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शुद्धाद्वैत
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शुद्धाद्वैत वल्लभाचार्य (1479-1531 ई) द्वारा प्रतिपादित दर्शन है। वल्लभाचार्य पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक हैं। यह एक वैष्णव सम्प्रदाय है जो श्रीकृष्ण की पूजा अर्चना करता है। वल्लभाचार्य का जन्म चंपारण में हुआ।बनारस में दीक्षा पूरी करके अपने गृहनगर विजयनगर चले गए जहां इनको कृष्णदेवराय का संरक्षण प्राप्त हुआ।
शुद्धाद्वैत दर्शन, आचार्य शंकर के अद्वैतवाद से भिन्न है। 'केवलाद्वैत' मत में जहां माया शबलित ब्रह्म को जगत् का कारण माना गया है एवं सम्पूर्ण जगत् को मिथ्या कहा गया है, वहीं शुद्धाद्वैत मत में माया सम्बन्धरहित नितान्त शुद्ध ब्रह्म को जगत् का कारण माना जाता है।
आचार्य शंकर अपने सिद्धान्त के अनुरूप अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं। परन्तु श्रीवल्लभाचार्यचरण भगवान् कृष्णद्वैपायनव्यास के मतानुसार ‘‘शुद्धाद्वैत साकार ब्रह्मवाद“ का प्रतिपादन करते हैं। ‘‘साकार ब्रह्मवादैकस्थापकः“ ।
श्रीवल्लभाचार्यजी स्पष्ट आज्ञा करते हैं ‘‘शब्द एव प्रमाणम्“ ‘‘तत्राप्यलौकिकज्ञापकमेंव, तत् स्वतः सिद्धप्रमाणभावं प्रमाणम्“। प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भ्रान्तत्व का भी दर्शन होने से उनका प्रामाण्य एकान्तिक नहीं हो सकता। अतः उन सबों को न कहकर केवल ‘‘शब्द प्रमाण“ को ही स्वीकार किया गया है एवं उसमें भी अलौकिक ज्ञापक शब्द का ही स्वीकार है।
केवलाद्वैत में जहां द्वैत को सर्वथा मायिक मानते हुए जगत् को मिथ्या माना गया है तथा जीव को ब्रह्म का प्रतिबिम्ब माना गया है ( अर्थात् जीव ही ब्रह्म है), वहीं शुद्धाद्वैत में ‘‘ब्रह्मसत्यं जगत्सत्यं अंशोजीवोहि नापरः“ (ब्रह्म सत्य है, जगत सत्य है, जीव ब्रह्म का अंश है) ऐसा कहा गया है।
इन्हें भी देखें
अद्वैतवाद
द्वैताद्वैत
द्वैतवाद
बाहरी कड़ियाँ
शुद्धाद्वैत ब्रह्मवाद
श्रेणी:भारतीय दर्शन