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जापानी साम्राज्य
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大 日 本 帝 國दाइ निहों तेइकोकू जापान साम्राज्य जापान साम्राज्ञय एशिया पूर्वी एशिया जापान मीजी, ताइशो, शोवा 1868–1947 1868 One can date the "restoration" of imperial rule from the edict of January 3, 1868. Jansen, p.334. 1947 ३ जनवरी, १८६८ ३ मई, १९४७ मीजी पुनर्स्थापन पुरनर्स्थापित संविधान का परवर्तन नवम्बर 29, 1890 रूस-जापान युद्ध फरवरी 10, 1904 प्रशान्त युद्ध 1941–1945 जापान का आत्मसमर्पण सितम्बर 2, 1945 Merchant flag of Japan (1870).svg ध्वज जापान का ध्वज Imperial Seal of Japan.svg साम्राज्ंयिय मोहर Imperial Seal of Japan Tokugawa Shogunate Flag of the Tokugawa Shogunate.svg Ryūkyū KingdomRyūkyū Republic of EzoEzo Qing DynastyChina Flag of the Qing Dynasty (1889-1912).svg Russian EmpireRussia Flag of Russia.svg Korean EmpireKorea Flag of Korea 1882.svg German New Guinea German new guinea flag.svg Dutch East Indies Flag of the Netherlands.svg Occupation of JapanOccupied Japan Merchant flag of Japan (1870).svg United States Military Government of the Ryukyu IslandsMilitary Government of the Ryukyu Islands US flag 48 stars.svg Republic of China (1912–49)China Flag of the Republic of China.svg United States Army Military Government in KoreaMilitary Government in Korea US flag 48 stars.svg Soviet Civil Authority Flag of the Soviet Union (1923-1955).svg Sakhalin Oblast Flag of the Soviet Union (1923-1955).svg United Nations Trust Territory of the Pacific IslandsTrust Territory of the Pacific Islands US flag 48 stars.svg Indonesian National Revolution#Formation of the Republican governmentIndonesia Flag of Indonesia.svg Japanese Empire (orthographic projection).svg अपने चरमोत्कर्ष पर जापानी साम्राज्य (१९४२ में)
padding:0.5em 0.5em 0.25em 6.0em; text-align: left; green Empire of Japan 1870–1905
#148237 Acquisitions 1905–30
#5FAF5F Trusteeship, concession, occupied territories "Kimigayo" 0.25em 君が代("महाराज का राज")File:Kimi ga Yo 1930 instrumental.oga ja 五箇条の御誓文"Charter Oath"("The Oath in Five Articles") टोकियो 35 41 N 139 46 E कथागत: कोइ नहींतथ्यगत्: शिन्टो धर्मnb Although the Empire of Japan officially had no state religion,Josephson Jason Ānanda The Invention of Religion in Japan https://archive.org/details/isbn_9780226412344 2012 University of Chicago Press 0226412342 133Ph.D. Jolyon Baraka Thomas Japan's Preoccupation with Religious Freedom Princeton University 2014 76 http://arks.princeton.edu/ark:/88435/dsp01xp68kg357 Shinto played an important part for the Japanese state: As Marius Jansen, states: "The Meiji government had from the first incorporated, and in a sense created, Shinto, and utilized its tales of the divine origin of the ruling house as the core of its ritual addressed to ancestors "of ages past." As the Japanese empire grew the affirmation of a divine mission for the Japanese race was emphasized more strongly. Shinto was imposed on colonial lands in Taiwan and Korea, and public funds were utilized to build and maintain new shrines there. Shinto priests were attached to army units as chaplains, and the cult of war dead, enshrined at the Yasukuni Jinja in Tokyo, took on ever greater proportions as their number grew."Jansen 2002 669
अन्य: बौद्ध धर्म जापानी Daijō-kanHunter 1984 31-32(1868–1885)Constitutional monarchy(1890–1947) Chronological table 5 1 December 1946 - 23 June 1947 National Diet Library http://www.ndl.go.jp/constitution/e/etc/history05.html September 30, 2010 https://web.archive.org/web/20190722154117/https://www.ndl.go.jp/constitution/e/etc/history05.html 22 जुलाई 2019 dead One-party state Military dictatorship (1940–1945) सम्राट मीजी (मुत्शितो) 1868–1912 ताइशो (योशिहीतो) 1912–1926 शोवा (हिरोतो) 1926–1947 प्रधानमंत्री Itō Hirobumi (first) 1885–1888 Shigeru Yoshida (last) 1946–1947 Imperial Diet House of Peers House of Representatives 1942 estimate 1920 1940 7400000 77,700,000a 105,200,000b Japanese yen,Korean yen,Taiwanese yen,Japanese military yen 56 million lived in Japan proper.Taeuber Irene B. Beal Edwin G. http://www.jstor.org/stable/1025496 The Demographic Heritage of the Japanese Empire Annals of the American Academy of Political and Social Science Sage Publications 237 65 January 1945 yes JSTOR 28 फ़रवरी 2016 https://web.archive.org/web/20160305231906/http://www.jstor.org/stable/1025496 5 मार्च 2016 live 73.1 million lived in Japan proper. font-weight:normal; background:transparent; text-align:left; ऑस्ट्रेलियाब्रुनेईकम्बोडियाचीनी जनवादी गणराज्यपूर्व तिमोरमाइक्रोनेशिया के संघीकृत राज्यभारतइंडोनेशियाजापानलाओसमलेशियामार्शल द्वीपसमूहमंगोलियाम्यान्मारउत्तर कोरियापलाउपापुआ न्यू गिनीफ़िलीपीन्सरूससिंगापुरसोलोमन द्वीपदक्षिण कोरियाताइवानथाईलैण्डसंयुक्त राज्य अमेरिकावियतनाम
३ जनवरी १८६८ से लेकर ३ मई १९४७ तक जापान एक विश्वशक्ति था, जिसे जापान साम्राज्य (जापानी:大日本帝國 Dai Nihon Teikoku, शाब्दिक अर्थ : 'महान् जापानी साम्राज्य'") कहा जाता है।
जापान ने 'देश को धनवान बनाओ, सेना को शक्तिमान बनाओ' (富国強兵) के नारे के तहत काम करते हुए बड़ी तेजी से औद्योगीकरण और सैन्यीकरण किया जिसके फलस्वरूप वह एक विश्वशक्ति बनकर उभरा। आगे चलकर वह 'अक्ष गठजोड़' का सदस्य बना और एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के बहुत बड़े भाग का विजेता बन गया। १९४२ में जब जापानी साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था तब 7,400,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र इसके अधीन इसके अधीन था जिसके हिसाब से वह इतिहास में सबसे बड़ा सामुद्रिक साम्राज्य था।
मेइजी पुनर्स्थापन
मेइजी पुनर्स्थापन
मेइजी पुनर्स्थापन (明治維新, मेइजी इशिन) उन्नीसवी शताब्दी में जापान में एक घटनाक्रम था जिस से सन् १८६८ में सम्राट का शासन फिर से बहाल हुआ। इस से जापान के राजनैतिक और सामाजिक वातावरण में बहुत महत्वपूर्ण बदलाव आये जिनसे जापान तेज़ी से आर्थिक, औद्योगिक और सैन्य विकास की ओर बढ़ने लगा। इस क्रान्ति ने जापान के एदो काल का अंत किया और मेइजी काल को आरम्भ किया। इस पुनर्स्थापन से पहले जापान का सम्राट केवल नाम का शासक था और वास्तव में शोगुन (将軍) की उपाधि वाले सैनिक तानाशाह राज करता था।
जापान का आधुनिकीकरण
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में जापान का उत्कर्ष एवं यूरोपीयकरण एशिया तथा नवीन साम्राज्यवाद के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना माना जाएगा। मेईजी पुनःस्थापना ने देश में एक नया जागरण पैदा किया और जापान में पश्चिमीकरण तथा सुधारों की एक लहर दौड़ पड़ी। कुछ ही वर्षां में जापान देखते-देखते एक अत्याधुनिक राष्ट्र बन गया। अब कसी भी समुन्नत यूरोपीय राज्य से उसकी तुलना की जा सकती थी।
जापान ने शुरू में अपना आधुनिकीकरण आत्मरक्षा के उद्देश्य से किया था। यह उस अनुभव का परिणाम था कि जब तक जापान स्वयं अपने को यूरोपीय राज्यों को समकक्ष नहीं बना लेगा, तब तक परिश्चम के अन्य देश उसे चैन से नहीं रहने देंगे और उसकी स्वतंत्रता भी समाप्त कर देंगे। लेकिन, उन्नीसवी सदी के अंत में जापान का वह उद्देश्य समाप्त हो गया। अब जापान में हर क्षेत्र में पाश्चात्य जगत का अनुकरण करने की लालसा जगी। यह लालसा राष्ट्रीय जीवन में परिवर्तन तक सीमित न रही, वरन् साम्राज्यवादी जीवन की ओर भी बढ़ गई, जिसके फलस्वरूप यूरोपीय देशों तथा अमेरिका की तरह वह भी साम्राज्यवादी देश हो गया।
जापान के आधुनिकीकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका अपूर्व औद्योगिक विकास था। जापान में बड़े-बड़े कल-कारखाने खुले और बहुत बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन प्रारंभ हुआ। इस तरह, जापान का औद्योगिकीकरण हुआ और वह एक उद्योग प्रधान देश बन गया। आधुनिक उद्योगीकरण साम्राज्यवाद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्ररेक त्व रहा है। एक औद्योगिक देश को कई तहर की चीजों की आवश्यकता होती है। उद्योग धंधे चलाने के लिए सर्वप्रथम कच्चे माल की आवश्यकता होती है। फिर, कच्चे माल से सामान तैयार कर उन्हें बेचने के लिए बाजार की भी आवश्यकता होती है। जापान एक छोटा सा देश है और उसके औद्योगिक साधन अत्यंत सीमित हैं। अपने उद्योग धंधों के लिए वह स्वयं अपने देश में प्राप्त कच्चे माल से सं तुष्ट नहीं हो सकता था; क्योंकि वह बहुत ही अपर्याप्त था। कच्चे माल के लिए वह दूसरे दशों पर आश्रित था। यही बात औद्योगिक चीजों को बेचने क लिए बाजार के साथ भी थी। जब उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा तो चीजों के खपत की समस्या आई। इन दोनों बातों के लिए जापान को दूसरे देशों पर निर्भर करना था।
कच्चे माल और बाजार की उपलब्धि के लिए साम्राज्यवादी जीवन का प्रारंभ आवश्यक हो गया। इन दोनों चीजों की प्राप्ति बाहरी पिछड़े देशों पर राजनीतिक प्रभुता कर ही की जा सकती है। कोई भी देश चाहे कितनी भी पिछड़ा क्यों न हो, इस तरह स्वेच्छापूर्वक अपना आर्थिक शोषण नहीं होने देगा। ऐसी स्थिति में पिछड़े देशों को अपना बाजार बनाने के लिए और वहाँ के कच्चे माल द्वारा अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए उन पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना आवश्यक बन गया। राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने का एक उपाय था - युद्ध। अतएव, इस परिस्थिति में जापान को युद्ध का सहारा लेना पड़ा और इस तरह उसके साम्राज्यवादी जीवन का आरंभ हुआ।
जापान में सैन्यवाद का उदय
जापानी साम्राज्यवाद के विकास का दूसरा कारण वहाँ सैन्यवाद का विकास था। मेईजी पुनःस्थापना के बाद जापान बड़ी तेजी से आधुनिकता की ओर अग्रसर हुआ। इस आधुनिकता के लहर में जापान के सैनिक पुनर्गठन पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके पूर्व जापान का सैनिक संगठन सामंतवादी व्यवस्था पर आधारित था। लेकिन, मेईजी पुनःस्थापना के उपरांत जापान के सैनिक संगठन में आमूल परिवर्तन हुआ। सेना के सामंतवादी स्वरूप का अंत कर दिया गया। जब जापान में अनिवार्य सैनिक सेवा लागू की गई और एक राष्ट्रीय सेना का संगठन हुआ। इस सेना को प्रशिक्षित करने के लिए प्रशा से सैनिक विशेषज्ञ बुलाए गए, जिन्होंने जापानी जलसेना और स्थलसेना का संगठन आधुनिक प्रशियन ढंग से किया। सेना को नियमित रूप से वेतन मिलने लगा और सैनिकों पर प्रशियन अनुशासन कायम हुआ।
शुरू से ही जापान के लोग सैनिक मनोवृत्ति के थे। नए युग में उनकी इस प्रवृत्ति को और प्रोत्साहन मिला। नई संगठित सेना में कुछ बड़े ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति अफसरों के पद पर आसीन थे। वे आक्रामक जापान को उग्र और आक्रामक सैनिक विदेश नीति का अवलंबन करना चाहिए। उन्हें जापान की सैनिक शक्ति पर अत्यधिक भरोसा था और इसके बल पर वे जापान के राज्य का विस्तार करना चाहते थे। उनका विश्वास था कि जापान की सैनिक शक्ति अजेय है और उसके बल पर अपना राज्य विस्तार कर सकते हैं। सैनिक अफसरों का यह शक्तिशाली गुट देश की राजनीति पर बड़ा प्रभाव रखता था। इन लोगों ने जापान की सरकार को उग्र आक्रामक नीति का अनुसरण करने के लिए बाध्य किया। इसे लेकर निकट पड़ोस के देशों पर जापान का आक्रमण शुरू हुआ। जापानी साम्राज्यवाद का विकास यहीं से मानना चाहिए।
जापानी साम्राज्यवाद के कारण
पश्चिमी साम्राज्यवाद से राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में यूरोपीय साम्राज्यवाद का एशिया और अफ्रीका में चरम विकास हो चुका था। उस समय यूरोप के विविध राज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ही जापान के आसपास के क्षेत्रों में अपने साम्राज्य का विस्तार कर चुके थे अथवा करने में व्यस्त थे। चीन को लूटने-खसोटने का काम प्रारंभ हो गया था। अतएव, अपनी सुरक्षा के लिए यह आवश्यक हो गया कि जापान भी उग्र आक्रामक नीति का अवलंबन करे।
प्रजातंत्रीय समानता की आकांक्षा
जापानी लोग अपने को श्रेष्ठ प्रजाति का मानते थे। वे अपने देश को देवलोक तथा अपने सम्राट् को ईश्वर का रूप मानते थे। उनका विश्वास था कि शेष संसार के लोग जंगली और असभ्य है और श्रेष्ठ प्रजाति होने के कारण उनका अधिकार है कि वे दूसरी जातियों पर शासन करें। जापान पूर्व के देशों में पहला देश था जो यूरोप के किसी भी देश की बराबरी कर सकता था। अतः अपनी सैन्यशक्ति के बल पर जापान यूरोपीय समाज में प्रविष्ट होने का प्रयास करने लगा।
जापान की आंतरिक राजनीति
मेईजी संविधान के अनुसार जापान में जुलाई, 1890 में पहला चुनाव हुआ और संसद का संगठन हुआ। लेकिन, जैसे ही संसद की बैठक शुरू हुई कि सरकार से उनकी नोंक-झोंक शुरू हो गईं संसद वालों ने संविधान में संशोधन की माँग की, ताकि सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी हो। इस बात का गतिरोध उत्पन्न हो गया। प्रधानमंत्री मातसूकाता मासायासी इस प्रस्ताव का कट्टर विरोधी था। अतएव, 1891 ई. में उसने संसद को भंग कर दिया और दूसरे चुनाव का आदेश दिया। इस अशांत आंतरिक राजनीतिक ने जापानी राजनीतिज्ञों ने विचार किया कि यदि जापान आक्रामक नीति का अनुसरण करने लगे तो संभवतया देश की राजनीतिक में कुछ सुधार हो और लोगों का ध्यान देशीय घटनाओं से हटकर विदेशों में लग जाए। अतएव जापानी अधिकारियों ने उग्र एवं आक्रामक नीति का अवलंबन करने का निश्चय किया। जापानी साम्राज्यावाद के उद्भव के मूल में देश की आक्रामक विदेश नीति भी थी।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
जापानी साम्राज्यवाद
मेइजी पुनर्स्थापन
द्वितीय विश्वयुद्ध
श्रेणी:जापान का इतिहास