411 REFERENCE · Wikipedia
मृगनयनी
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
मृगनयनी वृन्दावनलाल वर्मा की प्रसिद्ध ऐतिहासिक रचना है। इसमें १५वीं शती के ग्वालियर राज्य के राजा मानसिंह तोमर तथा उनकी गुजरी रानी मृगनयनी की प्रेम कथा है।इसके माध्यम से मानसिंह तोमर का चरित्र चित्रण किया गया है। साथ ही तत्कालीन ग्वालियर रियासत एवं इतिहास की भी झलक देखने को मिलती है।
ग्वालियर के दक्षिण-पश्चिम में राई नामक ग्राम मे निम्मी और उसका भाई अटल रहते थे। लाखी, निम्मी की सखी थी। निम्मी और लाखी के सौन्दर्य और लक्ष्यवेध की चर्चा मालवा की राजधानी माण्डू, मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ और गुजरात की राजधानी अहमदाबाद तक पहुची। उस समय दिल्ली के तख्त पर गयासुद्दीन खिलजी बैठ चुका था। माण्डू के बादशाह बर्बरा और गयासुद्दीन ने निम्मी और लाखी को प्राप्त करने की योजनाएँ बनाई। राई गाँव के पुजारी ने उनके सौन्दर्य और लक्ष्यवेध प्रशंसा ग्वालियर के राजा मानसिंह के समक्ष की।https://www.patrika.com/gwalior-news/love-story-of-raja-man-singh-and-gurjar-mrignayani-in-hindi-4444968/ ग्वालन[दूध बेचने वाली]]के प्यार में डूबा था यह राजा,रानी व राजा के प्रेम की अमर कहानी का गवाह है ये शानदार महल 2019-04-18 Patrika News hi-IN 2021-12-23
लाखी की माँ मर गई, इसलिए लाखी, निम्मी और अटल के पास रहने लगी। गयासुद्दीन खिलजी ने, नटो के सरदार को निम्मी और लाखी को लाने के लिए, योजना तैयार की। नटों और नटनियों ने निम्मी और लाखी को फुसलाना प्रारम्भ किया।
एक दिन राजा मानसिंह शिकार खेलने राई गाँव पहुँचे। निम्मी के सौन्दर्य और शिकार मे लक्ष्यवेध से मुग्ध होकर विवाह करके उसे ग्वालियर ले गये। । वे नटों के दल के साथ नरवर के किले की तरफ आ गये। लाखी को नटों के षडयंत्र का पता लग गया, इसलिए उसने उनके षडयन्त्र को विफल कर उन्हे समाप्त कर दिया। महाराजा मानसिंह अटल और लाखी को ले गए और ग्वालियर मे उनका विवाह हुआ ।
निन्नी, विवाह के पश्चात 'मृगनयनी' के नाम से प्रसिद्ध हुई। मृगनयनी के पहले राजा के आठ पत्नियाँ थीं जिनमे सुमनमोहिनी सबसे बड़ी थी। ऐतिहासिक और प्रामाणिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो राजा मानसिंह तोमर के समय के किसी भी समकालीन शिलालेख, ताम्रपत्र या शाही दस्तावेज में मृगनयनी के माता-पिता का नाम, उनका गोत्र या उनकी सटीक जाति का कोई भी उल्लेख नहीं मिलता है। इतिहासकार मुहम्मद कासिम फ़रिश्ता के विवरणों के अनुसार, वे राई/रायरू क्षेत्र के एक अत्यंत साधारण और स्वतंत्र घुमंतू चरवाहा कबीले (Nomadic Pastoralist Tribe) से ताल्लुक रखती थीं।
उस दौर में इन्हें 'गुजरी' या 'गुजर' कहने का वास्तविक कारण यह था कि ये लोग किसी एक जगह स्थायी रूप से रहने के बजाय अपनी भेड़-बकरियों और मवेशियों के साथ पूरे भारत में एक जगह से दूसरी जगह 'गुजरते' (प्रवास या घूमते) रहते थे। इसी 'गुजरने' यानी घुमंतू स्वभाव और चरवाहा जीवनशैली के कारण इस कबीले की महिलाओं को सामान्य भाषा में 'गुजरी' कहा जाता था, जिसका किसी स्थापित सामाजिक जाति से संबंध नहीं था।
आधुनिक समय में कुछ स्थानीय कथाओं, राजनीतिक दावों और 1905 के ब्रिटिशकालीन गजेटियर (जो केवल सुनी-सुनाई लोकश्रुतियों पर आधारित थे) के हवाले से उन्हें सीधे आधुनिक 'गुर्जर जाति' से जोड़ने का प्रयास किया जाता है, जो कि पूरी तरह से भ्रामक और ऐतिहासिक प्रमाणों से परे है। किसी भी प्रामाणिक वंशावली या दस्तावेज के अभाव में इस ऐतिहासिक चरित्र को किसी स्थापित आधुनिक जाति से जोड़ना पूरी तरह गलत है।"
यह बात 1905 की लिखी हुई अंग्रेजी राइटर की बुक से भी पता चलती है।
इन्हें भी देखें
मान सिंह तोमर
गुजरी महल
मृगनयनी (सिंहासन बत्तीसी)
सन्दर्भ
श्रेणी:ऐतिहासिक कृतियाँ
सर्वथा अनुचित लेख है