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लीलातिलकम्

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लीलातिलकम् लीलातिलकम् संस्कृत भारत मणिप्रवालम युग का व्याकरण एवं काव्य पाण्डुलिपि sa लीलातिलकम् चौदहवीं शताब्दी का एक संस्कृत-भाषा का ग्रंथ है जो मणिप्रवलाम् भाषा-शैली के व्याकरण और काव्य का वर्णन करता है। मणिप्रवालम् भारत के केरल क्षेत्र में उपयोग किए जाने वाले संस्कृत और प्रारंभिक मलयालम का मिश्रण है। लेखक एवं लेखनकाल लीलातिलकम् एक अनाम कृति है और इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। यह ग्रन्थ प्रायः १४वीं शताब्दी के अंत काल में रचित माना जाता है।Eva Maria Wilden 2014 347 इसकी दो (संभवतः तीन) पांडुलिपियाँ प्राप्त है। यह कृति किसी अन्य जीवित पूर्व-आधुनिक स्रोत द्वारा संदर्भित नहीं है।Rich Freeman 2003 443 1909 में, अप्पान थम्पुरन ने मलयालम पत्रिका मंगलोदयम में लीलातिलकमक के प्रथम भाग का अनुवाद प्रकाशित किया। बाद में, अत्तूर कृष्ण पिशारोटि ने इस ग्रंथ का सम्पूर्ण अनुवाद किया और इसे प्रकाशन किया। 1916 में, उन्होंने मूल संस्कृत टीका का मलयालम में अनुवाद किया।https://keralamuseum.org/wp-content/uploads/2024/03/%E0%B4%B2%E0%B5%80%E0%B4%B2%E0%B4%BE%E0%B4%A4%E0%B4%BF%E0%B4%B2%E0%B4%95%E0%B4%B5%E0%B5%81%E0%B4%82-%E0%B4%A4%E0%B4%A6%E0%B5%8D%E0%B4%A6%E0%B5%87%E0%B4%B6%E0%B5%80%E0%B4%AF%E0%B4%A4%E0%B4%AF%E0%B5%81%E0%B4%82.pdf Lilathilakavum Thadeshiyathayum E.S. Vishnu March 2024 keralamuseum.org 18 June 2024John Brough 1947 Līlātilaka: A Sanskrit Tract on Malayalam Grammar and Poetics Bulletin of the School of Oriental and African Studies, University of London Cambridge University Press 12 1 1 10.1017/S0041977X00079970 608992 विषयवस्तु और संरचना लीलातिलकम् (शाब्दिक अर्थ : "कविता का मुकुट") स्वयं को मणिप्रवलम् पर एकमात्र शास्त्र कहता है। इस ग्रन्थ में मणिप्रवलम् को संस्कृत और केरल-भाषा का मिश्रण कहा गया है।Rich Freeman 2003 442Rich Freeman 2003 448 यह ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखा गया है, जिसमें श्लोक और उनकी संस्कृत में ही व्याख्या दी गयी है। इसमें मणिप्रवलम शैली के छन्द भी उदाहरण के रूप में दिये गये हैं।Rich Freeman 2003 448 लीलातिलकम् आठ भागों में विभक्त है जिन्हें 'शिल्पम्' कहा जाता है।https://keralamuseum.org/wp-content/uploads/2024/03/%E0%B4%B2%E0%B5%80%E0%B4%B2%E0%B4%BE%E0%B4%A4%E0%B4%BF%E0%B4%B2%E0%B4%95%E0%B4%B5%E0%B5%81%E0%B4%82-%E0%B4%A4%E0%B4%A6%E0%B5%8D%E0%B4%A6%E0%B5%87%E0%B4%B6%E0%B5%80%E0%B4%AF%E0%B4%A4%E0%B4%AF%E0%B5%81%E0%B4%82.pdf Lilathilakavum Thadeshiyathayum E.S. Vishnu March 2024 keralamuseum.org 18 June 2024E.S., Vishnu (March 2024). "Lilathilakavum Thadeshiyathayum" (PDF). keralamuseum.org. Retrieved 18 June 2024. लीलातिलकम् में आठ शिल्प (अध्याय) हैं। इस ग्रंथ की रचना 151 सूत्रों और उनकी वृत्तियों (व्याख्याओं) के साथ की गई है। इलमकुलम के विभाजन के अनुसार प्रत्येक शिल्प की सामग्री इस प्रकार है:लीलातिलकम, व्याख्या। इलमकुलम कुंजन पिल्लई। (1990) विषय विवरण। पृष्ठ 5-8 प्रथम शिल्प प्रथम शिल्प में शिल्प-निरूपण, मणिप्रवाल लक्षण, केरल और द्रमिड, नच्चिनार्क्कििनियर का मत, तमिल-मलयालम रूप और मणिप्रवाल लक्षण जैसे सात विषयों पर चर्चा की गई है। द्वितीय शिल्प द्वितीय शिल्प में शिल्प-निरूपण, भाषा-भेद, संस्कृतनिष्ट भाषा, अधिक अक्षर, संस्कृत शब्द, विभक्ति, लिंग, वचन, क्रिया और पुरुष प्रत्यय जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। तृतीय शिल्प तृतीय शिल्प को शिल्प-निरूपण, स्वर संधि, स्वर-व्यंजन संधि, व्यंजन संधि और कुछ प्रयोगों में विभाजित किया गया है। चतुर्थ शिल्प चतुर्थ शिल्प दोष-विचार पर आधारित है। इस भाग में शिल्प-निरूपण, बीस दोष, अपशब्द, अवाचक, कष्ट, व्यर्थ, अनिष्ट, ग्राम्य, पुनरुक्त, परुष, विसंधि, रीतिधुत, न्यूनपद, अस्थानपद, क्रमभंग, वृत्तभंग, दुर्वृत्त, सामान्य, शुष्कार्थ, असंगत, विकारानुप्रास, दोषों की गुणता, रस-दोष और महिलाओं के नामकरण जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। पंचम शिल्प पाँचवें शिल्प में गुण-निरूपण, केवल चार गुण (श्लेष, माधुर्य, प्रसाद, समता) और परिमल चर्चा आदि के बारे में बताया गया है। षष्ठ शिल्प छठा शिल्प शब्दालंकार का विवरण है। इसमें शिल्प-निरूपण, गुण और अलंकार, अनुप्रास, मुखानुप्रास, पदानुप्रास, वर्णानुप्रास, लाटानुप्रास, यमक, श्लेष, सशब्दशक्तिमूलध्वनि और श्लेष आदि का विभाजन है। सप्तम शिल्प सातवां शिल्प अर्थालंकार की चर्चा है। इसमें उपमा, उपमेयोपमा, स्मरण, रूपक, संशय, भ्रांति, अपह्नुति, व्यतिरेक, दीपक, प्रतिवस्तूपमा, दृष्टांत, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, अन्यापदेश, क्रम, आक्षेप, परिवृत्ति, श्लेष, स्वभावोक्ति, हेतु, अर्थान्तरन्यास, विरोध, विभावना, विशेषोक्ति, असंगति, उदात्त, परिसंख्या, अर्थापत्ति और संकर आदि अलंकारों का विवरण है। अष्टम शिल्प आठवें शिल्प में रस-विचार है। इसमें शिल्प-निरूपण, व्यंग्य-भेद, रस, भाव, शृंगार, हास्य, वीर, अद्भुत, वीभत्स, रौद्र, करुण और शांत रसों की व्याख्या की गई है। इन्हें भी देखें मलयालम साहित्य का इतिहास मणिप्रवालम बाहरी कड़ियाँ Grammar in Leelatilakam (LV ramaswamy Aiyar) A history of Malayalam language सन्दर्भ श्रेणी:मलयालम श्रेणी:भारतीय पुस्तकें