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एडवर्ड सपीर
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300px|right|thumb|एडवर्ड सपीर (१९१० में)
एडवर्ड सपीर (Edward Sapir ; १८८४-१९३९ ई.) अमेरिकी नृतात्विक भाषावैज्ञानिक थे।
परिचय
एडवर्ड सपीर का जन्म सन् 1884 ई. में लीओबार्क पोलैंड (Leobark Poland) स्थित पश्च्मि पोमेरेनिआ (Western Pomerania) के लाएन्बर्ग (Lauenburg), में हुआ था। वे लिथुआनियन यहूदियों के वंशज थे जिन्होंने पहले इंग्लैड में प्रवास किया और फिर सन् 1889 में संयुक्त राज्य अमेरिका में आकर रहे। अन्तिम के पाँच वर्षों में ये न्यूयार्क सीटी के निम्न पूर्वी क्षेत्र में आकर बस गए। उस समय सपीर की उम्र मात्र दस वर्ष की थी। वे प्रारंभ से ही अकादमिक रूप से एक मेहनती छात्र रहे जिसके फलस्वरूप उन्हें चौदह वर्ष की अल्पायु में ही पुलित्जर छात्रवृत्ति प्रदान की गई जो न्यूयार्क के हॉरेस मैन स्कूल में पढ़ने के लिए योग्य छात्रों को प्रदान की जाती है। वर्तमान में यह विद्यालय देश के सर्वाधिक लोकप्रिय और उच्चकोटि के विद्यालयों में गणनीय है। बावजूद इसके इन्होंने पब्लिक स्कूल में ही पठन-पाठन का निर्णय लिया। सन् 1901 ई. में कोलम्बिया विश्वविद्यालय में नामांकित होने के उपरान्त इन्होंने पुरस्कृत छात्रवृत्ति का लाभ उठाया।
20 वर्ष की आयु में तीन वर्षीय स्नातक डिग्री लेने के उपरान्त इन्होंने भाषाई संबन्धी, जर्मनिक एवं भारतीय वांमीमांसा को अपने अध्ययन में केन्द्रीय रूप से स्थान दिया जो तत्कालीन समय में उपलब्ध भाषाई-अध्ययन का सैद्धांतिक क्षेत्र था। स्नाकोत्तर डिग्री कार्यक्रम के अन्तर्गत इस अध्ययनक्रम को बढ़ाते हुए इन्होंने नृतत्त्वविज्ञान के सिद्धांतों के आलोक में भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का विश्लेषण किया और फ्रैन्ज बाओज के साथ कुछ पाठ्यक्रमों का निर्माण भी किया। बाओज ने सपीर में भाषावैज्ञानिक की उभरती प्रतिभा को पहचाना एवं उन्हें प्रोत्साहित किया।
सन् 1905 ई. में “Herder’s essay on the origin of language” शीर्षक पर शोध-प्रबन्ध के साथ सपीर ने अपनी स्नाकोत्तर डिग्री पूरी की। भाषाई क्षेत्र में उपस्थित तथ्यों और भाषिक विश्लेषण के अनेक अवसर से प्रभावित होकर इन्होंने बाओज के मार्गदर्शन में स्नाकोत्तर अध्ययन को प्रगतिशील रखा। इसी वर्ष बाओज ने इन्हें वास्को और विस्राम चिनुक पर प्रथम फिल्ड वर्क के लिए भेजा। सन् 1906 के लगभग एक वर्ष के फिल्ड वर्क के दौरान ये ओरेगन (oregen) की दो भाषा ताकेल्मा (Takelma) और कास्ता कोस्ता (casta costa) पर अपने शोध-प्रबन्ध के लिए सामग्री-संकलन कर वापस लौटे। शोध-प्रबन्ध लिखने के पूर्व ही ये बाओज के पूर्व छात्र एल्फ्रेड क्रोयबर (Alfred Kroeber) जो कैलिफोर्नियन भारतीयों की भाषा एवं संस्कृति के सर्वेक्षण के प्रभारी थे, के निर्देशन में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में शोध-सहायक के रूप में नियुक्त हुए।
सन् 1908 ई. में इन्हें पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय में शिक्षण और शोध के क्षेत्र में फेलोशिप से पुरस्कृत हुए जहाँ ये काटाब्बा (Catabba) में कार्यरत थे। कोलम्बिया विश्वविद्यालय द्वारा इन्हें सन् 1909 ई. में पी.एच.डी. की उपाधि प्रदान की गई परंतु उस समय भी ये अपने छात्रों के साथ भाषा संबन्धित कार्य में संलग्न रहे।
सपीर पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय में अमेरिकन भाषाओं के विश्लेषण से जुड़े रहे तथा इसी विश्वविद्यालय में अपने दूसरे वर्ष के कार्यकाल में दक्षिणी पेउत (Paiute) एवं होपी व क्षेत्रीय विधियों में स्नातक छात्रों को प्रशिक्षित करते हुए निर्देशक के रूप कार्यरत रहे। सन् 1910 ई. में इन्होंने भूगर्भीय सर्वेक्षण, खनिज संकाय के नृतत्त्वविज्ञान विभाग में प्रथम मुख्य एंथ्रोपोलॉजिस्ट के रूप में पदभार संभाला। इसी वर्ष ओटावा में इनका विवाह हुआ और अपनी पत्नी के साथ वहीं रहने लगे। सोलह वर्षों तक इस पद पर कार्यरत रहते हुए इन्होंने उत्तरी, पश्चमी एवं पूर्वी कनाडा के बहुसंख्यक भाषाओं, यथा- नूटका, वैनुकरणीय भाषा, त्लाइंगित, उत्तरी पश्चमि प्रशांती भाषा, एलबेट्रा (Albetra) में सार्सी और उत्तरी कनाडा के कुचिक (Kutchik) और इंग्लिक (Inglik) भाषा पर कार्य किया।
सपीर की पत्नी लंबे समय से शारीरिक एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ रहने के कारण सन् 1914 ई. में सपीर को उनके तीन बच्चों के साथ अकेला छोड़ कर चली बसी। उनकी मदद करने उनकी माँ आई। इस दौरान इन्होंने अपने कोलम्बिया एवं पेन्सिलवेनिया में बिताए पूर्व अध्ययनकाल की कमी बौद्धिक रूप से महसूस की। बावजूद इसके इन्होंने भाषावैज्ञानिक कार्य को जारी रखा। फिर भी ओटावा में बिताए वर्षों में ही इन्होंने अपने महत्तम कार्य संपन्न किये। इनका यह कार्य 1921 के रूपरेखा से संबन्धित था जिसमें इन्होंने अमेरिकन भाषाओं को उनके छ: भाषा परिवार में वर्गीकृत किया जिसका वर्णन उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ “Language: An introduction to the study of speech” में मिलता है। यह उनके जीवनकाल की एकमात्र पुस्तक थी जिसमें उन्होंने भाषाविज्ञान के सांस्कृतिक एवं समाजवैज्ञानिक सिद्धांतों को अत्यंत उच्च कोटि लेखन द्वारा प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ में इन्होंने स्वनिम तथा रूपस्वनिमिकी का समावेश किया और अपनी ओर से भाषाविश्लेषण कर एक प्रदर्श (model) प्रस्तुत किया। लेकिन इस ग्रन्थ की विशेषता इस बात में है कि इन्होंने भाषा और संस्कृति के संबन्ध पर बल दिया तथा भाषा के रूप पक्ष (form) के वर्णन में सौंदर्य और सुघड़ता का समावेश किया। आगे चलकर ब्लूमफील्ड और सस्यूर ने इनके अध्ययन को नवीन रूप प्रदान किया। 1920 ई. के प्रारंभ में ये लिंग्विस्टिक सोसायटी ऑफ अमेरिका को बनाने में व्यस्त रहे। इस बीच उन्होंने Language नामक जर्नल निकाला एवं ओटावा में कुछ वर्षों तक कविता लेखन, आलोचना एवं संगीत कला का आस्वाद लिया। परंतु इनका अधिकांश समय छात्रों को विधि और सिद्धांत द्वारा प्रशिक्षित करने में व्यतीत होता था।
इस प्रकार 1925 ई. में उन्नति की दिशा में अग्रसर होते हुए इन्हें शिकागो विश्वविद्यालय की ओर से अध्यक्ष पद के लिए नौकरी का प्रस्ताव आया जो समाजभाषाविज्ञान में सशक्त संकायों को उन्नत करने में प्रयत्नशील था। इन्होंने स्वयं को इक्लेक्टिक एवं अन्तरानुशासिक महत्त्वों में एक गंभीर विचारक के रूप में देखा तथा इसी बौद्धिक उत्साह के साथ इस क्षेत्र से जुड़ गए। दो वर्षों के अंदर ही ये नृतत्त्वविज्ञान एवं सामान्य भाषाविज्ञान के प्रोफेसर के रूप में पदासीन हुए। साथ ही विवरणात्मक भाषाविज्ञान जिसमें ह्यूपा और नवाजों पर आधारित क्षेत्रीय कार्य भी सम्मिलित थे, का निरंतर विकास करते रहे तथा सर्वाधिक महत्त्व का विषय जो मानव के संस्कृति और व्यक्तिगत मनोविज्ञान से संबन्धित था, का सैद्धांतिक विवरण प्रस्तुत किया। साथ ही स्वतंत्र अनुशासन भूगर्भशास्त्र और नृतत्त्वविज्ञान एवं समाजविज्ञान के विस्तृत संदर्भ में भाषाविज्ञान की भूमिका प्रस्तुत की। लिंग्विस्टिक सोसायटी ऑफ अमेरिका की स्थापना एवं उसकी पत्रिका के द्वारा इन्होंने संयुक्त राज्य में भाषावैज्ञानिक क्षेत्र में मजबूत आधार स्तंभ खड़ा किया।
सन् 1927 ई. में पुनर्विवाह कर पत्नी एवं बच्चों के साथ एक सुखद एवं सामाजिक जीवन व्यतीत करने लगे जिसमें इन्हें अत्यंत गंभीरता से अपने संबन्धित विषय पर विचार करने का लंबा अवसर मिला। शिकागो में अध्यक्ष पद पर रहते हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था कि इसी बीच 1931 ई. में उन्हें येल (Yale) में नृतत्त्वविज्ञान एवं भाषाविज्ञान के प्रामाणिक प्रोफेसर के पद से अलंकृत किया गया। यह एक सम्मानीय पद था जिसके साथ सुखद भविष्य को लेकर अनेक अपेक्षाएँ जुड़ी थीं। फलस्वरूप इन्होंने वचनबद्ध एवं दृढ़ संकल्प के साथ अध्ययन-अध्यापन कार्य प्रारंभ किया, जिसमें शिकागो के छात्र उनके साथ मिलकर वहीं एक “संकाय” की स्थापना की जो ‘Sapirian method and theory’ के लिए समर्पित था। सन् 1937 ई. के मध्य वे लिंग्विस्टिक सोसायटी ऑफ अमेरिका के समर संस्था में अध्यापन करने लगे जिसके दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा। अस्वस्थ अवस्था में भी वे शिक्षण क्षेत्र से जुड़े रहे। दूसरी बार दिल का दौरा पड़ने के उपरान्त, उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया। परंतु फरवरी 1939 ई. में 55 वर्ष की आयु में ही दिल की बीमारी के चलते उनका देहांत हो गया।
सपीर बेन्जिमिन लीवोर्फ के गुरु थे, जिन्होंने (लीवोर्फ ने) येल (Yale) में उनके संरक्षण में अध्ययन किया और उनके अस्वस्थ अवस्था में छात्रों को पढ़ाया। वोर्फ ने होपी भाषा पर भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया एवं भाषा और विचार के संबन्धों पर प्रस्तुत सपीर के विचार को अपने विचारों द्वारा संशोधित कर नए आवरण में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप यही विचार कालांतर में “Sapir-Whorf hypothesis” या वोर्फ के शब्दों में “Principle of Linguistics relativity” नाम से प्रतिपादित हुआ।
बाहरी कड़ियाँ
National Academy of Sciences biography
Edward Sapir Collection at Bartleby.com at www.bartleby.com
Robert Throop and Lloyd Gordon Ward: Mead Project 2.0 at spartan.ac.brocku.ca
https://web.archive.org/web/20050527055842/http://www.yale.edu/linguist/Sapir.html
Edward Sapir at www.mnsu.edu
Interlingua: Communication Sin Frontiera. Biographia, Edward Sapir
श्रेणी:अमेरिकी भाषावैज्ञानिक
श्रेणी:भाषा-विज्ञान