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411 समाचार
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जातीय संघर्ष

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thumb|upright|मिखाइल इवस्टाफ़िएव द्वारा "चेचेन्स्का मोलिट्वा" (चेचन की प्रार्थना) 1995 में ग्रोज़्नी की लड़ाई के दौरान प्रार्थना करते हुए एक चेचन व्यक्ति को दर्शाती है। जातीय संघर्ष वह स्थिति है जब दो या दो से अधिक जातीय समूह अपने समुदाय की पहचान, सम्मान और समाज में स्थान को लेकर आमने-सामने संघर्ष करते हैं। इसके कारण राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या धार्मिक हो सकते हैं, परंतु संघर्ष का मूल उद्देश्य अपने जातीय समूह के हितों और अधिकारों की रक्षा करना होता है। यही तत्व इसे अन्य प्रकार के संघर्षों से भिन्न बनाता है जातीय संघर्ष और नागरिक जीवन: भारत में हिंदू और मुसलमान। वार्ष्णेय आशुतोष येल यूनिवर्सिटी प्रेस 2002 न्यू हेवेनआधुनिक घृणा: जातीय संघर्ष की प्रतीकात्मक राजनीति https://archive.org/details/modernhatredssym00kauf limited कॉफ़मैन स्टुअर्ट जे॰ कॉर्नेल यूनिवर्सिटी. प्रेस 2001 Ithaca 17 जातीय संघर्ष की अकादमिक व्याख्याएँ सामान्यतः तीन प्रमुख विचारधाराओं 'आदिमवादी', 'साधनवादी' और 'रचनावादी' में विभाजित की जाती हैं। हाल के वर्षों में कुछ विद्वानों ने इसके लिए "ऊपर से नीचे" और "नीचे से ऊपर" जैसे दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किए हैं। बौद्धिक बहस इस प्रश्न पर केंद्रित रही है कि क्या शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जातीय संघर्षों में वृद्धि हुई है, तथा सह-संघवाद और संघीकरण जैसे राजनीतिक उपायों से इन संघर्षों के प्रभावी प्रबंधन के रास्ते खोजे जा सकते हैं या नहीं। इतिहास शीत युद्ध के बाद की दुनिया में अध्ययन thumb|upright| म्यांमार गृहयुद्ध (2025 में अद्यतन) का मानचित्र। म्यांमार सरकार और जातीय राष्ट्रवादी विद्रोही समूह 1948 से एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। जातीय संघर्ष से जुड़े सबसे विवादित मुद्दों में से एक यह है कि क्या शीत युद्ध की समाप्ति के बाद इसकी घटनाएँ बढ़ी हैं या घटी हैं। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में नए जातीय संघर्षों में कमी अवश्य दिखी, लेकिन आज भी यह सशस्त्र संघर्षों का सबसे सामान्य रूप बना हुआ है।मिशाली-राम मेईराव जातीय विविधता, मुद्दे और अंतर्राष्ट्रीय संकट गतिशीलता, 1918-2002 https://archive.org/details/sim_journal-of-peace-research_2006-09_43_5/page/583 जर्नल ऑफ पीस रिसर्च सितंबर 2006 43 5 583–600 10.1177/0022343306066524 110835057 शीत युद्ध के बाद 'सैमुअल पी॰ हंटिंगटन और रॉबर्ट डी॰ कपलान जैसे शिक्षाविदों ने भविष्यवाणी किया था कि आने वाले समय में सभ्यताओं के टकराव, जनजातीय पहचान, सीमित संसाधनों और बढ़ती जनसंख्या से प्रेरित संघर्षों में वृद्धि होगी। यह भविष्यवाणी आंशिक रूप से सही साबित हुई है। नाइजीरिया, माली, सूडान और साहेल जैसे देशों में हिंसक जातीय झड़पें सूखा, भूमि क्षरण, खाद्यान्न की कमी और जनसंख्या दबाव के कारण तेज़ी से बढ़ा।सैमुअल पी॰ हटिंगटन 1993 http://www.foreignaffairs.org/19930601faessay5188/samuel-p-huntington/the-clash-of-civilizations.html सभ्यताओं का टकराव? विदेश मंत्रालय 72 3 22–49 10.2307/20045621 dead https://web.archive.org/web/20070629022856/http://www.foreignaffairs.org/19930601faessay5188/samuel-p-huntington/the-clash-of-civilizations.html 2007-06-29 20045621 subscription रोबर्ट डी॰ कप्लान 1994 https://www.theatlantic.com/ideastour/archive/kaplan.mhtml The coming anarchy द अटलांटिक मंथली 273 2 44–76 2017-03-06 https://web.archive.org/web/20080724054203/http://www.theatlantic.com/ideastour/archive/kaplan.mhtml 2008-07-24 dead इन्हें भी देखें सांप्रदायिक हिंसा नरसंहार संदर्भ श्रेणी : हिंसा