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411 समाचार
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स्वामी माधवाश्रम

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अंगूठाकार|ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम स्वामी माधवाश्रम जी महाराज (1941 – 2017) सनातन धर्म के महान ध्वजवाहक, प्रखर वेदांती और ज्योतिष्पीठ, बदरिकाश्रम के ऐतिहासिक शंकराचार्य थे। वे उत्तराखंड की देवभूमि से इस सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले प्रथम संन्यासी थे। उन्होंने न केवल अद्वैत वेदांत के दर्शन को जन-जन तक पहुँचाया, बल्कि समाज सुधार, गौ-सेवा और गंगा संरक्षण के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व कार्य किए। प्रारंभिक जीवन और शिक्षा (बाल्यकाल से संन्यास तक) स्वामी माधवाश्रम जी का जन्म सन् 1941 में उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के बेंजी गांव में हुआ था। उनके बचपन का नाम केशवानंद बेंजवाल था। उनके पिता एक धार्मिक और विद्वान व्यक्ति थे, जिन्होंने बालक केशवानंद के मन में बचपन से ही धर्म और संस्कारों के बीज बो दिए थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई, जिसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए हरिद्वार चले गए। उन्होंने ऋषिकेश, अंबाला, वृंदावन और अंततः काशी (वाराणसी) में रहकर वेद, पुराण, व्याकरण और दर्शन शास्त्र का गहन अध्ययन किया। ईश्वरीय प्रेरणा और वैराग्य भाव के कारण उन्होंने अल्पायु में ही घर का त्याग कर दिया और संन्यास धर्म की दीक्षा ली। कठोर तप और शास्त्रार्थ में निपुणता के कारण वे जल्द ही विद्वानों के बीच चर्चा का विषय बन गए। शंकराचार्य पद पर अभिषेक स्वामी माधवाश्रम जी महाराज उत्तराखंड मूल (देवभूमि) से पहले संन्यासी थे जिन्हें जगद्गुरु शंकराचार्य के सर्वोच्च पद पर आसीन होने का गौरव प्राप्त हुआ। ज्योतिष्पीठ (बदरिकाश्रम) के शंकराचार्य का पद रिक्त होने और उत्तराधिकार के विषयों के बीच, स्वामी माधवाश्रम जी की विद्वता और निष्ठा को देखते हुए उन्हें इस सर्वोच्च पद के योग्य माना गया। जगन्नाथ पुरी पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाराज ने धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के मार्गदर्शन में स्वामी माधवाश्रम जी का अभिषेक ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में किया। उत्तराखंड (गढ़वाल) की धरती से जन्म लेने वाले वे पहले ऐसे महात्मा थे जिन्होंने आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित उत्तर भारतीय पीठ का नेतृत्व किया। वे केवल नाम के शंकराचार्य नहीं थे, बल्कि संस्कृत और वेदांत के ऐसे प्रकांड विद्वान थे जिनकी पकड़ शास्त्रों पर बहुत गहरी थी। उन्होंने शंकराचार्य के पद की गरिमा को केवल मठ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि गौ-हत्या के विरोध और गंगा की स्वच्छता के लिए सड़कों पर उतरकर नेतृत्व किया। "स्वामी माधवाश्रम जी उत्तराखंड की धरती पर जन्मे प्रथम ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में धर्म का मार्गदर्शन किया।" स्वामी माधवाश्रम जी का ऋषिकेश स्थित आश्रम आज भी एक "अध्यात्म की उच्च अदालत" के रूप में देखा जाता है, जहाँ साधक सत्य और असत्य का बोध प्राप्त करते हैं। स्वामी जी ने बड़ी संख्या में ब्रह्मचारियों को वेदों की शिक्षा दी, जो आज हरिद्वार, काशी और ऋषिकेश के विभिन्न गुरुकुलों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं। उनके कई शिष्य अखिल भारतीय धर्म संघ में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं। स्वामी माधवाश्रम जी महाराज ने सनातन धर्म की शिक्षा और सेवा के प्रसार के लिए कई महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना की। उनके शिष्य आज भी उनके बताए मार्ग पर चलते हुए इन संस्थानों का संचालन कर रहे हैं। प्रमुख योगदान और विचारधारा 1. सनातन धर्म का प्रचार स्वामी जी ने पूरे भारतवर्ष में भ्रमण कर सनातन धर्म की अखंडता का संदेश दिया। उन्होंने अद्वैत वेदांत की व्याख्या को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाया। 2. गौ-रक्षा आंदोलन वे गौ-हत्या के प्रखर विरोधी थे। उन्होंने भारत सरकार से कई बार मांग की कि गाय को 'राष्ट्र माता' घोषित किया जाए। उनके नेतृत्व में गौ-सेवा के लिए कई बड़े सम्मलेन आयोजित किए गए। 3. गंगा संरक्षण (अविरल और निर्मल गंगा) स्वामी माधवाश्रम जी का मानना था कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। उन्होंने गंगा पर बन रहे बड़े बांधों का विरोध किया और नदी की अविरलता बनाए रखने के लिए जन-आंदोलन चलाए। व्यक्तित्व की विशेषताएं स्वामी जी का व्यक्तित्व सरल, सौम्य लेकिन सिद्धांतों के प्रति अत्यंत कठोर था। वे संस्कृत के प्रकांड पंडित थे और जटिल दार्शनिक विषयों को भी बहुत ही सहजता से समझा देते थे। शंकराचार्य जैसे उच्च पद पर होने के बावजूद, उनका जीवन बहुत सादा था। वे हमेशा भक्तों के लिए सुलभ रहते थे। उन्होंने जातिवाद से ऊपर उठकर समाज के हर वर्ग को धर्म से जोड़ने का प्रयास किया। महाप्रयाण और भू-समाधि स्वामी माधवाश्रम जी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे। 20 अक्टूबर 2017 को चंडीगढ़ के एक अस्पताल में 76 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी इच्छा के अनुसार, उनके पार्थिव शरीर को ऋषिकेश लाया गया। वहाँ उनके द्वारा स्थापित माधवाश्रम (शीशम झाड़ी) में उन्हें वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भू-समाधि दी गई। उनकी समाधि पर आज भी हजारों भक्त श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुँचते हैं। 1. आधुनिक तकनीक और आध्यात्म का समन्वय स्वामी जी केवल शास्त्रों के ही नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान (Astronomy) और समय की गणना के भी गहरे जानकार थे। भोपाल आश्रम में उन्होंने 'महासोमयाग' के दौरान एक ऐसी यज्ञशाला का निर्माण करवाया था, जिसकी वास्तुकला पूरी तरह वैज्ञानिक और वैदिक ज्यामिति (Sacred Geometry) पर आधारित थी। 2. उत्तराखंड का पहला 'धर्म ध्वजवाहक' (ऐतिहासिक तथ्य) ज्योतिष्पीठ के इतिहास में 2500 वर्षों से अधिक समय में स्वामी माधवाश्रम जी पहले ऐसे संन्यासी थे जिनका जन्म उसी भूमि (उत्तराखंड) पर हुआ था जहाँ यह पीठ स्थित है। उनसे पहले इस पीठ पर प्राय: दक्षिण या मध्य भारत के विद्वान ही आसीन होते थे। 3. 'मौन साधना' और विद्वता स्वामी जी अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में कई महीनों तक 'काष्ठ मौन' (पूरी तरह चुप्पी और लकड़ी की तरह अडिग रहना) का पालन करते थे। काशी में उनके साथ रहने वाले विद्वान बताते हैं कि वे कठिन से कठिन 'न्याय शास्त्र' के सूत्रों को एक बार पढ़कर कंठस्थ कर लेते थे। 4. गौ-रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान की घोषणा गौ-रक्षा आंदोलन के दौरान, वे उन युवा संन्यासियों में से थे जिन्होंने दिल्ली की सड़कों पर पुलिस की लाठियों का सामना किया था। उन्होंने संकल्प लिया था कि "जब तक भारत में गौ-वध पूरी तरह बंद नहीं होगा, वे कभी भी किसी सरकारी सम्मान या पद को स्वीकार नहीं करेंगे।" 5. 24 घंटे का अखंड 'महामृत्युंजय यज्ञ' भोपाल आश्रम में स्वामी जी ने एक ऐसी परंपरा शुरू की जो आज भी (2026 में भी) जारी है। यहाँ हर महीने 24 घंटे का निरंतर महामृत्युंजय यज्ञ होता है। यह परंपरा स्वामी जी ने समाज में फैल रही मानसिक अशांति और बीमारियों के निवारण के लिए वैज्ञानिक पद्धति से शुरू की थी। 6. बिना भेदभाव के दीक्षा स्वामी जी ने परंपरावादी होते हुए भी सामाजिक समरसता पर बल दिया। उन्होंने समाज के निचले तबके और कई विदेशी साधकों को भी अद्वैत वेदांत की दीक्षा दी, जो उस समय के कई कट्टरपंथी विद्वानों के लिए एक साहसी कदम था। 7. 'अग्निहोत्र' का वैश्विक प्रचार स्वामी जी ने लुप्त हो रही 'अग्niho (सूर्योदय और सूर्यास्त के समय छोटा हवन) की परंपरा को पुनर्जीवित किया। एक बार विद्वत परिषद के बीच 'अद्वैत वेदांत' के एक सूक्ष्म सूत्र पर गहरा मतभेद हुआ था। कहा जाता है कि उस समय के बड़े-बड़े पंडितों और अन्य पीठों के दावेदारों के बीच स्वामी जी ने तर्क दिया था। उन्होंने बिना किसी पुस्तक की सहायता के घंटों तक धाराप्रवाह संस्कृत में सूत्रों की व्याख्या की। उनकी तार्किक शक्ति और शास्त्रों पर पकड़ को देखकर वहां के विद्वानों ने स्वीकार किया था कि "ज्ञान की दृष्टि से ज्योतिष्पीठ के लिए इनसे उपयुक्त कोई और नहीं हो सकता।" इसी विद्वत्ता के कारण उन्हें 'अभिनव शंकर' (आधुनिक काल के आदि शंकर) की उपाधि से भी स्थानीय लोग संबोधित करने लगे थे 2. राजनीतिक प्रभाव और संबंध स्वामी जी ने कभी राजनीति में सीधे भाग नहीं लिया, लेकिन देश के बड़े राजनेता उनके पास मार्गदर्शन के लिए आते थे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत स्वामी जी के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। जब भी वे उत्तराखंड या ऋषिकेश आते थे, स्वामी जी का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते थे। उन्होंने तत्कालीन सरकारों की गंगा विरोधी नीतियों (बड़े बांधों का निर्माण) का जमकर विरोध किया था। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि गंगा के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ की गई, तो यह हिमालयी क्षेत्र के लिए विनाशकारी होगा (जो बाद में केदारनाथ आपदा के रूप में सच हुआ)। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री से लेकर बाद की सरकारों तक पर 'गौ-वध निषेध कानून' बनाने के लिए निरंतर दबाव बनाए रखा। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर कानूनी विवादों के संदर्भ में, स्वामी माधवाश्रम जी को धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज और पुरी पीठ के शंकराचार्य का समर्थन प्राप्त था। स्थानीय लोगों के बीच उनकी विद्वत्ता और शास्त्रों पर पकड़ के कारण उन्हें 'अभिनव शंकर' (आधुनिक काल के आदि शंकर) की उपाधि से भी संबोधित किया जाता था। वे अखिल भारतीय धर्म संघ के अध्यक्ष भी रहे। यह वही संस्था है जिसकी स्थापना धर्मसम्राट स्वामी करपात्री ने की थी। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारत भर में संस्कृत पाठशालाओं और गुरुकुलों को वित्तीय सहायता और संरक्षण प्रदान किया, ताकि वैदिक शिक्षा पद्धति जीवित रह सके।https://www.jagran.com/uttarakhand/dehradun-city-mahaprakhan-of-swami-madhavashram-maharaj-16890056.html स्वामी माधवाश्रम महाराज का महाप्रयाण, चंडीगढ़ में ली जीवन की अंतिम सांस - Mahaprakhan of Swami Madhavashram Maharaj Jagran hi 2026-01-24 शंकराचार्य जैसे पद पर रहने के बावजूद, उनकी जीवनशैली बहुत कठिन थी। वे अक्सर चंडीगढ़ या ऋषिकेश में रहने के दौरान भक्तों से बिना किसी तामझाम के मिलते थे।https://www.thestatesman.com/cities/shankaracharya-madhavashram-maharaj-passes-away-at-76-1502514945.html Shankaracharya Madhavashram Maharaj passes away at 76 PTI 2017-10-21 The Statesman en 2026-01-24 कहा जाता है कि उन्होंने अपने निजी उपभोग के लिए कभी भी भव्यता को प्राथमिकता नहीं दी, बल्कि सारा दान-पुण्य गौशालाओं और संस्कृत शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया।https://www.governancenow.com/news/regular-story/uttarakhand-inclusion-gadwali-kumauni-8th-schedule Uttarakhand for inclusion of Gadwali, Kumauni in 8th schedule 2011-12-20 Governance Now en 2026-01-24 महाप्रयाण और अंतिम यात्रा एक युग का अंत 20 अक्टूबर 2017 को चंडीगढ़ के पीजीआई (PGI) अस्पताल में स्वामी माधवाश्रम जी ने 76 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। स्वामी जी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने वालों में देश के सर्वोच्च राजनीतिक और आध्यात्मिक पदों पर बैठे लोग शामिल थे: स्वामी जी की पार्थिव देह को चंडीगढ़ से उनके प्रिय स्थान ऋषिकेश लाया गया। ऋषिकेश के शीशम झाड़ी स्थित उनके आश्रम 'माधवाश्रम' में उन्हें वैदिक रीति-रिवाजों के साथ भू-समाधि दी गई। अंतिम विदाई के समय चारों पीठों के प्रतिनिधि और हरिद्वार के विभिन्न अखाड़ों के महामंडलेश्वर उपस्थित थे।Koteshwar Mahadev 2026-01-24 https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=Koteshwar_Mahadev&oldid=1334536355 Wikipedia en 2026-01-24 ऋषिकेश की सड़कों पर हजारों की संख्या में उनके अनुयायी और स्थानीय लोग 'शंकराचार्य महाराज की जय' के नारे लगा रहे थे। ऋषिकेश के व्यापारियों ने उनके सम्मान में आधे दिन के लिए बाजार बंद रखा था।https://www.thestatesman.com/cities/shankaracharya-madhavashram-maharaj-passes-away-at-76-1502514945.html Shankaracharya Madhavashram Maharaj passes away at 76 PTI 2017-10-21 The Statesman en 2026-01-24 श्रेणी:प्रारंभिक जीवन और शिक्षा (बाल्यकाल से संन्यास तक) श्रेणी:प्रारंभिक जीवन और शिक्षा श्रेणी:शंकराचार्य श्रेणी:भारतीय हिंदू संन्यासी श्रेणी:उत्तराखंड के धार्मिक नेता श्रेणी:संस्कृत के विद्वान