Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

असमिया चलचित्र

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

असमिया चलचित्रपट या असमिया सिनेमा, असमिया भाषा का चलचित्र उद्योग है, जो मुख्य तौर पर असम (भारत) में देखा जाता है। इसकी शुरुआत १९३५ में ज्योतिप्रसाद आगरवाला द्वारा बनाई गई फिल्म जॉयमोती के साथ हुई।Joymoti(1935) https://web.archive.org/web/20131002080421/http://www.imdb.com/title/tt0151153/ 2 अक्तूबर 2013 , IMDb.com. उसके बाद असमिया चलचित्र का विकास करने में भाबेंदर नाथ सैकिया एवं जाहनू बरुआ प्रमुख हैंं। लंबे इतिहास और कलात्मक सफलताओं के बावजूद, असमिया सिनेमा भारत में राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सफल नहीं रहा। हालाँकि असमिया फ़िल्मेंं कई बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं। २१वीं सदी के शुरुआत में बड़े पर्दे पर बॉलीवुड शैली की असमिया फ़िल्में बनने लगीं। बाजार के पैमाने पर वह हिंदी चलचित्रों से बहुत पीछे है। इतिहास १९३० असमिया सिनेमा का अस्तित्व एक दूरदर्शी, रूपकोनवार ज्योतिप्रसाद आगरवाला, जो की एक प्रतिष्ठित कवि, नाटककार, संगीतकार और स्वतंत्रता सेनानी भी थे, की परिकल्पना से आरंभ हुआ| उन्होने असम की प्रथम फिल्म जॉयमोती के निर्माण में, चित्रालेखा मूवीटोन के बेनर तले, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रशिक्षित तकनीशियनों की कमी के कारण ज्योतिप्रसाद ने अपनी पहली फिल्म में पटकथा लेखक, निर्देशक, नृत्य निर्देशक, संपादक, गीतकार, संगीत निर्देशक एवं सेट और कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर का अतिरिक्त कार्यभार भी संभाला| यह फिल्म १० मार्च १९३५ में ₹६०००० के बजट के साथ पर्दर्शित की गयी। उस जमाने की बाकी हिन्दी फ़िल्मो की तरह इस फिल्म की भी पूरी प्रति गायब हो गयी। अल्ताफ़ मज़ीद ने निजी तौर पर प्रयास कर फिल्म के कुछ अंश को पुनः स्थापित किया है और उनके उपशीर्षक तेार किए है। जॉयमोती के भारी वितीय नुकसान के बावजूद एक दूसरी फिल्म इन्द्र्मलति को १९३७ और १९३८ के बीच फिल्माया गया जिसे १९३९ में पर्दर्शित की। १९४० विपरीत परिस्थितियो का मजबूती से सामना करते हुए अग्रवाल ने दो साल बाद अपनी दूसरी और आख़िरी फिल्म इंद्रमलती का निर्माण किया। असम के प्रसिद्ध गायक और संगीतकार भुपेन हजारिका ने इस फिल्म में उत्कृष्ट भूमिका निभाई। ज्योतीप्रसाद के निधन के बाद असमिया फ़िल्मो में कुछ समय के लिए खामोशी का दौर छा गया। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद असमिया फिल्म उद्योग में कुछ बदलाव आए। रोहिणी कुमार बरुआ ने इस बात का फयडा उठाते हुए १९४१ में एक प्रासंगिक एतिहसिक विषय पर मानोमेती बनाई। इसके बाद कई फ़िल्मे आई: पार्वती प्रसाद की रुपही (१९४६), कमाल नारायण चौधरी की बदन बरफ़ुकन (१९४७), फणी शर्मा की सिराज, असित सेन की बीपलाबी, प्रबिन फूकन की पर्घाट और सुरेश गोस्वामी की रुनूमी। १९५० पचास के दशक की सबसे उल्लेखनीय फिल्म पीयाली फूकन थी जिसे बाद में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। यह फिल्म रूप ज्योति प्रोडक्षन्स के तत्वावधान में प्रख्यात फिल्म निर्माता गाम प्रसाद अगरवाल द्वारा निर्मित की गयी थी| फिल्म का निर्देशन फणी शर्मा ने किया और भूपेन हज़ारीका इस के संगीतकार थे। यह फिल्म एक स्वतंत्रता सेनानी, पीयाली फूकन के बारे में है, जो ब्रिटिश शासन के विरुध लड़े थे| उन्हे राजद्रोह के अपराध में अंग्रेज़ो ने फाँसी पर लटकाया था। यह फिल्म उस समय की अन्य फ़िल्मो की तुलना में सबसे आधुनिक फिल्म थी। स्मृत पारस (१९५५) नाम की फिल्म के साथ निप बरुआ ने निर्देशन की दुनिया में अपना पहला कदम रखा। उनकी अन्य फ़िल्मे मॅक आरू मोरं और रंगा पुलिस ने विभिन्न राज्य पदक एवं राष्ट्रीय स्तर पर रजत पदक जीता। श्रेणी:फ़िल्म श्रेणी:असमिया चलचित्र