411 REFERENCE · Wikipedia
बाञ्छानिधि महान्ति
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
बाञ्छानिधि महान्ति ବାଞ୍ଛାନିଧି ମହାନ୍ତି 20 अप्रैल 1897 Banchhanidhi Mohanty Statue.jpg ईरम में बाञ्छानिधि महान्ति की मूर्ति ईरम, भद्रक जिला, ओड़िशा, ब्रिटिश भारत 19 अप्रैल 1938 भद्रक, ओड़िशा, ब्रिटिश भारत भारतीय कवि, गायक, स्वतंत्रता सेनानी देशभक्तिपूर्ण कविता एवं गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, उत्कल एकीकरण आंदोलन
बाञ्छानिधि महान्ति (20 अप्रैल 1897 – 19 अप्रैल 1938) ओड़िशा के कवि, गायक और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे अपने ओजस्वी देशभक्तिपूर्ण गीतों और कविताओं के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनचेतना उत्पन्न करने के लिए प्रसिद्ध थे। ओड़िशा के इतिहास और साहित्य से संबंधित स्रोत उन्हें राष्ट्रीयतावादी कवि तथा स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में वर्णित करते हैं।District Gazetteer / Bhadrak District भद्रक जिला प्रशासन, ओड़िशा सरकारExploring Unsung Chapters: Freedom Struggle of Odisha गंगाधर मेहर विश्वविद्यालय
प्रारंभिक जीवन
बाञ्छानिधि महान्ति का जन्म 20 अप्रैल 1897 को भद्रक जिले के ईरम में चिंतामणि महान्ति और पवित्रा देवी के घर हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि संगीत, लेखन और सामाजिक सेवा में थी।निशाकर राउत संग्रामी कवि बाञ्छानिधि धरित्री 20 अप्रैल 2023
उन्होंने भद्रक में शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन में ही वे संगीत और वाद्ययंत्रों के प्रति आकर्षित हुए। उनके मित्र वैष्णव चरण दास ने संगीत के क्षेत्र में उनकी रुचि विकसित करने में सहायता की। उन्होंने 1911 में मैट्रिक की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की।
उनके विद्यार्थी जीवन में ही राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक प्रश्नों के प्रति रुचि विकसित हो गई थी। बाद में वे राष्ट्रवादी साहित्यकारों और स्वतंत्रता सेनानियों के संपर्क में आए। इनमें उत्कलमणि गोपबन्धु दास और कांतकवि लक्ष्मीकान्त महापात्र प्रमुख थे।
स्वतंत्रता आंदोलन
बाञ्छानिधि महान्ति ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उपलब्ध शोध-सामग्री के अनुसार उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश किया और आंदोलन के दौरान कई बार कारावास भुगता। विद्यार्थी जीवन में भी वे विभिन्न छात्र आंदोलनों में सक्रिय रहे थे।
उनकी मुख्य भूमिका राजनीतिक कार्यकर्ता के साथ-साथ जनकवि और गायक की थी। वे अपने कंधे पर हारमोनियम लेकर विभिन्न गाँवों में जाते और देशभक्ति के गीत गाकर लोगों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जागरूक करते थे। उनके गीतों में स्वाधीनता, स्वदेशी, राष्ट्रीय आत्मसम्मान और औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना प्रमुख थी।
ओड़िशा सरकार के एक प्रकाशन में उन्हें देशभक्त कवि के रूप में दर्ज किया गया है तथा उल्लेख है कि उनकी कुछ कविताओं को ग्रामोफोन रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड किया गया था और ब्रिटिश शासन के समय वे रिकॉर्ड बेचे जाते थे।
साहित्यिक योगदान
बाञ्छानिधि महान्ति की साहित्यिक पहचान मुख्यतः उनकी देशभक्तिपूर्ण कविताओं और गीतों से बनी। उन्होंने कविता तथा संगीत को जनजागरण का माध्यम बनाया। उनकी रचनाएँ सरल, ओजपूर्ण और जनता में आसानी से लोकप्रिय होने वाली थीं।देव त्रिपाठी कवि बाञ्छानिधि महान्ति अन्तरंगा कलिंग 30 मई 2020
उनकी रचनाओं में भारतीय स्वतंत्रता, स्वराज, विदेशी शासन के विरोध और सामाजिक जागृति के विषय प्रमुख थे। उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं पर भी गीत और पाला लिखे। उनके लेखन में गोलमेज सम्मेलन, खादी तथा स्वदेशी जैसे समकालीन राजनीतिक विषयों का उल्लेख मिलता है।
उनके देशभक्तिपूर्ण गीतों में "गाओ स्वतंत्र भारत" विशेष रूप से उल्लेखित है। उनके गीतों का उद्देश्य जनता में स्वतंत्रता की आकांक्षा और राष्ट्रीय चेतना को प्रबल करना था।
कांतकवि लक्ष्मीकान्त महापात्र के गीतों का प्रचार
बाञ्छानिधि महान्ति केवल अपने गीतों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य राष्ट्रवादी कवियों की रचनाओं को जनता तक पहुँचाने के लिए भी प्रसिद्ध थे।
ओड़िशा सरकार द्वारा प्रकाशित *Odisha Review* के अनुसार वे कांतकवि लक्ष्मीकान्त महापात्र के देशभक्तिपूर्ण गीतों को पूरे ओड़िशा में गाया करते थे और लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे।Odisha Review अप्रैल 2013 ओड़िशा सरकार
इस प्रकार उनकी भूमिका साहित्यकार, गायक और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच एक सेतु के रूप में थी। उन्होंने साहित्य को केवल लेखन तक सीमित न रखकर उसे सार्वजनिक जनजागरण का माध्यम बनाया।
उत्कल आंदोलन
बाञ्छानिधि महान्ति ओड़िया भाषा-भाषी क्षेत्रों के एकीकरण और पृथक ओड़िशा प्रांत की मांग से जुड़े राष्ट्रवादी आंदोलन से भी प्रभावित थे। उनके लेखन और सार्वजनिक गतिविधियों में ओड़िया राष्ट्रीय चेतना तथा उत्कल की एकता का विचार दिखाई देता है।
वे उस पीढ़ी के राष्ट्रवादी साहित्यकारों में थे जिनके लिए भारतीय स्वतंत्रता के साथ-साथ ओड़िया भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था।
सामाजिक चेतना
बाञ्छानिधि महान्ति की कविताओं में केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का विचार नहीं था। उन्होंने ग्रामीण समाज की गरीबी, आर्थिक शोषण और सामाजिक समस्याओं को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उनके गीतों का उद्देश्य सामान्य लोगों को उनकी सामाजिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों के प्रति जागरूक करना था।
उनकी रचनात्मक शैली में लोकसंगीत और लोकप्रिय गायन परंपरा का प्रभाव था। इस कारण उनकी कविताएँ शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित न रहकर ग्रामीण जनता के बीच भी पहुँच सकीं।
ईरम और स्वतंत्रता आंदोलन
ईरम भद्रक जिले का एक महत्वपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन केंद्र था। बाञ्छानिधि महान्ति का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ और उन्होंने इस क्षेत्र में राष्ट्रवादी चेतना फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ईरम बाद में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुए गोलीकांड के कारण रक्ततीर्थ ईरम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाञ्छानिधि महान्ति की मृत्यु 1938 में हो चुकी थी; अतः 1942 के ईरम गोलीकांड में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी। हालांकि, उनके पहले के राष्ट्रवादी गीतों और जनजागरण की गतिविधियों को ईरम की स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक परंपरा के संदर्भ में स्मरण किया जाता है।
मृत्यु
बाञ्छानिधि महान्ति का निधन 19 अप्रैल 1938 को हुआ। इस प्रकार वे 41 वर्ष की आयु पूरी करने से एक दिन पहले ही दिवंगत हुए।
उनकी मृत्यु स्वतंत्रता प्राप्ति से लगभग नौ वर्ष पहले हुई, लेकिन उनके देशभक्तिपूर्ण गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोकप्रिय बने रहे और बाद की पीढ़ियों में भी उनका स्मरण होता रहा।
विरासत
बाञ्छानिधि महान्ति को ओड़िशा में राष्ट्रीय कवि, देशभक्त गायक और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्मरण किया जाता है। भद्रक जिले के इतिहास और ओड़िशा के स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रकाशित सामग्री में उनका उल्लेख उन साहित्यकारों में किया गया है जिन्होंने कविता और संगीत के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को जनसाधारण तक पहुँचाया।
ओड़िशा सरकार के प्रकाशनों में उन्हें देशभक्त कवि के रूप में शामिल किया गया है। उनकी रचनाओं के ग्रामोफोन रिकॉर्ड के रूप में प्रसारित होने का उल्लेख भी उनकी लोकप्रियता का संकेत माना जाता है।
उनकी स्मृति विशेष रूप से भद्रक और ईरम क्षेत्र की राष्ट्रवादी विरासत से जुड़ी हुई है।
यह भी देखें
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
भारत छोड़ो आंदोलन
गोपबन्धु दास
लक्ष्मीकान्त महापात्र
भद्रक जिला
आधार
श्रेणी:1897 में जन्मे लोग
श्रेणी:1938 में निधन
श्रेणी:ओड़िया कवि
श्रेणी:ओड़िशा के स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:भद्रक जिले के लोग
श्रेणी:भारतीय कवि