्रत्येक समूह में एक विनायक भी है। यहाँ विनायक को वैरोचन बुद्ध की उन अभिव्यक्तियों के रूप में समझा गया है जो विघ्न‑सर्जक दैत्यों को वश में करने के लिये विनायक‑रूप धारण करते हैं। इन मण्डलों में विनायक का समावेश—जिसे जापान में कुकई (७७४–८३५), शिङ्गोन बौद्ध धर्म के प्रवर्तक, लेकर आये—जापान में उनके प्रवेश का प्रमुख माध्यम बना। प्रारम्भ में, अन्य हिन्दू देवताओं की भाँति, उन्हें भी इन दोनों मण्डलों के एक गौण रक्षक‑देव के रूप में देखा गया। परन्तु हेइआन काल (७९४–११८५) तक आते‑आते विनायक एक बेस्सोन (अर्थ: “विशिष्ट/स्वतन्त्र पूज्य”) के रूप में प्रतिष्ठित हुए—अर्थात् उनके चारों ओर एक स्वतंत्र उपासना‑परम्परा विकसित हुई। शिङ्गोन परम्परा में इस उपासना‑पद्धति को भिक्षु काकुबान (१०९५–११४३) ने विकसित किया, जबकि तेन्दाइ परम्परा में इसे अन्नेन (८४१–८८९?) ने व्यवस्थित रूप दिया। सन्दर्भ 25em श्रेणी:गणेश श्रेणी:जापान श्रेणी:बौद्ध धर्म के प्रथाओं श्रेणी:हिन्दू श्रेणी:हिन्दू धर्म श्रेणी:भगवान श्रेणी:हाथी