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हॉवित्जर
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हॉवित्जर (Howitzer) 300px तोपखाना चेक गणराज्य (ऐतिहासिक 'Houfnice' के रूप में) 15वीं सदी से वर्तमान तक ब्रीच-लोडिंग (Breech-loading) उच्च कोण (आमतौर पर 45° से अधिक) घुमावदार (High-angle trajectory) टोव्ड, स्व-चालित
हॉवित्जर (Howitzer) एक विशेष प्रकार की लंबी दूरी की भारी तोप है। तकनीकी दृष्टि से, इसे एक पारंपरिक बंदूक या तोप और एक 'मोर्टार' के बीच की श्रेणी में रखा जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका घुमावदार प्रक्षेपवक्र है। पारंपरिक तोपें जहां सीधे निशाने पर कम ऊंचाई पर फायर करती हैं, वहीं हॉवित्जर के गोले को आसमान में बहुत ऊंचे कोण (अक्सर 45 डिग्री से अधिक) पर दागा जाता है, ताकि वह एक परवलयाकार रास्ता तय करता हुआ सीधे दुश्मन के सिर पर गिरे। इसका उपयोग मुख्य रूप से अप्रत्यक्ष गोलीबारी के लिए किया जाता है—अर्थात उन लक्ष्यों पर हमला करना जो सीधी नज़र में नहीं हैं, जैसे पहाड़ों, इमारतों या खाइयों के पीछे छिपे दुश्मन।Turnbull:
शब्द की उत्पत्ति और इतिहास
'हॉवित्जर' शब्द की उत्पत्ति चेक भाषा के शब्द "Houfnice" (हौफनिस) से हुई है। इसका पहली बार उपयोग 15वीं शताब्दी (1420-1430 के दशक) में बोहेमिया (वर्तमान चेक गणराज्य) के 'हुसाइट युद्धों' के दौरान किया गया था। शुरुआती हौफनिस एक छोटी नली वाली तोप थी, जिसका उपयोग दुश्मन की पैदल सेना के घने संरचनाओं पर भारी पत्थर या छर्रे दागने के लिए किया जाता था।
17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान, यूरोपीय सेनाओं ने किलों और दीवारों के पीछे छिपे दुश्मनों पर विस्फोटक गोले दागने के लिए इसका आधुनिक स्वरूप विकसित किया। प्रथम विश्व युद्ध में खाइयों के युद्ध ने हॉवित्जर को तोपखाने का सबसे महत्वपूर्ण हथियार बना दिया।Kinard Jeff Artillery: An Illustrated History of Its Impact https://archive.org/details/artilleryillustr0000kina ABC-CLIO 2007 978-1851095568 140-145
तकनीकी विशेषताएँ
हॉवित्जर का वर्गीकरण मुख्य रूप से इसकी नली की लंबाई और इसके कैलिबर के अनुपात पर निर्भर करता है।
नली की लंबाई: ऐतिहासिक रूप से, हॉवित्जर की नली की लंबाई उसके कैलिबर की 15 से 25 गुना होती थी। हालाँकि, आधुनिक हॉवित्जर (जैसे 155mm कैलिबर की तोपें) की नली बहुत लंबी (कैलिबर की 39 से 52 गुना तक) हो सकती है, जिससे उनकी मारक क्षमता 30 से 40 किलोमीटर तक पहुँच जाती है।
मज़ल वेलोसिटी: हॉवित्जर की 'मज़ल वेलोसिटी' (नली से गोले के निकलने की गति) पारंपरिक तोपों की तुलना में थोड़ी कम होती है, लेकिन अलग-अलग मात्रा में बारूद का उपयोग करके इसकी मारक दूरी को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
हॉवित्जर के प्रमुख प्रकार
आधुनिक सैन्य बेड़े में हॉवित्जर को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
टोव्ड हॉवित्जर: इन्हें खींचने के लिए ट्रकों या भारी वाहनों की आवश्यकता होती है। इन्हें हेलीकॉप्टर द्वारा भी उठाया जा सकता है (जैसे अमेरिका की M777 अल्ट्रा-लाइटवेट हॉवित्जर)।
स्व-चालित हॉवित्जर: ये तोपें टैंक की तरह ट्रैक्स या भारी पहियों पर स्थापित होती हैं और अपने इंजन से खुद चल सकती हैं। ये दागो और भागो रणनीति के लिए बेहतरीन होती हैं, जिससे दुश्मन के रडार इन्हें ट्रैक करके जवाबी हमला न कर सकें। इसके उदाहरणों में जर्मनी की PzH 2000 और भारत की K9 वज्र-T शामिल हैं।Foss Christopher F. Jane's Armour and Artillery 2011-2012 https://archive.org/details/janesarmourartil0000unse IHS Jane's 2011 978-0710629609 610-615Diasporas: Building of Empire in the Middle East and Europe (550 BCE-1500 CE)
भारतीय सेना और कारगिल युद्ध में भूमिका
भारत के सैन्य इतिहास में हॉवित्जर का एक विशेष और भावनात्मक स्थान है। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, भारतीय सेना की बोफोर्स 155mm हॉवित्जर ने युद्ध का रुख मोड़ने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाई थी। इसकी सटीक उच्च-प्रक्षेपवक्र मारक क्षमता ने हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने पाकिस्तानी बंकरों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था, जहाँ सीधी मार करने वाली तोपें बेअसर थीं।
वर्तमान में, भारतीय तोपखाने में स्वदेशी रूप से विकसित 'धनुष' और अमेरिका से आयातित 'M777' हॉवित्जर सेना की मुख्य रीढ़ हैं।Malik V. P. Kargil: From Surprise to Victory https://archive.org/details/kargilfromsurpri0000mali HarperCollins Publishers India 2006 978-8172236359 240-245
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
भारतीय सेना (Indian Army) - तोपखाना निदेशालय