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411 समाचार
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रामायण की विस्तृत कथा

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विकिपीडिया के लिए किसी कथा को प्रतिलिपि करना रखने योग्य लेख नहीं। विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/रामायण की विस्तृत कथासितंबर 2026 Relief_with_a_scene_in_the_Ramayana_story,_from_East_Java,_14-15th_AD_-_The_National_Museum_of_Indonesia,_Jakarta_-_20220828_1211_1318|thumb| रामायणरामायण महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित एक महाकाव्य है। इसका अवधी अनुवाद तुलसीदास ने रामचरितमानस के नाम से किया था। यहाँ संपूर्ण रामायण संक्षिप्त में लिखी गयी है। बालकांड रामचरितमानस गीताप्रेस-गोरखपुर तुलसीदास तुलसीदास जी इसकी शुरुआत गुरु, गणेश, माता पार्वती, शिव जी और सीता-राम की वंदना से करते हैं। वे कहते हैं कि यह कथा उन्होंने अपने गुरु से सुनी है और यह कथा सबसे पहले शिव जी ने पार्वती जी को सुनाई थी। शिव कथा माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान देखकर अपना शरीर त्याग दिया। फिर उन्होंने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। हजारों वर्ष कठोर तपस्या करके उन्होंने फिर से शिव जी को पति के रूप में प्राप्त किया। राम अवतार के चार कारण तुलसीदास जी चार कारण बताते हैं कि भगवान को राम के रूप में क्यों जन्म लेना पड़ा - मनु और शतरूपा ने घोर तपस्या की कि भगवान उनके पुत्र बनें। नारद मुनि को एक राजकुमारी पर मोह आ गया, विष्णु जी ने उनका रूप बिगाड़ दिया तो नारद ने विष्णु को श्राप दिया कि तुम्हें भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा। राजा प्रतापभानु ब्राह्मणों के श्राप से अगले जन्म में रावण बना। वृंदा के श्राप के कारण विष्णु को मनुष्य बनना पड़ा। श्री राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ के तीन रानियां थीं पर कोई पुत्र नहीं था। गुरु वशिष्ठ के कहने पर श्रृंगी ऋषि ने पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ से अग्नि देव खीर लेकर प्रकट हुए। उस खीर के प्रसाद से चैत्र शुक्ल नवमी के दिन चारों भाइयों का जन्म हुआ - कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न। ऋषि विश्वामित्र यज्ञ की रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण को अयोध्या से मांग कर ले गए। रास्ते में राम ने ताड़का राक्षसी का वध किया। रास्ते में ही गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या जो श्राप से पत्थर बन गई थी, राम के चरणों से फिर से मनुष्य बन गई। धनुष भंग और विवाह विश्वामित्र दोनों भाइयों को जनकपुर ले गए। वहां फुलवारी में पहली बार राम और सीता ने एक-दूसरे को देखा। राजा जनक ने प्रण लिया था कि जो शिव जी के विशाल धनुष को तोड़ेगा उसी से सीता का विवाह होगा। बड़े-बड़े राजा आए पर धनुष को हिला भी नहीं सके। तब गुरु की आज्ञा से श्री राम ने धनुष को उठाया और तोड़ दिया। धनुष टूटने की आवाज तीनों लोकों में गूंज गई। आवाज सुनकर परशुराम जी बहुत क्रोधित होकर आए। लक्ष्मण जी से उनका तीखा संवाद हुआ, फिर राम जी ने उन्हें शांत किया। फिर अयोध्या से दशरथ जी को बुलाया गया और चारों भाइयों का विवाह हुआ - राम - सीता भरत - मांडवी लक्ष्मण - उर्मिला शत्रुघ्न - श्रुतिकीर्ति और सब आनंद के साथ अयोध्या लौट आए। यहीं पर बालकांड समाप्त होता है। अयोध्या कांड रामचरितमानस गीताप्रेस-गोरखपुर तुलसीदास बालकांड में विवाह के बाद राम अयोध्या लौट आए। अयोध्या कांड वहीं से शुरू होता है। इस कांड को रामचरितमानस का हृदय कहा जाता है क्योंकि इसमें त्याग, प्रेम और धर्म सबसे ज्यादा है। राम के राज्याभिषेक की तैयारी राजा दशरथ अब बूढ़े हो गए थे। एक दिन शीशे में अपने काले बालों में सफेद बाल देखकर उन्होंने सोचा कि अब राम को राजा बना देना चाहिए। गुरु वशिष्ठ और सभी मंत्रियों ने इस बात का समर्थन किया। पूरी अयोध्या में आनंद छा गया। माताएं कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी भी बहुत खुश थीं। मंथरा और कैकेयी का षड्यंत्र देवताओं को डर लगा कि अगर राम राजा बन गए तो रावण का वध नहीं होगा। उन्होंने सरस्वती से कहा कि मंथरा की बुद्धि फेर दो। Kaikeyi_and_Manthara_-_M._V._Dhurandhar|thumb|left|मंथरा और कैकयी मंथरा कैकेयी की दासी थी। उसने कैकेयी को भड़काया - "अगर राम राजा बन गया तो कौशल्या राजमाता बनेगी और तू दासी बन जाएगी, भरत को जंगल जाना पड़ेगा।" कैकेयी के मन में लोभ आ गया। वह कोप भवन में चली गई। दशरथ जब उसे मनाने आए तो कैकेयी ने अपने दो वरदान मांगे जो दशरथ ने पहले युद्ध में उसे दिए थे। Kaikeyi_vilap|thumb|कैकयी विलाप वरदान 1 - भरत को राजा बनाया जाए। वरदान 2 - राम को 14 वर्ष का वनवास दिया जाए। यह सुनकर दशरथ मूर्छित हो गए। राम का वन गमन राम को जब यह बात पता चली तो वे दुखी नहीं हुए। उन्होंने कहा - "पिता की आज्ञा का पालन करना ही पुत्र का धर्म है।" माता कौशल्या बहुत रोईं, लक्ष्मण को बहुत क्रोध आया, पर राम ने सबको समझाया। सीता जी ने कहा मैं भी साथ जाऊंगी - "जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।" लक्ष्मण जी भी साथ जाने के लिए तैयार हो गए। राम, सीता और लक्ष्मण ने राजसी वस्त्र उतार कर मुनियों जैसे वस्त्र पहने और अयोध्या छोड़ दी। पूरी अयोध्या उनके पीछे रोती हुई चल पड़ी। श्रृंगवेरपुर और निषादराज पहले दिन वे तमसा नदी के किनारे रुके। रात में राम ने सब अयोध्यावासियों को सोता छोड़कर चुपचाप वन की ओर चले गए। फिर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे जहां निषादराज गुह उनका मित्र था। गुह ने उनका बहुत स्वागत किया। वहीं राम ने सुमंत को वापस अयोध्या भेज दिया। सुमंत का खाली रथ देखकर अयोध्या में हाहाकार मच गया। दशरथ का देहांत thumb|left|दशरथ और श्रवण कुमार राम के वियोग में राजा दशरथ ने अपना शरीर त्याग दिया। "राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥" भरत और शत्रुघ्न उस समय अपने नाना के घर केकय देश में थे। उन्हें बुलाया गया। भरत का अयोध्या आना और भरत का चरित्र भरत लौटे तो माता कैकेयी ने सोचा भरत खुश होगा, पर भरत ने कैकेयी को बहुत डांटा - "तूने पाप किया है।" भरत ने राजगद्दी लेने से साफ मना कर दिया। भरत ने गुरु वशिष्ठ से कहा कि राम को वापस लाया जाए। भरत, शत्रुघ्न, तीनों माताएं, गुरु और पूरी अयोध्या की प्रजा राम को मनाने चित्रकूट की ओर चल पड़ी। चित्रकूट में भरत मिलाप चित्रकूट में राम सीता और लक्ष्मण के साथ कुटिया में रह रहे थे। भरत वहां पहुंचे और राम के चरणों में गिर पड़े। भरत ने राम से अयोध्या वापस चलने की विनती की। लक्ष्मण को लगा भरत सेना लेकर लड़ने आए हैं, पर राम ने समझाया। राम ने कहा - "पिता की आज्ञा का पालन करना हम दोनों का धर्म है। तुम अयोध्या लौट जाओ और राज-काज संभालो।" बहुत समझाने पर भरत ने राम की चरण पादुकाएं (खड़ाऊं) मांगी। कहा - "मैं इन खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज चलाऊंगा और 14 साल बाद आप लौटोगे तो वापस दे दूंगा।" भरत ने खड़ाऊं को सिर पर रखकर अयोध्या लौट कर नंदीग्राम में कुटिया बनाकर तपस्वी की तरह राज चलाया। अरण्यकांड रामचरितमानस गीताप्रेस-गोरखपुर तुलसीदास अयोध्या कांड में भरत खड़ाऊं लेकर लौट गए। अरण्य कांड वहीं से शुरू होता है। अरण्य का मतलब है जंगल। इस कांड में राम जी का वन में राक्षसों से युद्ध और सीता हरण की कथा है। चित्रकूट से आगे की यात्रा और अत्रि आश्रम भरत के जाने के बाद राम जी को लगा चित्रकूट में अयोध्या के लोग आते-जाते रहेंगे, तो शांति भंग होगी। इसलिए वे आगे दंडक वन की ओर चल पड़े। रास्ते में सबसे पहले वे अत्रि मुनि के आश्रम में गए। वहां माता अनसूया ने सीता जी को पतिव्रत धर्म समझाया और उन्हें दिव्य वस्त्र और आभूषण दिए जो कभी मैले नहीं होते। विराध और शरभंग मुनि आगे जंगल में विराध नाम का राक्षस मिला जिसने सीता जी को पकड़ लिया। राम-लक्ष्मण ने उसे मार कर उसका उद्धार किया। फिर शरभंग मुनि मिले जो राम जी के दर्शन के लिए ही अपना शरीर नहीं त्याग रहे थे। राम के दर्शन करके उन्होंने योग अग्नि से अपना शरीर त्याग दिया। सुतीक्ष्ण, अगस्त्य मुनि और पंचवटी राम जी अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। अगस्त्य मुनि ने राम को दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए। वहीं से उन्होंने गोदावरी नदी के किनारे *पंचवटी* में कुटिया बनाकर रहना शुरू किया। पंचवटी बहुत सुंदर जगह थी। शूर्पणखा की नाक कटना Rama_Spurns_Suparnakha_by_Warwick_Goble|thumb|राम और शूर्पणखा वहीं जंगल में रावण की बहन शूर्पणखा रहती थी। वह राम के रूप पर मोहित हो गई और उसने राम से विवाह का प्रस्ताव रखा। राम ने कहा मैं तो शादीशुदा हूं, तुम लक्ष्मण के पास जाओ। लक्ष्मण ने भी मना कर दिया। गुस्से में शूर्पणखा ने सीता जी को खा जाने की कोशिश की, तब लक्ष्मण जी ने उसकी नाक और कान काट लिए। खर-दूषण और त्रिशिरा का वध शूर्पणखा रोती हुई अपने भाई खर-दूषण के पास गई। खर-दूषण 14,000 राक्षसों की सेना लेकर पंचवटी पर हमला करने आए। राम जी ने अकेले ही सबका वध कर दिया। सीता हरण खर-दूषण के वध की खबर जब रावण को मिली तो वह बहुत क्रोधित हुआ। उसने अपने मामा मारीच के साथ योजना बनाई। मारीच सोने के हिरण का रूप बनाकर कुटिया के सामने आया। सीता जी ने उस सुंदर हिरण को देखकर राम से कहा उसे पकड़ कर लाइए। राम उसके पीछे गए। Rama_exiled_to_Forest|thumb|सीता हिरण लाने को कहते हुए मारीच को राम ने बाण मारा तो मरते-मरते उसने राम की आवाज में "हा सीते ! हा लक्ष्मण !" चिल्लाया। सीता जी घबरा गईं और लक्ष्मण को जबरदस्ती राम की मदद के लिए भेज दिया। लक्ष्मण जाते-जाते कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींच गए - यही लक्ष्मण रेखा है। उन्होंने कहा इस रेखा से बाहर मत निकलना। मौका पाकर रावण साधु का भेष बनाकर आया और भिक्षा मांगने के बहाने सीता जी को लक्ष्मण रेखा से बाहर आने को कहा और उनका हरण करके पुष्पक विमान में लंका ले गया। thumb|Sita_Haran_or_the_abduction_of_Sita,_in_a_calendar_cover,_c.1950|thum|left|सीता हरण रास्ते में जटायु गिद्ध ने रावण से युद्ध किया और सीता को बचाने की कोशिश की, पर रावण ने उसके पंख काट दिए। राम लौटे तो सीता को न पाकर विलाप करने लगे और सीता को ढूंढते हुए जटायु से मिले। जटायु ने सारी बात बताई और राम की गोद में प्राण त्याग दिए। राम ने उसका अंतिम संस्कार अपने पिता की तरह किया। शबरी और पम्पा सरोवर सीता को खोजते हुए राम शबरी के आश्रम में पहुंचे। शबरी भीलनी थी और वर्षों से राम की प्रतीक्षा कर रही थी। उसने प्रेम से जूठे बेर राम को खिलाए। तुलसीदास जी लिखते हैं - कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥ फिर राम पम्पा सरोवर पहुंचे जहां उनकी मुलाकात वानरों से हुई। यहीं अरण्य कांड समाप्त होता है। किष्किंधा कांड रामचरितमानस गीताप्रेस-गोरखपुर तुलसीदास अरण्य कांड में राम जी सीता को खोजते हुए पम्पा सरोवर तक पहुँच गए थे। किष्किंधा कांड वहीं से शुरू होता है। यह सबसे छोटा कांड है, पर राम भक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण हनुमान जी से मिलन इसी कांड में होता है। हनुमान जी से पहली भेंट राम-लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत के पास घूम रहे थे। वहाँ वानर राज सुग्रीव अपने बड़े भाई बालि के डर से छिपा हुआ था। सुग्रीव ने दूर से दो सुंदर राजकुमारों को देखकर हनुमान जी से कहा - जाओ पता करो कौन हैं। हनुमान जी ब्राह्मण का भेष बनाकर आए और पूछा - आप कौन हैं? राम ने अपना परिचय दिया। फिर हनुमान जी अपने असली रूप में आ गए और राम जी के चरणों में गिर पड़े। हनुमान जी राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठाकर सुग्रीव के पास ले गए। राम-सुग्रीव मित्रता ऋष्यमूक पर्वत पर राम और सुग्रीव में मित्रता हुई। दोनों ने अग्नि को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा ली। सुग्रीव ने अपनी दुख भरी कहानी सुनाई - "मेरा बड़ा भाई बालि बहुत शक्तिशाली है। उसने मेरी पत्नी रूमा को छीन लिया और मुझे राज्य से निकाल दिया।" राम ने कहा - "मैं तुम्हारी पत्नी और राज्य वापस दिलाऊंगा, तुम मेरी सीता को खोजने में मदद करना।" सुग्रीव को विश्वास नहीं हुआ कि राम बालि को मार सकते हैं। तब राम ने 7 ताड़ के पेड़ों को एक ही बाण से छेद कर अपना बल दिखाया। बालि वध योजना के अनुसार सुग्रीव किष्किंधा गया और बालि को ललकारा। दोनों में युद्ध होने लगा। राम पेड़ के पीछे छिपे थे। दोनों भाई एक जैसे दिखते थे इसलिए राम ने बाण नहीं चलाया। सुग्रीव हार कर भाग आया। फिर राम ने सुग्रीव के गले में फूलों की माला पहना दी ताकि पहचान हो सके। सुग्रीव फिर से ललकारने गया। इस बार राम ने पेड़ के पीछे से बाण चलाकर बालि को मार दिया। बालि ने मरते समय राम को बहुत बुरा-भला कहा - "आप धर्म का प्रचार करते हैं पर मुझे छिप कर मारा।" राम ने समझाया - "छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की पत्नी और बेटी एक समान होती है। तुमने अपने छोटे भाई की पत्नी पर बुरी नजर डाली, इसलिए तुम वध के योग्य हो।" बालि ने अपना पुत्र अंगद राम को सौंप दिया और प्राण त्याग दिए। राम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया। सुग्रीव का राज में भूल जाना और लक्ष्मण का क्रोध राजा बनते ही सुग्रीव भोग-विलास में भूल गया। बरसात के 4 महीने निकल गए और उसने सीता की खोज नहीं शुरू की। thumb|left|Angry_Laxmzn|क्रोधित लक्ष्मण राम जी बहुत चिंतित हुए। लक्ष्मण को बहुत क्रोध आया और वे किष्किंधा को जलाने चल पड़े। हनुमान जी और तारा (बालि की पत्नी) ने सुग्रीव को समझाया। सुग्रीव डर कर राम के पास आया और क्षमा मांगी। सीता की खोज सुग्रीव ने पूरी वानर सेना को बुलाया - करोड़ों वानर, भालू, जामवंत, नल, नील, अंगद, हनुमान सब इकट्ठे हुए। सुग्रीव ने चारों दिशाओं में सेनाएं भेजीं। दक्षिण दिशा में जो सबसे कठिन दिशा थी, वहाँ अंगद के नेतृत्व में हनुमान, जामवंत, जाम्बवान आदि को भेजा क्योंकि इसी तरफ रावण की लंका थी। सभी वानरों को एक महीने का समय दिया गया। सम्पाती से भेंट दक्षिण दिशा की टोली खोजते-खोजते समुद्र के किनारे पहुँच गई। सब निराश होकर बैठ गए। वहीं पहाड़ पर *सम्पाती* गिद्ध रहता था, जो जटायु का बड़ा भाई था। सम्पाती ने बताया - "मैंने अपनी आँखों से देखा है, रावण सीता को लेकर समुद्र के पार लंका में गया है। वह अशोक वाटिका में बैठी हैं।" पर समस्या यह थी - 100 योजन (400 कोस) का विशाल समुद्र कौन पार करेगा? सब वानर एक-दूसरे की ओर देखने लगे। तब जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा - का चुप साधि रहा बलवाना। हनुमंत पवनसुत बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुद्धि विवेक विज्ञान निधाना॥ जैसे ही हनुमान जी को अपनी शक्ति याद आई, वे विशाल रूप में बढ़ने लगे। यहीं पर किष्किंधा कांड समाप्त होता है और आगे सुंदर कांड शुरू होता है। सुंदर कांड रामचरितमानस गीताप्रेस-गोरखपुर तुलसीदास गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि सुंदर कांड सबसे सुंदर है क्योंकि इसमें हनुमान जी की सुंदर लीला, सुंदर बुद्धि और सुंदर बल का वर्णन है। यही एक ऐसा कांड है जिसका नाम भक्त के नाम पर है - हनुमान। किष्किंधा कांड में हनुमान जी को अपनी शक्ति याद आ गई थी। सुंदर कांड वहीं से शुरू होता है। समुद्र लांघना हनुमान जी ने विशाल रूप धारण किया और "जय श्री राम" कहकर समुद्र के ऊपर उड़ गए। रास्ते में 3 रुकावटें आईं - मैनाक पर्वत ने कहा थोड़ा आराम कर लो, हनुमान जी ने प्रणाम करके कहा राम काज करे बिना आराम नहीं। सुरसा नाम की नाग माता ने रास्ता रोका, हनुमान जी ने छोटा रूप बनाकर उसके मुंह से निकल कर उसे जीत लिया। सिंहिका नाम की राक्षसी जो परछाई पकड़ कर खा जाती थी, हनुमान जी ने उसका वध कर दिया। लंका में प्रवेश और विभीषण से भेंट रात के समय हनुमान जी छोटे से मच्छर जैसा रूप बनाकर लंका में घुसे। लंका की रखवाली करने वाली *लंकिनी* ने रोका, हनुमान जी ने उसे एक मुक्का मारा और वह गिर गई। लंका में घूमते हुए हनुमान जी ने एक घर देखा जहाँ राम नाम लिखा था और तुलसी का पौधा लगा था। वह घर *विभीषण* का था। रावण का छोटा भाई, पर राम भक्त। विभीषण से हनुमान जी मिले। विभीषण ने बताया - "सीता जी अशोक वाटिका में हैं, बहुत दुखी हैं।" अशोक वाटिका में सीता जी के दर्शन हनुमान जी अशोक वाटिका में गए। वहाँ सीता माता एक पेड़ के नीचे बैठी रो रही थीं। चारों ओर राक्षसियां पहरा दे रही थीं। तभी रावण वहाँ आया और सीता को डराने लगा - "तू मेरी पत्नी बन जा, नहीं तो मार दूंगा।" सीता जी ने तिनके की ओट लेकर कहा - "तू परछाई भी नहीं छू सकता।" रावण के जाते ही *त्रिजटा* नाम की एक अच्छी राक्षसी ने सब राक्षसियों को अपना सपना सुनाया कि राम आएंगे और लंका का नाश होगा। जब सब राक्षसियां चली गईं, तब हनुमान जी पेड़ से नीचे उतरे। उन्होंने राम जी की अंगूठी सीता जी के सामने गिरा दी। सीता जी ने अंगूठी देखी तो चौंक गईं। तब हनुमान जी ने मीठी वाणी में सारी कथा सुनाई और कहा - "मैं राम दूत हूँ।" सीता जी को विश्वास नहीं हुआ, तब हनुमान जी ने अपना विशाल रूप दिखाया और फिर छोटा रूप बन लिया। सीता जी ने आशीर्वाद दिया - "अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥" हनुमान जी ने कहा माता भूख लगी है, तो सीता जी की आज्ञा से उन्होंने वाटिका के फल खाए। लंका दहन फल खाते देखकर राक्षसों ने हनुमान जी को पकड़ने की कोशिश की, हनुमान जी ने बहुत से राक्षसों को मार दिया। फिर रावण के बेटे *अक्षय कुमार* को भी मार दिया। अंत में *मेघनाद* ने ब्रह्मास्त्र चलाकर हनुमान जी को बंदी बना लिया। हनुमान जी को रावण की सभा में ले जाया गया। हनुमान जी ने निर्भय होकर रावण को समझाया - "राम से बैर छोड़ दे और सीता को लौटा दे।" thumb|Hanuman_and_Ravana_in_Tholu_Bommalata,_the_shadow_puppet_tradition_of_Andhra_Pradesh,_India|हनुमान और रावण रावण ने क्रोध में उनकी पूंछ में आग लगाने को कहा। राक्षस हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा और तेल लपेट कर आग लगाने लगे। हनुमान जी ने छोटा रूप बनाया तो कपड़ा खत्म, बड़ा रूप बनाया तो और कपड़ा लगाना पड़ा। पूरी लंका का कपड़ा और तेल खत्म हो गया। thumb|Lanka_Dahan|लंका दहन फिर हनुमान जी ने एक घर से दूसरे घर कूद कर *पूरी सोने की लंका जला दी*। सिर्फ विभीषण का घर नहीं जलाया। और समुद्र में पूंछ बुझा कर सीता जी से वापस विदा ली और चूड़ामणि लेकर लौट आए। वापस किष्किंधा आना समुद्र के इस पार सभी वानर हनुमान जी का इंतजार कर रहे थे। हनुमान जी ने आकर कहा - "सियावर रामचंद्र की जय! सीता माता मिल गईं।" सब वानर खुशी से कूदने लगे। वापस आकर सुग्रीव के बगीचे *मधुवन* के सारे फल खा लिए। फिर राम जी के पास आकर हनुमान जी ने सीता जी की चूड़ामणि दी और कहा - "माता बहुत दुख में हैं, हर समय आपका ही नाम जप रही हैं।" राम जी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने हनुमान जी को गले लगा लिया। यहीं सुंदर कांड समाप्त होता है। लंका कांड रामचरितमानस गीताप्रेस-गोरखपुर तुलसीदास इस कांड को युद्ध कांड भी कहते हैं। सुंदर कांड में हनुमान जी सीता की खबर ले आए थे। लंका कांड वहीं से शुरू होता है - अब राम जी की सेना लंका पर चढ़ाई करेगी। समुद्र पर सेतु बनाना (रामसेतु) राम जी की वानर सेना समुद्र के किनारे पहुंची। विशाल समुद्र देखकर सब चिंतित हो गए। राम जी ने समुद्र से तीन दिन तक प्रार्थना की कि हमें रास्ता दे दो, पर समुद्र नहीं माना। thumb|>Adams_Bridge_aerial|राम सेतु तब राम जी को क्रोध आ गया और उन्होंने अग्नि बाण निकाला। समुद्र देव डर कर ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए और कहा - "आपके सेना में नल और नील नाम के दो वानर हैं जिन्हें ऋषि का वरदान है कि उनके छूने से पत्थर भी तैरेंगे। आप उनसे पुल बनवा लीजिए।" फिर वानर सेना ने बड़े-बड़े पत्थर, पेड़ ला-ला कर समुद्र पर पुल बनाया। "जय श्री राम" लिखे पत्थर तैरने लगे। 5 दिन में 100 योजन का पुल बन गया। यही *रामसेतु* है। अंगद का दूत बनकर जाना पुल पार करके राम जी ने सुबेल पर्वत पर डेरा डाला। पहले युद्ध टालने के लिए राम ने अंगद को दूत बनाकर रावण के पास भेजा। अंगद ने रावण की सभा में जाकर उसे बहुत समझाया - "अभी भी समय है, सीता को लौटा दे।" रावण नहीं माना और घमंड में बोला मैं शिव का भक्त हूँ। तब अंगद ने अपना पैर जमीन में जमा दिया और कहा - "अगर कोई इस पैर को हिला दे तो राम हार मान कर लौट जाएंगे।" रावण के बड़े-बड़े योद्धा आए, कोई पैर हिला नहीं सका। अंत में रावण खुद आया तो अंगद ने पैर हटा लिया और कहा - "तू मेरे पैर क्यों पकड़ता है, जा राम के चरण पकड़, तेरा कल्याण होगा।" रावण बहुत शर्मिंदा हुआ। भयंकर युद्ध शुरू अब युद्ध शुरू हुआ। पहले दिन *मेघनाद* ने मायावी युद्ध किया। उसने ब्रह्मास्त्र और नागफांस चलाई जिससे राम-लक्ष्मण मूर्छित हो गए। तब *गरुड़* जी आए और नागफांस काटी। फिर रावण के भाई *कुंभकर्ण* को जगाया गया। वह 6 महीने सोता था और 6 महीने जागता था। वह इतना बड़ा था कि हजारों वानरों को एक साथ खा जाता था। राम जी ने उसका वध किया। लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध और संजीवनी बूटी मेघनाद ने छिप कर लक्ष्मण जी पर शक्ति बाण चलाया। लक्ष्मण मूर्छित हो गए। पूरी सेना में हाहाकार मच गया। वैद्य *सुषेण* ने कहा - "हिमालय पर द्रोण पर्वत है, वहां संजीवनी बूटी है, सूरज उगने से पहले आ जाए तो लक्ष्मण बचेंगे।" हनुमान जी रातों-रात हिमालय गए। वहां बूटी को पहचान नहीं पाए तो पूरा *पहाड़ ही उठा लाए*। सुषेण ने बूटी पिला कर लक्ष्मण को ठीक किया। फिर लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया। मेघनाद का वध बहुत कठिन था क्योंकि वह अतुल्य मायावी था। रावण वध अब रावण खुद युद्ध में आया। दोनों तरफ से भयंकर युद्ध हुआ। रावण के 10 सिर कटते थे और फिर से आ जाते थे। रावण के नाभि में अमृत था, इसलिए वह मर नहीं रहा था। विभीषण ने यह रहस्य राम जी को बताया। तब राम जी ने 31 बाण चलाए - 10 बाणों से 10 सिर काटे, 20 बाणों से 20 भुजाएं काटीं और आखिरी एक बाण नाभि के अमृत कुंड में मारा। रावण "राम-राम" कहता हुआ जमीन पर गिर पड़ा। तुलसीदास जी लिखते हैं कि रावण का तेज राम जी में समा गया, क्योंकि वह रात-दिन राम से बैर करता था तो उसे अंत में मोक्ष मिल गया। सीता की अग्नि परीक्षा और अयोध्या वापसी रावण के मरने के बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया। सीता जी को अशोक वाटिका से लाया गया। सीता जी ने अग्नि परीक्षा दी क्योंकि लोग कहेंगे कि वह रावण के यहां रही हैं। अग्नि देव ने असली सीता को प्रकट किया, नकली सीता जो माया की थी वह अग्नि में समा गई। फिर राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान और पूरी वानर सेना पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या लौटे। रास्ते में राम जी सीता को वे सारी जगहें दिखाते लाए जहां-जहां वे वन में रहे थे। भरत 14 साल से नंदीग्राम में तपस्या कर रहे थे। राम के आने की खबर सुनकर वे दौड़े। राम जी का राजतिलक हुआ और रामराज्य शुरू हुआ। यहीं लंका कांड समाप्त होता है। उत्तर कांड - रामचरितमानस रामचरितमानस गीताप्रेस-गोरखपुर तुलसीदास लंका कांड में राम जी का राज्याभिषेक हो गया। उत्तर कांड वहीं से शुरू होता है। इसका नाम उत्तर कांड इसलिए है क्योंकि यह राम जी के जीवन के उत्तरकाल यानी बाद की कथा है। इसे ज्ञान का कांड भी कहा जाता है। रामराज्य का वर्णन राम जी के राजा बनते ही अयोध्या में रामराज्य आ गया। तुलसीदास जी लिखते हैं - दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि व्यापा॥ यानि राम के राज्य में किसी को कोई दुख नहीं था। कोई रोग नहीं, कोई गरीबी नहीं, सब लोग प्रेम से रहते थे। सभी पेड़ समय पर फल देते थे, कोई अपराध नहीं होता था। thumb|2016_Singapur,_Rochor,_Świątynia_Sri_Krishnan_(21)|राम दरबार राम जी रोज दरबार लगाते, सबका न्याय करते और शाम को हनुमान जी और भाइयों के साथ कथा सुनते। हनुमान जी और भरत को ज्ञान देना एक बार भरत जी के मन में सवाल आया कि राम जी के चरणों में इतना प्रेम कैसे बना रहे। राम जी ने भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और हनुमान जी को भक्ति का ज्ञान दिया। उन्होंने कहा - "सबसे बड़ा धर्म भक्ति है। जो संतों की संगति करता है, उसे ही मेरी भक्ति मिलती है।" काकभुशुण्डि और गरुड़ संवाद गरुड़ जी (जो विष्णु जी के वाहन हैं) को एक बार संदेह हो गया कि राम तो भगवान हैं तो उन्हें नागफांस में कैसे बंधना पड़ा। उनका संदेह दूर करने के लिए शिव जी ने उन्हें काकभुशुण्डि जी के पास भेजा। काकभुशुण्डि जी कौवे के रूप में रहते थे पर बहुत बड़े ज्ञानी थे। उन्होंने गरुड़ जी को अपनी पूरी कहानी सुनाई - "मैं पिछले जन्म में अयोध्या का ब्राह्मण था, शिव जी का भक्त था पर विष्णु जी से नफरत करता था। इसलिए मुझे श्राप से कौवा बनना पड़ा। फिर मैं राम भक्त बना। मैंने कई बार शरीर बदले, कई कल्प देखे, पर राम भक्ति नहीं छोड़ी।" काकभुशुण्डि जी ने गरुड़ जी को समझाया कि राम ही परब्रह्म हैं। वे मनुष्य रूप में लीला कर रहे हैं। उन्होंने 7 प्रश्नों के उत्तर दिए जो ज्ञान की सबसे ऊंची बातें हैं - सबसे बड़ा पाप कौन सा? - किसी को दुख देना सबसे बड़ा पुण्य? - परोपकार सबसे बड़ा दुख? - दरिद्रता सबसे बड़ा सुख? - संत मिलन संत और असंत में क्या फर्क है? माया क्या है? भक्ति कैसे मिलती है? कलियुग का वर्णन काकभुशुण्डि जी ने बताया कि कलियुग में धर्म कैसे गिर जाएगा। तुलसीदास जी ने इस कांड में कलियुग का ऐसा वर्णन किया है जो आज बिल्कुल सच लगता है - मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥ दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ। यानि कलियुग में लोग दिखावे को ही धर्म समझेंगे, जो ज्यादा बोलेगा वही पंडित कहलाएगा, पति-पत्नी में प्रेम कम होगा, लोग माता-पिता की नहीं सुनेंगे। ज्ञान-भक्ति-वैराग्य और राम महिमा अंत में तुलसीदास जी कहते हैं कि इस संसार से पार होने का एक ही उपाय है - राम नाम। कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥ जो व्यक्ति राम का नाम लेता है, वह इस भवसागर से पार हो जाता है। शिव जी कहते हैं - उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥ यानि हे पार्वती, मेरा अपना अनुभव है कि हरि का भजन ही सत्य है, बाकी सारा संसार सपना है। यहीं पर रामचरितमानस समाप्त होता है। तुलसीदास जी लिखते हैं कि यह कथा शिव जी ने पार्वती को, काकभुशुण्डि ने गरुड़ को, और याज्ञवल्क्य ने भरद्वाज को सुनाई और वही कथा मैंने लिखी है। उत्तर कांड - वाल्मीकि रामायण रामायण गीताप्रेस-गोरखपुर वाल्मीकि यह बात ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि आप अब तक जो 6 कांड पढ़ रहे थे - बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, लंका - वह मुख्य रामायण है। वाल्मीकि रामायण का उत्तर कांड तुलसीदास के उत्तर कांड से बिल्कुल अलग है। तुलसीदास जी ने उत्तर कांड में ज्ञान-भक्ति बताई, पर वाल्मीकि जी के उत्तर कांड में राम जी के राजा बनने के बाद की पूरी जीवन कथा है, जो बहुत गंभीर और दुखद भी है। रामराज्य और सीता का निर्वासन राम के राजा बनने के बाद अयोध्या में सब खुश थे। एक दिन राम जी को गुप्तचरों से पता चला कि नगर के कुछ लोग सीता के बारे में बात कर रहे हैं - "सीता एक साल रावण के घर में रही हैं, हम अपनी पत्नियों को कैसे स्वीकार कर लें?" एक धोबी ने अपनी पत्नी से कहा था - "मैं राम जैसा नहीं हूं जो पर-स्त्री के साथ रही पत्नी को रख ले।" राम जी को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। राजा के लिए प्रजा की बात सबसे बड़ी होती है। उन्होंने प्रजा के मन का संदेह दूर करने के लिए, कठोर हृदय करके लक्ष्मण को बुलाया और कहा - "सीता को कल सुबह वन में छोड़ आओ।" लक्ष्मण रोते हुए सीता को, जो उस समय गर्भवती थीं, वाल्मीकि आश्रम के पास छोड़ आए। सीता बहुत रोईं पर लक्ष्मण मजबूर थे। वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश का जन्म वन में सीता जी को महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम में ले आए। वहीं सीता ने दो जुड़वा पुत्रों को जन्म दिया - *लव और कुश*। वाल्मीकि जी ने ही दोनों बच्चों को वेद, शास्त्र, संगीत और युद्ध विद्या सिखाई। वाल्मीकि जी ने ही उस समय रामायण लिखी थी, तो उन्होंने लव-कुश को पूरी रामायण कंठस्थ करवा दी। अश्वमेध यज्ञ और लव-कुश से भेंट इधर राम जी ने अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ के लिए उन्होंने सोने की सीता की मूर्ति बनवाई, क्योंकि अब दूसरा विवाह करना धर्म के विरुद्ध था। यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया गया। वह घोड़ा घूमते-घूमते वाल्मीकि आश्रम के पास पहुंचा। लव-कुश ने उस घोड़े को पकड़ लिया। thumb|left|लव - कुश द्वारा पकडा गया अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा। राम की पूरी सेना - भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान, सुग्रीव - कोई भी उस बालकों को हरा नहीं सका। अंत में राम खुद युद्ध करने आए। तब वाल्मीकि जी बीच में आए और बताया - "ये दोनों आपके ही पुत्र हैं।" सीता की अंतिम परीक्षा और भू-प्रवेश राम ने सीता को वापस बुलाया और कहा - "अगर तुम पवित्र हो तो प्रजा के सामने अपनी पवित्रता साबित करो।" सीता जी को बहुत दुख हुआ। इतने साल वन में दुख झेलने के बाद फिर से परीक्षा। सीता जी ने सबके सामने कहा - "यदि मैंने मन, वचन, कर्म से केवल राम का ही चिंतन किया हो, तो हे धरती माता, तुम मुझे अपनी गोद में ले लो।" तभी धरती फटी और धरती माता प्रकट हुईं, उन्होंने सीता को गोद में लिया और सीता धरती में समा गईं - इसे *भू-प्रवेश* कहते हैं। राम रोते रह गए, पर सीता चली गईं। राम का परमधाम गमन सीता के जाने के बाद राम ने बहुत सालों तक राज किया। बाद में लव को उत्तर कौशल और कुश को दक्षिण कौशल का राजा बना दिया। एक दिन यमराज साधु के भेष में राम से मिलने आए और कहा - "जब तक मैं बात करूं, कोई अंदर न आए, जो आएगा उसे मृत्यु दंड मिलेगा।" लक्ष्मण द्वार पर पहरा दे रहे थे। उसी समय दुर्वासा ऋषि आए और अंदर जाने की जिद करने लगे कि नहीं जाने दोगे तो मैं अयोध्या को श्राप दे दूंगा। लक्ष्मण को धर्म संकट में आकर अंदर जाना पड़ा। राम ने अपने वचन के कारण लक्ष्मण को त्याग दिया। लक्ष्मण ने सरयू नदी में जाकर देह त्याग दी। लक्ष्मण के बाद राम ने भी सरयू नदी में जाकर जल समाधि ले ली और वैकुंठ को चले गए। उनके साथ भरत और शत्रुघ्न ने भी देह त्याग दी। ग्रंथसूची