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पूर्वी चम्पारण जिला
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पूर्वी चंपारण बिहार के तिरहुत प्रमंडल का एक जिला है। चंपारण को विभाजित कर 1971 में बनाए गए पूर्वी चंपारण का मुख्यालय मोतिहारी है। चंपारण का नाम चंपा + अरण्य से बना है जिसका अर्थ होता है- चम्पा के पेड़ों से आच्छादित जंगल। पूर्वी चम्पारण के उत्तर में नेपाल तथा दक्षिण में मुजफ्फरपुर, पूर्व में शिवहर और सीतामढ़ी तथा पश्चिम में पश्चिमी चम्पारण जिला स्थित है। जिले के प्रमुख नगरों में मोतिहारी, तथा मेहसी अपने शाही लीची उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है |
thumb|Artificial pearl from Mehsi, India
मेहसी अपने मोती वाले बटन उद्योग के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर है। इसे भारत में सीप के खोल (ऑयस्टर-शेल) से बटन बनाने वाले अनोखे उद्योगों में से एक माना जाता है यह उद्योग 20वीं सदी की शुरुआत में विकसित हुआ और बाद में सीप के खोल से बटन बनाने का एक महत्वपूर्ण भारतीय केंद्र बन गया।मेहसी बटन उद्योग https://eastchamparan.nic.in/mehsi-button-industry/ पूर्वी चंपारण जिला, बिहार सरकार जिला प्रशासन, पूर्वी चंपारण; राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केंद्र 7 अगस्त 2026
पूर्वी चंपारण जिला
26 21 28 N 85 6 49 E बिहार पूर्वी चंपारण सांसद राधामोहन सिंह 2011 50,99,371 1,285 3968 91 (06252) 845 xxx BR eastchamparan.bih.nic.in Forest, Bhimalpur.jpg भीमलपुर का वन, पूर्वी चंपारण
यह भी देखें
22em
जिले के प्रमुख नगर निकाय
मोतिहारी
रक्सौल
चकिया
मेहसी
बिहार के जिले
ऐतिहासिक प्रशासनिक केंद्र
मेहसी (ऐतिहासिक रूप से मिहसी या Mihsī) चंपारण क्षेत्र का एक ऐतिहासिक प्रशासनिक एवं राजस्व केंद्र था। मुगल काल में आइन-ए-अकबरी में Parganah Mihsí, Sirkár Champáran दर्ज है। इससे मिहसी का सरकार चंपारण के अंतर्गत एक स्वतंत्र परगना के रूप में प्रशासनिक अस्तित्व प्रमाणित होता है।Abu'l-Fazl
Ain-i-Akbari
Asiatic Society
1891
2
Sarkar Champaran
18वीं शताब्दी में मिहसी चंपारण की राजस्व व्यवस्था में सक्रिय प्रशासनिक केंद्र था। 5 अगस्त 1769 के फारसी पत्राचार में लाल बिशन लाल, पेशकार ऑफ मिहसी (Peshkar of Mihsi) का स्पष्ट उल्लेख है। यह पत्र चंपारण के राजस्व संग्रह और भुगतान से संबंधित था।Calendar of Persian Correspondence: 5 August 1769
https://famineanddearth.exeter.ac.uk/displayhtml.html?id=fp_00445_en_calendarofpersiancorrespondence_2
University of Exeter
6 October 2026
1765 में चंपारण अंग्रेजों को प्राप्त होने के बाद मेहसी का प्रशासनिक महत्व बना रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी के चंपारण पर अधिकार प्राप्त करने के समय मेहसी चंपारण का सदर तथा मुख्य सिविल स्टेशन (Sadar or chief civil station) था। 1938 के सरकारी Bihar and Orissa District Gazetteers: Champaran में मेहसी की यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज है।O'Malley
L. S. S.
Bihar and Orissa District Gazetteers: Champaran
Government of Bihar and Orissa
Patna
1938
168 https://dspace.gipe.ac.in/xmlui/bitstream/handle/1/38302/GIPE-017779.pdf?sequence=3
मेहसी में मुंसिफ की अदालत (Munsif's Court) भी स्थापित थी और कुछ समय तक वहीं कार्य करती थी। 1938 के गजेटियर में पुराने न्यायालय भवन और एक यूरोपीय बंगले के अवशेषों का उल्लेख किया गया है। इससे मेहसी के औपनिवेशिक काल में न्यायिक एवं प्रशासनिक महत्व की पुष्टि होती है।
मेहसी का संबंध ऐतिहासिक मेहसी परगना से था। सरकारी गजेटियर के अनुसार मेहसी बस्ती ने अपने नाम से परगना मेहसी को नाम दिया और यह परगना अकबर के शासनकाल में माहरूम खान को प्रदान किया गया था। मेहसी लंबे समय तक एक मुस्लिम काजी का निवास-स्थान भी रहा।
1771 में चंपारण की राजनीतिक और जमींदारी व्यवस्था में मेहसी और बाबरा के परगने अलग प्रशासनिक इकाइयों के रूप में दर्ज हैं। इन्हें श्रीकृष्ण सिंह और अवधूत सिंह को प्रदान किया गया था। 1791 के Decennial Settlement में मेहसी और बाबरा से संबंधित व्यवस्था को पुनः दर्ज किया गया और 1793 के Permanent Settlement में इसकी पुष्टि हुई।Prasad
Rajendra
Satyagraha in Champaran
Servants of India Society
1928
History of Champaran
https://vvgnli.gov.in/sites/default/files/Satyagraha%20in%20Champaran.pdf
https://web.archive.org/web/20250315174956/https://vvgnli.gov.in/sites/default/files/Satyagraha%20in%20Champaran.pdf
15 मार्च 2025
5 अक्तूबर 2026
dead
19वीं शताब्दी में भी मिहसी का प्रशासनिक नाम और क्षेत्रीय स्थिति कायम रही। 1885 में जॉन बीम्स ने मिहसी को चंपारण से संबंधित महालों में सूचीबद्ध किया।Beames
John
Notes on the History and Geography of Bihar
Journal of the Asiatic Society of Bengal
1885
काल प्रशासनिक केंद्र स्थिति / भूमिका प्रमाण मुगल काल मेहसी (मिहसी) सरकार चंपारण के अंतर्गत मिहसी परगना आइन-ए-अकबरी 5 अगस्त 1769 मेहसी (मिहसी) मिहसी का पेशकार राजस्व प्रशासन में कार्यरत फारसी पत्राचार ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रारंभिक काल मेहसी चंपारण का सदर और मुख्य सिविल स्टेशन (Sadar or Chief Civil Station) 1938, Bihar and Orissa District Gazetteers: Champaran ईस्ट इंडिया कंपनी/प्रारंभिक ब्रिटिश काल मेहसी मुंसिफ की अदालत तथा यूरोपीय अधिकारियों का बंगला 1938, Bihar and Orissa District Gazetteers: Champaran 1771–1793 मेहसी परगना चंपारण की ऐतिहासिक राजस्व एवं जमींदारी व्यवस्था का प्रमुख परगना Satyagraha in Champaran 19वीं शताब्दी मेहसी (मिहसी) चंपारण के ऐतिहासिक महालों में दर्ज J. Beames, 1885 1866 मोतिहारी नवगठित चंपारण जिले का मुख्यालय सरकारी चंपारण जिला इतिहास / गजेटियर 1866–1972 मोतिहारी चंपारण जिले का जिला मुख्यालय सरकारी जिला इतिहास; Imperial Gazetteer 1972 मोतिहारी चंपारण के विभाजन के बाद पूर्वी चंपारण का मुख्यालय भारत सरकार/पूर्वी चंपारण जिला प्रशासन वर्तमान मोतिहारी पूर्वी चंपारण जिले का वर्तमान जिला मुख्यालय पूर्वी चंपारण जिला प्रशासन
मोतिहारी के बारे में सबसे सीधा सरकारी प्रमाण: पूर्वी चंपारण जिला प्रशासन के अनुसार चंपारण जिले का निर्माण 1866 में हुआ और वर्तमान पूर्वी चंपारण का मुख्यालय मोतिहारी है।
वर्तमान जिला प्रशासन की पर्यटन-सूचना भी स्पष्ट रूप से कहती है कि ब्रिटिशों द्वारा चंपारण को जिला बनाए जाने पर मोतिहारी को मुख्यालय बनाया गया, और 1972 में पश्चिमी चंपारण बनने के बाद मोतिहारी पूर्वी चंपारण का मुख्यालय बना रहा।
एक पुराने Imperial Gazetteer of India में भी मोतिहारी को चंपारण के headquarters के रूप में दर्ज किया गया है।
इसलिए Wikipedia में सबसे सटीक ऐतिहासिक distinction यह रहेगा:
«मेहसी — ईस्ट इंडिया कंपनी के चंपारण-अधिग्रहण के समय “Sadar or Chief Civil Station”
मोतिहारी — 1866 में चंपारण जिला बनने के बाद जिला मुख्यालय»
इससे दोनों की भूमिकाएँ आपस में मिलती नहीं हैं और Mehsi की पुरानी प्रशासनिक भूमिका तथा Motihari की बाद की जिला-राजधानी भूमिका दोनों स्पष्ट रहती हैं।
इस प्रकार ऐतिहासिक अभिलेखों में मेहसी केवल एक सामान्य ग्रामीण बस्ती के रूप में नहीं, बल्कि चंपारण की ऐतिहासिक प्रशासनिक और राजस्व व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में दर्ज है। विशेष रूप से 1938 के सरकारी चंपारण गजेटियर में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारंभिक अधिग्रहण के समय मेहसी को “Sadar or chief civil station of Champaran” कहा गया है। इसके अतिरिक्त यहां मुंसिफ अदालत और यूरोपीय अधिकारियों के बंगले भी दर्ज हैं।Calendar of Persian Correspondence: 5 August 1769
https://famineanddearth.exeter.ac.uk/displayhtml.html?id=fp_00445_en_calendarofpersiancorrespondence_2
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6 October 2026
महाकाव्य काल से लेकर आज तक चंपारण का इतिहास गौरवपूर्ण एवं महत्वपूर्ण रहा है। पुराण में वर्णित है कि यहाँ के राजा उत्तानपाद के पुत्र भक्त ध्रुव ने यहाँ के तपोवन नामक स्थान पर ज्ञान प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की थी।http://www.archive.org/stream/satyagrahaincham029158mbp/satyagrahaincham029158mbp_djvu.txt चंपारण में सत्याग्रह 13 अगस्त 2009 https://web.archive.org/web/20090619183644/http://www.archive.org/stream/satyagrahaincham029158mbp/satyagrahaincham029158mbp_djvu.txt 19 जून 2009 live एक आधुनिक भारत में गाँधीजी का चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का अमूल्य पन्ना है। राजा जनक के समय यह मिथिला (तिरहुत) प्रदेश का अंग था। लोगों का ऐसा विश्वास है कि जानकीगढ, जिसे चानकीगढ भी कहा जाता है, राजा जनक के मिथिला प्रदेश की राजधानी थी। जो बाद में छठी सदी ईसापूर्व में वज्जी के साम्राज्य का हिस्सा बन गया। भगवान बुद्ध ने यहाँ अपना उपदेश दिया था जिसकी याद में तीसरी सदी ईसापूर्व में प्रियदर्शी अशोक ने स्तंभ लगवाए और स्तूप का निर्माण कराया। गुप्त वंश तथा पाल वंश के पतन के बाद चंपारण कर्नाट वंश के अधीन हो गया। मुसलमानों के अधीन होने तक तथा उसके बाद भी यहाँ स्थानीय क्षत्रपों का सीधा शासन रहा। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय चंपारण के ही एक रैयत एवं स्वतंत्रता सेनानी राजकुमार शुक्ल के बुलावे पर महात्मा गाँधी अप्रैल १९१७ में मोतिहारी आए और नील की फसल के लागू तीनकठिया खेती के विरोध मेंसत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग किया।
पूर्वी चंपारण के ऐतिहासिक नगरों में मेहसी का भी विशेष स्थान रहा है। महात्मा गांधी जब अप्रैल १९१७ में चम्पारण सत्याग्रह के दौरान मोतिहारी की ओर आए, तब उन्होंने मेहसी रेलवे स्टेशन पर भी पड़ाव किया था, जहाँ स्थानीय लोगों ने उनका स्वागत किया। आजा़दी की लड़ाई में यह नए चरण की शुरूआत थी। बाद में भी बापू कई बार यहाँ आए। अंग्रेजों ने चंपारण को सन १८६६ में ही स्वतंत्र इकाई बनाया था लेकिन १९७१ में इसका विभाजन कर पूर्वी तथा पश्चिमी चंपारण बना दिया गया।तिरहुत का इतिहास [tirhut-muzaffarpur.bih.nic.in/]
भूगोल
250px|left|thumb|बिहार के मानचित्र पर पूर्वी चंपारण को गाढ़े रंग में दिखाया गया है
पश्चिमोत्तर बिहार में स्थित 3,969 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला पूर्वी चंपारण की सीमा नेपाल से मिलती है। गंडक, बागमती तथा इसकी अन्य सहायक नदियों के मैदान में होने से पूर्वी चम्पारण की उपजाऊ मिट्टी खेती के लिए उपयुक्त है। हिमालय के गिरिपाद क्षेत्र से रिसकर भूमिगत हुए जल के कारण तराई क्षेत्र को यथेष्ट आर्द्रता उपलब्ध है इसलिए यहाँ दलदली मिट्टी (चौर) का विस्तार है। लोगों के जीवन का मुख्य आधार कृषि और गृह उद्योग है। उत्तम कोटि के बासमती चावल तथा गन्ने के उत्पादन में जिले को ख्याति प्राप्त है।
पूर्वी चंपारण के प्रमुख भौगोलिक एवं आर्थिक केंद्रों में मेहसी का महत्वपूर्ण स्थान है। यह नगर जिले के पश्चिमी भाग में स्थित एक प्रमुख प्रखंड मुख्यालय है तथा राष्ट्रीय राजमार्ग 27 और मुजफ्फरपुर–नरकटियागंज रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। मेहसी एवं इसके आसपास का क्षेत्र शाही लीची के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है और पूर्वी चंपारण जिले को भारत सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना के अंतर्गत लीची उत्पादक जिले के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। कृषि, बागवानी तथा व्यापारिक गतिविधियों के कारण मेहसी जिले के महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्रों में विकसित हुआ है।https://www.india.gov.in/explore-india/odop/details/litchi Litchi – One District One Product (East Champaran) National Portal of India 10 जून 2026 https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Litchi_orchard_in_Mehsi,_Bihar,_India.png Litchi orchard in Mehsi, Bihar, India Wikimedia Commons 10 जून 2026
मृदु जलवायु तथा उपजाऊ भूप्रदेश के चलते यह बिहार का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला जिला है। लेकिन स्त्री-पुरुष जनसंख्या का अनुपात असंतुलित (८९८ प्रति १०००) है। सालाना औसत वर्षा १२४२ मिलीमीटर होती है जो पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है। सिंचाई के लिए गंडक से निकाली गई त्रिवेणी, ढाका तथा सकरी नहरें बनी हैं।
नदियाँ: गंडक, बागमती, सिकरहना, ललबकिया, तिलावे, कचना, मोतिया, तिऊर और धनौति।
प्रशासनिक विभाजनः
अनुमंडलः मोतिहारी सदर, अरेराज, चकिया, रक्सौल, सिकरहना, पकड़ी दयाल
प्रखंडः ढाका, अरेराज, आदापुर, कल्याणपुर, केसरिया, कोटवा, घोड़ासहन, चकिया, छौरादानों, तेतरिया, तुरकौलिया, पकड़ी दयाल, पताही, पहाड़पुर, पिपराकोठी, फेनहारा, बनकटवा, बंजारिया, मधुवन, मेहसी, मोतिहारी, रक्सौल, रमगढ़वा, संग्रामपुर, सुगौली, हरसिद्धी
पुलिस थानों की संख्या – ४१
पंचायतों की संख्या – ४०९
गाँव की संख्या – १३४५
जनजीवन एवं संस्कृति
तिरहुत का अंग होने पर भी अलग भाषा तथा भौगोलिक विशिष्टता के चलते चंपारण की संस्कृति बज्जिका भाषी क्षेत्रों से थोड़ा भिन्न है। जिले के सभी हिस्सों में भोजपुरी बोली जाती है लेकिन हिंदी और उर्दू शिक्षा का माध्यम है। शहरों में अंग्रेजी माध्यम से पढाने वाले स्कूल भी हैं। यद्यपि भोजपुरी संस्कृति यहाँ रची- बसी है किंतु लोगों में अपनी भाषा के लिए गौरव का अभाव है। उत्तर प्रदेश तथा बिहार के कई जिलों के करोड़ों लोगों सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोली जानेवाली भोजपुरी को लोग शिक्षा का माध्यम बनाने में लोग हिचकते हैं। शादी-विवाह या अन्य मांगलिक अवसरों पर भोजपुरी संगीत कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा होता है। कभी नील की खेती के लिए जाने जानावाला जिला अब अच्छी किस्म के चावल और गुड़ के लिए प्रसिद्ध है। अपरिचितों का स्वागत भी गुड़ और पानी से किया जाता है। छठ पूजा को यहाँ लोग बड़ी श्रद्धा से मनाते है। इसके अतिरिक्त होली, दिवाली, दुर्गा पूजा, महाशिवरात्रि, रक्षाबंधन, गुरु-पूर्णिमा, सतुआनी, चकचंदा आदि हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। मुसलमान ईद, बकरीद या मुहरम मनाते हैं। दोनों समुदायों में हालांकि समरसता आम है लेकिन लोग जातीय भेदभाव के शिकार हैं। विवाह माता-पिता द्वारा अपनी जाति के समान आर्थिक और सामाजिक स्तर में ही तय किए जाते हैं।
पर्यटन स्थल
भीमलपुर वन क्षेत्र (मेहसी)
मेहसी प्रखंड के अंतर्गत स्थित भीमलपुर वन क्षेत्र पूर्वी चंपारण के उल्लेखनीय प्राकृतिक स्थलों में गिना जाता है। घने वृक्षों, समृद्ध हरित आवरण तथा स्थानीय जैव विविधता के कारण यह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ विभिन्न प्रकार के देशी वृक्ष, पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ तथा अन्य वन्य जीव पाए जाते हैं। वर्षा एवं शीत ऋतु के दौरान इसका प्राकृतिक सौंदर्य विशेष रूप से आकर्षक दिखाई देता है। प्राकृतिक संरक्षण और सतत विकास की दृष्टि से भी भीमलपुर वन क्षेत्र का विशेष महत्व है तथा भविष्य में इसे इको-टूरिज्म की संभावनाओं वाले स्थलों में शामिल किए जाने की चर्चा समय-समय पर होती रही है।
मेहसी की लीची
मेहसी उत्तर बिहार के प्रमुख लीची उत्पादक क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यहाँ की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, अनुकूल जलवायु तथा पारंपरिक बागवानी पद्धतियाँ उच्च गुणवत्ता वाली लीची के उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं। ग्रीष्म ऋतु में मेहसी के बागानों से उत्पादित लीची पूर्वी चंपारण सहित बिहार के विभिन्न जिलों तथा अन्य राज्यों के बाजारों तक पहुँचती है। लीची की खेती स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है और इससे बड़ी संख्या में किसान, बागवान तथा व्यापारी जुड़े हुए हैं। फलोत्पादन के क्षेत्र में मेहसी ने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है और यह क्षेत्र जिले की बागवानी गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
महात्मा गांधी और मेहसी
1917 के ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी ने पूर्वी चंपारण के विभिन्न क्षेत्रों में किसानों की समस्याओं का अध्ययन कर जनजागरण अभियान चलाया। मेहसी तथा इसके आसपास के क्षेत्रों पर भी इस आंदोलन का सामाजिक और वैचारिक प्रभाव देखा गया, जिसके परिणामस्वरूप किसानों एवं स्थानीय समाज में जागरूकता का विस्तार हुआ। चंपारण सत्याग्रह ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की और पूर्वी चंपारण की ऐतिहासिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। मेहसी क्षेत्र भी इस व्यापक ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ माना जाता है।
केसरिया का बौद्ध स्तूप
मोतिहारी से ३५ किलोमीटर लाल छपरा चौक के पास अवस्थित है प्राचीन ऐतिहासिक स्थल केसरिया। यहाँ एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है। 1998 में भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन के उपरांत इस जगह का पर्यटन और ऐतिहासिक रूप से महत्व बढ़ गया है। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यह बौद्ध स्तूप दुनिया की सबसे ऊँचा स्तूप है। यह स्थान राजधानी पटना से 120 किलोमीटर और वैशाली से 30 मील दूर है। मूल रूप में १५० फीट ऊँचे इस स्तूप की ऊँचाई सन 1934 में आए भयानक भूकंप से पहले 123 फीट थी। भारतीय पुरातत्वेत्ताओं के अनुसार जावा का बोराबुदूर स्तूप वर्तमान में जहाँ 103 फीट ऊँचा है वहीं केसरिया स्थित इस स्तूप की ऊंचाई 104 फीट है। विश्व धरोहर में शामिल सांची का स्तूप की ऊंचाई 77.50 फीट ही है। इसके ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए बिहार सरकार केंद्र की मदद से इसे एक ऐतिहासिक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है। बिहार पर्यटन में केसरिया का महत्व बढ़ता ही जा रहा है।
लौरिया नन्दनगढ
अशोक स्तंभ
अरेराज अनुमंडल के लौरिया गांव में स्थित अशोक स्तंभ की ऊंचाई 36.5 फीट है। इस स्तंभ (बलुआ पत्थर से निर्मित) का निर्माण 249 ईसा पूर्व सम्राट अशोक के द्वारा किया गया था। इसपर प्रियदर्शी अशोक लिखा हुआ है। इसके आधार का व्यास 41.8 इंच तथा शिखर का व्यास 37.6 इंच है। इस स्तंभ को ''स्तंभ धर्मलेख' के नाम से भी जाना जाता है। सम्राट अशोक ने इसमें अपने 6 आदेशों के संबंध में लिखा है। स्तंभ का वजन (जमीन से ऊपर का हिस्सा) 34 टन के आसपास है। अनुमान के अनुसार इस स्तंभ का कुल वजन 40 टन है। कहा जाता है कि इस स्तंभ के ऊपर जानवर की मूर्ति थी जिसको कोलकाता संग्रहालय भेज दिया गया है। इस स्तंभ पर लिखा हुआ आदेश 18 लाइनों में है।
गाँधी स्मारक (मोतिहारी)
चम्पारण की शान का प्रतीक गांधी मेमोरियल स्तंभ का शिलान्यास 10 जून 1972 को तत्कालीन राज्यपाल डी.के. बरूच के द्वारा किया गया था। 18 अप्रैल 1978 को वरिष्ठ गांधीवादी विद्याकर कवि ने इस स्तंभ को राष्ट्र को समर्पित किया। इस स्तंभ का निर्माण महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह की याद में शांति निकेतन के मशहूर कलाकार नन्द लाल बोस के द्वारा किया गया। चुनार पत्थर से निर्मित इस स्तंभ की लंबाई 48 फीट है। स्मारक का निर्माण ठीक उसी जगह किया गया है जहां गाँधीजी को 18 अप्रैल 1917 में धारा 144 का उल्लंघन करने के जुर्म में अनुमंडलाधिकारी की अदालत में पेश किया गया था।
जॉर्ज ऑरवेल स्मारकः
अंग्रेजी साहित्य के महान लेखक जॉर्ज ऑरवेल का जन्म २५ जून १९०३ को मोतिहारी में हुआ था। उस समय उनके पिता रिचर्ड वेल्मेज्ली ब्लेयर चंपारण के अफीम विभाग में सिविल अधिकारी थे। जन्म के कुछ दिनों के बाद ऑरवेल अपनी माँ और बहन के साथ इंगलैंड चले गए जहाँ उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन आरंभ किया। उनकी लिखी Animal Farm, Burmese Days, A Hanging जैसी कुछ पुस्तकें अंग्रेजी साहित्य की महान कृति है। वर्ष २००४ में रोटरी क्लब मोतिहारी तथा जिला प्रशासन के प्रयास से उनके जन्म स्थल की दशा सुधार कर वहाँ एक फलक लगाया गया जिसपर उनका संक्षिप्त जीवन चरित लिखा है।
विश्व कबीर शांति स्तंभ, बेलवातिया:
जिला मुख्यालय से दस किलो मीटर पर पीपराकोठी प्रखंड के बेलवातिया गांव में पूरे भारत का आठवां एवं बिहार का अब तक इकलौता विश्व कबीर शांति स्तंभ स्थापित है इस स्तंभ का निर्माण तत्कालीन महंत स्व० रामस्नेही दास ने २००२ में किया जबकि यह आश्रम १८७५ ई० में तत्कालीन महंत स्व० केशव साहेब ने स्थापित किया इस स्तंभ के अलावा अन्य सभी स्तंभ मध्य प्रदेश शासन के द्वारा बनाये गए है इस आश्रम पर प्रति वर्ष अनंत चतुर्दशी को त्रिदिवाशिये संत सम्मेलन का आयोजन किया जाता है जिसमे देश विदेश के संत महात्मा भक्त का समागम होता है यह आश्रम धार्मिक समाजिक राजनैतिक व अध्यात्मिक साधना का केंद्र रहा है वर्तमान महंथ डॉ त्रिपुरारी दास के नेतृत्व में इस आश्रम का संचालन किया जा रहा है जिनके द्वारा देश विदेश में इस आश्रम के विकास के लिये प्रयास किया जा रहा है इस ऐतिहासिक स्थल के बारे में गौर करें तो आश्रम की स्थापना करने वाले महंथ स्व० केशव साहब ने १८७५ ई० में की और वे १८९५ तक महंथ रहे उसके बाद स्व० श्याम बिहारी दास साहब सन १८९५ से १९०१ ई०, महंथ स्व० रिशाल साहब १९०१ से १९२९ तक, महंथ स्व० ब्रह्मदेव साहब सन १९२९ से १९५४ ई० तक , उसके बाद महंथ स्व० कमल साहेब सन १९५४ से १९७५ तक रहे एव उन्होंने आश्रम के १०० वे स्थापना दिवस पर अपने जीवन काल में ही रामस्नेही दास को महंथ की गदी पर आशिन करते हुए उन्हें महंथ बनाया और महंथ रामस्नेही दास ने अपने काल में ही विश्व कबीर शांति स्तंभ की स्थापना किया तथा वे भी अपने जीवन काल में ही १५ सितम्बर १९९७ को अपना कार्य भार रामरूप दास को सौपा तथा वे सन ३१ मई २००२ को गुजर गए फ़िलहाल के महंथ डॉ० त्रिपुरारी दास को ०७ सितम्बर २०१४ को बनाया गया और तब से उन्ही के नेतृत्व में आश्रम का संचालन हो रहा है
महत्वपुर्ण व्यक्तित्व
राजकुमार शुक्ल
जॉर्ज ऑरवेल
रमेश चन्द्र झा
राधा मोहन सिंह
अनुरंजन झा
रवीश कुमार
संजीव के झा
गौरव कुमार मिश्र
कृषि एवं उद्योग
मेहसी का पर्ल (ऑयस्टर शेल) बटन उद्योग:
मेहसी पूर्वी चंपारण का एक प्रमुख औद्योगिक एवं कृषि केंद्र है। यहाँ का पर्ल (ऑयस्टर शेल) बटन उद्योग देश के विशिष्ट कुटीर उद्योगों में गिना जाता है, जिसकी स्थापना स्थानीय निवासी राय साहब भुलावन लाल द्वारा 1905 में की गई थी। बाद के वर्षों में यह उद्योग तेज़ी से विकसित हुआ और मेहसी प्रखंड के 13 पंचायतों में लगभग 160 बटन निर्माण इकाइयाँ संचालित होने लगीं, जिससे हजारों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार मिला। वर्तमान में भी मेहसी अपनी ऐतिहासिक बटन उद्योग परंपरा तथा शाही लीची आधारित कृषि अर्थव्यवस्था के कारण पूर्वी चंपारण के प्रमुख आर्थिक केंद्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।https://eastchamparan.nic.in/mehsi-button-industry/ Mehsi Button Industry Official Website of East Champaran District Administration 10 जून 2026https://eastchamparan.nic.in/industry/ Industry Profile – East Champaran Official Website of East Champaran District Administration 10 जून 2026
आवागमन
सड़क मार्ग-
पूर्वी चम्पारण जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 28 तथा 28A तथा 98 लंबा राजकीय राजमार्ग संख्या 54 जिले की महत्वपूर्ण सड़क है। जिला मुख्यालय मोतिहारी से राजधानी पटना की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है, जहां बस से पहुंचने में 3-4 घंटे लग जाते हैं। मोतिहारी बिहार के अन्य शहरों से सड़क के माध्यम से जुड़ा हुआ है। उत्तर बिहार का दूसरा प्रमुख शहर तथा तिरहुत प्रमंडल का मुख्यालय मुजफ्फरपुर मोतिहारी से ८० किलोमीटर दूर है। यहां से भी बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में जाने के लिए बस लिया जा सकता है।
रेल मार्ग-
मोतिहारी भारतीय रेल के पूर्वमध्य रेलवे क्षेत्र में पड़ता है। पूर्वी चंपारण से गुजरनेवाली मुख्य रेलमार्ग गोरखपुर-मुजफ्फरपुर रेलखंड का हिस्सा है। सीतामढी से नरकटियागंज को जोडनेवाली एक अन्य रेलमार्ग है , पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण बुद्ध रेल परिपथ को बढावा देने हेतु हाजीपुर, वैशाली होते हुए एक अन्य नई रेल लाईन का काम प्रस्तावित है, जिसका काम चल रहा हैं जो आने वाले कुछ सालों में पूर्ण रूप से सेवा में आ जाएगाा। यहाँ से राजधानी पटना के लिए कोई सीधी ट्रेन सेवा नहीं है लेकिन देश के अन्य भागों के लिए यहाँ से नियमित ट्रेनें हैं।
वायुमार्ग-
जिला मुख्यालय मोतिहारी का निकटतम हवाई अडडा १४९ किलोमीटर दूर पटना में है। मोतिहारी से ७० किमी तथा सीमा से सटे रक्सौल से मात्र २० किलोमीटर की दूरी पर सेमरबासा में नेपाल का विमानपत्तन है जहाँ से काठमांडू आसानी से पहुँचा जा सकता है।
सन्दर्भ
श्रेणी:बिहार के जिले
*