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भट्टोजि दीक्षित
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महावैयाकरण भट्टोजि दीक्षित १७वीं शताब्दी में उत्पन्न संस्कृत वैयाकरण थे जिन्होंने सिद्धान्तकौमुदी की रचना की। इन के परिवार में महान् विद्वानों ने जन्म लिया। इन के भाई रंगोजि भट्ट महान् वैयाकरण हुए। रंगोजि भट्ट के पुत्र कौण्ड भट्ट ने वैयाकरणभूषणसार ग्रंथ की रचना की।
इन का निवासस्थान काशी था। पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन की प्राचीन परिपाटी में पाणिनीय सूत्रपाठ के क्रम को आधार माना जाता था। यह क्रम प्रयोगसिद्धि की दृष्टि से कठिन था क्योंकि एक ही प्रयोग का साधन करने के लिए विभिन्न अध्यायों के सूत्र लगाने पड़ते थे। इस कठिनाई को देखकर ऐसी पद्धति के आविष्कार की आवश्यकता पड़ी जिसमें प्रयोगविशेष की सिद्धि के लिए आवश्यक सभी सूत्र एक जगह उपलब्ध हों। भट्टोजि दीक्षित ने प्रक्रिया कौमुदी के आधार पर सिद्धान्तकौमुदी की रचना की। इस ग्रंथ पर उन्होंने स्वयं प्रौढमनोरमा टीका लिखी। उन के पौत्र हरि दीक्षित ने प्रौढ़मनोरमा पर शब्दरत्न नाम की टीका लिखी। इन ने पाणिनीय सूत्रों पर अष्टाध्यायी क्रम से एक अपूर्ण व्याख्या, शब्दकौतुभ तथा वैयाकरणभूषण कारिका आदि ग्रंथ हैं। इन की सिद्धान्त कौमुदी लोकप्रिय है।
तत्वबोधिनी (ज्ञानेन्द्र सरस्वती विरचित), बालमनोरमा (वासुदेव दीक्षित विरचित) इत्यादि सिद्धान्तकौमुदी की टीकाएँ सुप्रसिद्ध हैं।
उन के शिष्य वरदराज भी व्याकरण के महान् पण्डित हुए।
बाहरी कड़ियाँ
सिद्धान्तकौमुदी भाग-१ (गूगल पुस्तक ; अंग्रेजी व्याख्या सहित ; लेखक श्रीष बसु)
वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी स्त्री प्रत्यय (गूगल पुस्तक; लेखक रामविलास चौधरी)
वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी (कारक प्रकरण) (गूगल पुस्तक; लेखक - धर्मानन्द घिल्डियाल)
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