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छठ पूजा
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छठ पूजा छठ पूजा छठि, छठ व्रत, छठ, छठी मइया की पूजा, रनबे माय पूजा, छठ पर्व, डाला छठ, सूर्य षष्ठीhttp://www.chhathpuja.co/community/viewgroup/73-chhath-puja-history-origin-rituals-and-traditions-,-the-yogic-philosophy-of-chhath-benefits-of-chhath-process-daily-sun-meditation-chhath-process-7-8-november-2013 : छठ 14 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20180821094600/http://www.chhathpuja.co/community/viewgroup/73-chhath-puja-history-origin-rituals-and-traditions-,-the-yogic-philosophy-of-chhath-benefits-of-chhath-process-daily-sun-meditation-chhath-process-7-8-november-2013 21 अगस्त 2018 dead मैथिल, मगध, बंगाली, भोजपुरी भारतीय,भारतीय प्रवासी और नेपाली सर्वकामना पूर्ति कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को (दीपावली के बाद छठा दिन) ६ - ९ नवम्बर २०१४http://www.chhathpuja.co/community/viewbulletin/2334-chhath-puja-2014-date,-surya-sashthi-2014-date,-dala-chhath-2014-date,-chhath-2014-date,-chhath-pooja-2014-dates?groupid=2057 : छठ तारीख़ 2013 14 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20150610205908/http://www.chhathpuja.co/community/viewbulletin/2334-chhath-puja-2014-date,-surya-sashthi-2014-date,-dala-chhath-2014-date,-chhath-2014-date,-chhath-pooja-2014-dates?groupid=2057 10 जून 2015 dead २७ - ३० अक्टूबर २०१४http://www.chhathpuja.co/community/viewbulletin/2334-chhath-puja-2014-date,-surya-sashthi-2014-date,-dala-chhath-2014-date,-chhath-2014-date,-chhath-pooja-2014-dates?groupid=2057 : छठ तारीख़ 14 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20150610205908/http://www.chhathpuja.co/community/viewbulletin/2334-chhath-puja-2014-date,-surya-sashthi-2014-date,-dala-chhath-2014-date,-chhath-2014-date,-chhath-pooja-2014-dates?groupid=2057 10 जून 2015 dead सूर्योपासना, निर्जला व्रत उपवास(बिना पानी के), नदियों या जल निकायों में डुबकी लगाना, पानी में खड़े होकर प्रार्थना करना, सूर्य को लंबे समय तक देखना और सूर्य को सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान ‘प्रसाद’ चढ़ाना शामिल हैं ललही छठ,चैती छठ, बैसक्खा छठ, अगहनिया छठ http://www.chhathpuja.co/community/viewgroup/631-lalahi-chhath-puja-2013,-har-chhath,-hal-chhath-puja,-har-chhath-puja-2013,-harhhath-puja-bihar,-lalahi-chhath,-lalahi-chhath-vrat,-hal-chhath-2013 : सम्बन्धित त्योहार 14 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20131206072426/http://www.chhathpuja.co/community/viewgroup/631-lalahi-chhath-puja-2013,-har-chhath,-hal-chhath-puja,-har-chhath-puja-2013,-harhhath-puja-bihar,-lalahi-chhath,-lalahi-chhath-vrat,-hal-chhath-2013 6 दिसंबर 2013 dead त्योहार
right|thumb|300px|नदी के घाट पर छठ पूजा का दृष्य
छठ पर्व, छठि या षष्ठी पूजाhttps://www.wirekhabar.com/religion/why-hindu-celebrate-chhath-puja-know-all-about-history-origin-story-rituals-of-this-festival-interesting-facts.html छठ पूजा मनाने के पीछे प्रचलित हैं ये खास बातें और कहानियाँ, ...जानिए 2025-10-25 WireKhabar hindi हिन्दुओं का नेपाली-भारतीय पर्व है जिसमें सूर्य की पूजा-उपासना की जाती है। यह कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के षष्ठी (सूर्य षष्ठी / दीपावली के बाद छठे दिन) को मनाया जाता है।https://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/a-puja-with-health-benefits/articleshow/61189959.cms A puja with health benefits | Patna News - Times of India द टाइम्स ऑफ़ इंडिया 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20190328100821/https://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/a-puja-with-health-benefits/articleshow/61189959.cms 28 मार्च 2019 livehttps://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/chhath-rituals-bring-family-together/articleshow/61190103.cms Chhath rituals bring family together | Patna News - Times of India द टाइम्स ऑफ़ इंडिया 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20171024211139/https://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/chhath-rituals-bring-family-together/articleshow/61190103.cms 24 अक्तूबर 2017 live सूर्योपासना का यह लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। दीपावली के छठे दिन से शुरू होने वाला छठ का पर्व चार दिनों तक चलता है। छठ का व्रत एक कठिन व्रत है जिसमें षष्ठी भगवती की पूजा-अर्चना करके पुत्र, पति एवं परिवार के कल्याण की कामना की जाती है।
यह पर्व मैथिल,मगही और भोजपुरी लोगों का सबसे बड़ा पर्व कहा जा सकता है । छठ हिन्दुओं का ऐसा एकमात्र पर्व है जो वैदिक काल से चला आ रहा है। यह पर्व ऋग्वेद में वर्णित सूर्य पूजन एवं उषा पूजन तथा आर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता हैं।
thumb|सूर्य भगवान- महापर्व छठ पूजा समिति बेलदरिया, बिहार
बिहार मे इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलम्बी भी मनाते देखे जाते हैं।https://www.business-standard.com/article/news-ians/some-muslims-too-celebrate-chhath-in-bihar-114102900706_1.html Some Muslims too celebrate Chhath in Bihar 29 अक्टूबर 2014 14 मई 2019 बिजनेस स्टैण्डर्ड https://web.archive.org/web/20190514045040/https://www.business-standard.com/article/news-ians/some-muslims-too-celebrate-chhath-in-bihar-114102900706_1.html 14 मई 2019 livehttp://khabar.josh18.com/news/5083/9 Josh18.com Is For Sale khabar.josh18.com 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20180821094018/http://khabar.josh18.com/news/5083/9 21 अगस्त 2018 dead धीरे-धीरे यह त्योहार प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है। http://hindi.economictimes.indiatimes.com/india/national-india/Chhath-Puja-celebrated-with-great-pomp-in-the-U-S-/articleshow/25607133.cms अमेरिका में भी धूमधाम से मनायी गयी छठ पूजा नवभारत टाईम्स 12 नवम्बर 2013 13 नवम्बर 2013 https://web.archive.org/web/20131113101720/http://hindi.economictimes.indiatimes.com/india/national-india/Chhath-Puja-celebrated-with-great-pomp-in-the-U-S-/articleshow/25607133.cms 13 नवंबर 2013 live छठ पूजा सूर्य, प्रकृति,जल, वायु और उनकी बहन छठी मइया को समर्पित है ताकि उन्हें पृथ्वी पर जीवन की देवतायों को बहाल करने के लिए धन्यवाद, छठी मैया, जिसे मिथिला में रनबे माय भी कहा जाता है, भोजपुरी में सबिता माई और बंगाली में रनबे ठाकुर बुलाया जाता है। पार्वती का छठा रूप भगवान सूर्य की बहन छठी मैया को त्योहार की देवी के रूप में पूजा जाता है। यह चंद्र के छठे दिन काली पूजा के छह दिन बाद छठ मनाया जाता है। मिथिला में छठ के दौरान मैथिल महिलाएं, मिथिला की शुद्ध पारंपरिक संस्कृति को दर्शाने के लिए बिना सिलाई के शुद्ध सूती धोती पहनती हैं। https://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/a-festival-not-confined-to-bihar/articleshow/61208996.cms A festival not confined to Bihar | Patna News - Times of India द टाइम्स ऑफ़ इंडिया 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20171223231209/https://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/a-festival-not-confined-to-bihar/articleshow/61208996.cms 23 दिसंबर 2017 live
त्यौहार के अनुष्ठान कठोर हैं और चार दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान, उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना, और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। परवातिन नामक मुख्य उपासक (संस्कृत पार्व से, जिसका मतलब 'अवसर' या 'त्यौहार') आमतौर पर महिलाएं होती हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष इस उत्सव का भी पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। छठ महापर्व के व्रत को स्त्री - पुरुष - बुढ़े - जवान सभी लोग करते हैं। http://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/Men-not-far-behind-women-in-celebrating-Chhath/articleshow/55251895.cms Men not far behind women in celebrating Chhath live https://web.archive.org/web/20161111122821/http://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/Men-not-far-behind-women-in-celebrating-Chhath/articleshow/55251895.cms 11 November 2016 dmy-all कुछ भक्त नदी के किनारों के लिए सिर के रूप में एक प्रोस्टेशन मार्च भी करते हैं।
पर्यावरणविदों का दावा है कि छठhttps://www.chillyblog.com/2019/10/chhath-puja-kab-kiu-aur-kese-mnaae.html Chhath Puja Kab Kiu aur Kese Mnaae Jaati Hai? ChillyBlog 2019-10-18 https://web.archive.org/web/20191018041856/https://www.chillyblog.com/2019/10/chhath-puja-kab-kiu-aur-kese-mnaae.html 18 अक्तूबर 2019 dead सबसे पर्यावरण-अनुकूल हिंदू त्यौहार है।http://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/Chhath-the-most-eco-friendly-festival-Environmentalists/articleshow/55266563.cms Chhath the most eco-friendly festival: Environmentalists live https://web.archive.org/web/20161111004925/http://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/Chhath-the-most-eco-friendly-festival-Environmentalists/articleshow/55266563.cms 11 November 2016 dmy-allhttps://www.telegraphindia.com/1141028/jsp/bihar/story_18972561.jsp Ode to god of green things live https://web.archive.org/web/20170801122445/https://www.telegraphindia.com/1141028/jsp/bihar/story_18972561.jsp 1 August 2017 dmy-all यह त्यौहार नेपाली और भारतीय लोगों द्वारा अपने डायस्पोरा के साथ मनाया जाता है।
शुरुआत
ऐतिहासिक रूप से, मुंगेर सीता मनपत्थर (सीता चरण) सीताचरण मंदिर के लिए जाना जाता है जो मुंगेर में गंगा के बीच में एक शिलाखंड पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि माता सीता ने मुंगेर में छठ पर्व मनाया था। इसके बाद ही छठ महापर्व की शुरुआत हुई। इसीलिए मुंगेर और बेगूसराय में छठ महापर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।https://www.livehindustan.com/bihar/munger/story-mata-sita-performed-chhath-puja-in-munger-5027410.amp.html Sitacharan Temple." Live Hindustan.livehindustan.com 8 Nov 2021
thumb|दाएँ| देव सूर्य मंदिर (देव औरंगाबाद, बिहार)
एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में रनबे (छठी मैया) अपनी पुत्री की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। https://www.jagran.com/bihar/aurangabad-lord-vishwakarma-himself-built-the-deo-sun-temple-of-aurangabad-14972227.html विश्वकर्मा ने बनाया था यह सूर्य मंदिर, पूजा से पूरी होतीं मनोकामनाएं दैनिक जागरण 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20181128210705/https://www.jagran.com/bihar/aurangabad-lord-vishwakarma-himself-built-the-deo-sun-temple-of-aurangabad-14972227.html 28 नवंबर 2018 live
नामकरण
छठ, षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के बाद मनाये जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाये जाने के कारण इसका नामकरण छठ व्रत पड़ा।
छठ पूजा साल में दो बार होती है एक चैत मास में और दुसरा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है। षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि के दिन में हम षष्ठी माता की पूजा करते हैं षष्ठी माता कि पुजा घर परिवार के सदस्यों के सभी सदस्यों के सुरक्षा एवं स्वास्थ्य लाभ के लिए करते हैं षष्ठी माता की पूजा, सुरज भगवान और मां गंगा की पूजा देश में एक लोकप्रिय पूजा है। यह प्राकृतिक सौंदर्य और परिवार के कल्याण के लिए की जाने वाली एक महत्वपूर्ण पूजा है। इस पुजा में गंगा स्थान या नदी तालाब जैसे जगह होना अनिवार्य हैं यही कारण है कि छठ पूजा के लिए सभी नदी तालाब कि साफ सफाई किया जाता है और नदी तालाब को सजाया जाता है प्राकृतिक सौंदर्य में गंगा मैया या नदी तालाब मुख्य स्थान है http://www.chhathpuja.co/appeal-to-donate?groupid=777 : छठ फ़ोटो 14 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20160305000412/http://www.chhathpuja.co/appeal-to-donate?groupid=777 5 मार्च 2016 dead
thumb|मगही छठ गीत
लोक आस्था का पर्व
right|thumb|लोक आस्था का पर्व छठ
thumb|सूर्य भगवान की तस्वीर- छठ पूजा घाट (बेलदरिया, बिहार)
भारत में छठ सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है। मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है।https://www.prabhatkhabar.com/state/bihar/patna/chhath-puja-2020-starts-from-nahai-khai-know-what-is-the-importance-of-surya-puja-in-chhath-festival-skt Chhath puja 2020: चार दिवसीय महापर्व छठ की कल से शुरूआत, जानें सूर्य के उपासना का इस पर्व में क्या है महत्व प्रभात खबर hi 2020-11-18 पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं। छठ व्रत के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं; उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को उनका राजपाट वापस मिला। लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। छठ पर्व भोजपुरी डाकयूमेंटी फिल्म बिहार फिल्म निगम बिहार सरकार द्बारा सुटिंग अनुमति प्राप्त करने के बाद प्रबुद्ध इंटरटेनमेंट प्रोडक्शन हाउस नेचुआ जलालपुर गोपालगंज बिहार ने जनमानस के लिए निर्मित किया है।
छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (Ultra Violet Rays) पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा सम्भव है। पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है।
सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुँचता है, तो पहले वायुमंडल मिलता है। वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुँच पाता है। सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है।https://www.jagran.com/west-bengal/darjeeling-news-chath-puja-21069349.html स्वच्छता व प्रकृति को जोड़ता है छठ पर्व दैनिक जागरण hi 2020-11-18 अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ होता है।
छठ जैसी खगोलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुँच जाती हैं। वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरान्त आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।
छठ पर्व किस प्रकार मनाते हैं ?
यह पर्व चार दिनों का है। भैयादूज के तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है। पहले दिन सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। अगले दिन से उपवास आरम्भ होता है। व्रति दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब ७ बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं। पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित होता है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ भक्तिगीत गाये जाते हैं।अंत में लोगो को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं।
उत्सव का स्वरूप
छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।
नहाय खाय
छठ पर्व का पहला दिन जिसे ‘नहाय-खाय’ के नाम से जाना जाता है,उसकी शुरुआत चैत्र या कार्तिक महीने के चतुर्थी कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता है ।सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। उसके बाद व्रती अपने नजदीक में स्थित गंगा नदी,गंगा की सहायक नदी या तालाब में जाकर स्नान करते है। व्रती इस दिन नाखनू वगैरह को अच्छी तरह काटकर, स्वच्छ जल से अच्छी तरह बालों को धोते हुए स्नान करते हैं। लौटते समय वो अपने साथ गंगाजल लेकर आते है जिसका उपयोग वे खाना बनाने में करते है । वे अपने घर के आस पास को साफ सुथरा रखते है ।
व्रती इस दिन सिर्फ एक बार ही खाना खाते है । खाना में व्रती कद्दू की सब्जी ,मुंग चना दाल, चावल का उपयोग करते है .तली हुई पूरियाँ पराठे सब्जियाँ आदि वर्जित हैं. यह खाना कांसे या मिटटी के बर्तन में पकाया जाता है। खाना पकाने के लिए आम की लकड़ी और मिटटी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है। जब खाना बन जाता है तो सर्वप्रथम व्रती खाना खाते है उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य खाना खाते है । http://chhathparv.com/chhath-first-day-nahay-khaye छठ पूजा पहला दिन-नहाय खाएा छठ पर्व 22 अक्तूबर 2019 https://web.archive.org/web/20191022031305/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-first-day-nahay-khay.html 22 अक्तूबर 2019 dead
खरना और लोहंडा
thumb|छठ पर्व का खरना गीत
छठ पर्व का दूसरा दिन जिसे खरना या लोहंडा के नाम से जाना जाता है,चैत्र या कार्तिक महीने के पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन व्रती पुरे दिन उपवास रखते है . इस दिन व्रती अन्न तो दूर की बात है सूर्यास्त से पहले पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते है। शाम को चावल गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाया जाता है। खाना बनाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है। इन्हीं दो चीजों को पुन: सूर्यदेव को नैवैद्य देकर उसी घर में ‘एकान्त' करते हैं अर्थात् एकान्त रहकर उसे ग्रहण करते हैं। परिवार के सभी सदस्य उस समय घर से बाहर चले जाते हैं ताकी कोई शोर न हो सके। एकान्त से खाते समय व्रती हेतु किसी तरह की आवाज सुनना पर्व के नियमों के विरुद्ध है।
पुन: व्रती खाकर अपने सभी परिवार जनों एवं मित्रों-रिश्तेदारों को वही ‘खीर-रोटी' का प्रसाद खिलाते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को 'खरना' कहते हैं। चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी भी प्रसाद के रूप में वितरीत की जाती है। इसके बाद अगले 36 घंटों के लिए व्रती निर्जला व्रत रखते है। मध्य रात्रि को व्रती छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद ठेकुआ बनाती है । https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-fourth-day-usha-arghya.html छठ पूजा का दूसरा दिन - खरना छठ पर्व 22 अक्तूबर 2019 https://web.archive.org/web/20191022155622/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-fourth-day-usha-arghya.html 22 अक्तूबर 2019 dead
संध्या अर्घ्य
right|thumb|छठ पर्व करते छठव्रती
छठ पर्व का तीसरा दिन जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है,चैत्र या कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। पुरे दिन सभी लोग मिलकर पूजा की तैयारिया करते है। छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद जैसे ठेकुआ,https://food.ndtv.com/food-drinks/chhath-2017-5-things-you-must-know-about-thekua-a-popular-chhath-recipe-1766423 Chhath 2017: 5 Things You Must Know About Thekua- A popular Chhath Recipe एनडीटीवी फूड 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20190514045040/https://food.ndtv.com/food-drinks/chhath-2017-5-things-you-must-know-about-thekua-a-popular-chhath-recipe-1766423 14 मई 2019 live चावल के लड्डू जिसे कचवनिया भी कहा जाता है, बनाया जाता है । छठ पूजा के लिए एक बांस की बनी हुयी टोकरी जिसे दउरा कहते है में पूजा के प्रसाद,फल डालकर देवकारी में रख दिया जाता है। वहां पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल,पांच प्रकार के फल,और पूजा का अन्य सामान लेकर दउरा में रख कर घर का पुरुष अपने हाथो से उठाकर छठ घाट पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो इसलिए इसे सर के ऊपर की तरफ रखते है। छठ घाट की तरफ जाते हुए रास्ते में प्रायः महिलाये छठ का गीत गाते हुए जाती है
नदी या तालाब के किनारे जाकर महिलाये घर के किसी सदस्य द्वारा बनाये गए चबूतरे पर बैठती है। नदी से मिटटी निकाल कर छठ माता का जो चौरा बना रहता है उस पर पूजा का सारा सामान रखकर नारियल चढाते है और दीप जलाते है। सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव की पूजा का सारा सामान लेकर घुटने भर पानी में जाकर खड़े हो जाते है और डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देकर पांच बार परिक्रमा करते है।
सामग्रियों में, व्रतियों द्वारा स्वनिर्मित गेहूं के आटे से निर्मित 'ठेकुआ' सम्मिलित होते हैं। यह ठेकुआ इसलिए कहलाता है क्योंकि इसे काठ के एक विशेष प्रकार के डिजाइनदार फर्म पर आटे की लुगधी को ठोकर बनाया जाता है। उपरोक्त पकवान के अतिरिक्त कार्तिक मास में खेतों में उपजे सभी नए कन्द-मूल, फलसब्जी, मसाले व अन्नादि यथा गन्ना, ओल, हल्दी, नारियल, नींबू(बड़ा), पके केले आदि चढ़ाए जाते हैं। ये सभी वस्तुएं साबूत (बिना कटे टूटे) ही अर्पित होते हैं। इसके अतिरिक्त दीप जलाने हेतु,नए दीपक,नई बत्तियाँ व घी ले जाकर घाट पर दीपक जलाते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण अन्न जो है वह है कुसही केराव के दानें (हल्का हरा काला, मटर से थोड़ा छोटा दाना) हैं जो टोकरे में लाए तो जाते हैं पर सांध्य अर्घ्य में सूरजदेव को अर्पित नहीं किए जाते। इन्हें टोकरे में कल सुबह उगते सूर्य को अर्पण करने हेतु सुरक्षित रख दिया जाता है। बहुत सारे लोग घाट पर रात भर ठहरते है वही कुछ लोग छठ का गीत गाते हुए सारा सामान लेकर घर आ जाते है और उसे देवकरी में रख देते है । https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-third-day.html छठ पूजा का तीसरा दिन - संध्या अर्घ्या छठ पर्व 22 अक्तूबर 2019 https://web.archive.org/web/20191022135330/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-third-day.html 22 अक्तूबर 2019 dead
उषा अर्घ्य
अंगूठाकार|212x212पिक्सेल|सूर्यदेव को अर्घ्य देते छठव्रती
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्योदय से पहले ही व्रती लोग घाट पर उगते सूर्यदेव की पूजा हेतु पहुंच जाते हैं और शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। संध्या अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है परन्तु कन्द, मूल, फलादि वही रहते हैं। सभी नियम-विधान सांध्य अर्घ्य की तरह ही होते हैं। सिर्फ व्रती लोग इस समय पूरब की ओर मुंहकर पानी में खड़े होते हैं व सूर्योपासना करते हैं। पूजा-अर्चना समाप्तोपरान्त घाट का पूजन होता है। वहाँ उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरण करके व्रती घर आ जाते हैं और घर पर भी अपने परिवार आदि को प्रसाद वितरण करते हैं। व्रति घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से आज तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं। https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-second-day-kharana.html छठ पूजा का चौथा दिन - उषा अर्घ्या छठ पर्व 22 अक्तूबर 2019 https://web.archive.org/web/20191022034042/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-second-day-kharana.html 22 अक्तूबर 2019 dead
व्रत
छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह छठ व्रत अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है; कुछ पुरुष भी इस व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रति को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रति फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती हैं। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नये कपड़े पहनते हैं। जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गयी होती है व्रति को ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है। महिलाएँ साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालों साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला इसके लिए तैयार न हो जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’
ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएँ यह व्रत रखती हैं। पुरुष भी पूरी निष्ठा से अपने मनोवांछित कार्य को सफल होने के लिए व्रत रखते हैं।
सूर्य पूजा का संदर्भ
thumb|छट प्रसाद
छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।
सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।
सूर्योपासना की परम्परा
भारत में सूर्योपासना ऋगवेद काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गयी है। मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो अभी तक चला आ रहा है।
देवता के रूप में
सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के विकास के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रारम्भ हो गयी, लेकिन देवता के रूप में सूर्य की वन्दना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है। इसके बाद अन्य सभी वेदों के साथ ही उपनिषद् आदि वैदिक ग्रन्थों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई है। निरुक्त के रचियता यास्क ने द्युस्थानीय देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर रखा है।
मानवीय रूप की कल्पना
उत्तर वैदिक काल के अन्तिम कालखण्ड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी। इसने कालान्तर में सूर्य की मूर्ति पूजा का रूप ले लिया। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया। अनेक स्थानों पर सूर्यदेव के मंदिर भी बनाये गये।
आरोग्य देवता के रूप में
पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसन्धान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव विशेष पाया। सम्भवत: यही छठ पर्व के उद्भव की बेला रही हो। भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गयी, जिसके लिए शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया था।
पौराणिक और लोक कथाएँ
छठ पूजा की परम्परा और उसके महत्त्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं।
रामायण से
एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
महाभारत से
एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।
कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।
पुराणों से
एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परन्तु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।
सामाजिक/सांस्कृतिक महत्त्व
छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।
शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।
छठ गीत
लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति-भाव से पूर्ण लोकगीत गाये जाते हैं।
'केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय
काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए'
सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार।
उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर।
निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे।
चार कोना के पोखरवा
हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।
छठ शुभकामना सन्देश
छठ क आज हैं पावन त्यौहार
सूरज की लाली, माँ का हैं उपवास
जल्दी से आओ अब करो न विचार
छठ पूजा का खाने तुम प्रसाद
छठ पूजा की शुभकामनाएँhttp://www.chhathpuja.co/community/viewdiscussion/32-chhath-puja-sms-latest?groupid=73 Sharad Navratre 2018 - chhathpuja www.chhathpuja.co 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20181019205808/http://www.chhathpuja.co/community/viewdiscussion/32-chhath-puja-sms-latest?groupid=73 19 अक्तूबर 2018 dead
छठ पूजा और बिहारवासियों की पहचान
छठ पूजा को देश के कई हिस्सों में बिहार और उत्तर प्रदेश से आये उत्तर भारतीय आर्य लोगों की पहचान के रूप में देखा जाता रहा है। यही कारण है कि महाराष्ट्र में शिवसेना और उससे टूटकर अलग हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता कई बार इसका विरोध कर चुके हैं और इस पर्व को एक प्रकार के शक्ति प्रदर्शन का नाम दे चुके हैं।http://hindi.news18.com/news/ News in Hindi: की ताज़ा खबर, ब्रेकिंग और लेटेस्ट न्यूज़ न्यूज़18 इंडिया 14 मई 2019 https://web.archive.org/web/20190523073027/https://hindi.news18.com/news/ 23 मई 2019 dead
इन्हें भी देखें
देव छठ पूजा
देव सूर्य मंदिर
सन्दर्भ
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श्रेणी:संस्कृति
श्रेणी:हिन्दू त्यौहार
श्रेणी:बिहार की संस्कृति