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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

वैराग्यशतकम्

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वैराग्यशतकम् भर्तृहरि के तीन प्रसिद्ध शतकों (शतकत्रय) में से एक है। इसमें वैराग्य सम्बन्धी सौ श्लोक हैं। शतकत्रय में अन्य दो हैं- शृंगारशतकम् व नीतिशतकम्। विषयविवरण तृष्णादूषणम् विषयपरित्याग-विडम्बना याज्ञा-दैन्यदूषणम् भोगास्थैर्यवर्णनम् कालमहिमा यति-नृपति-सम्भाषणम् मनःसम्बोधन-नियमनम् नित्यानित्यविचारः शिवार्चनम् अवधूतचर्या पानी की तरंग और बुलबुले के समान इस चंचल और नश्वर जीवन में प्राणियों को भला सुख कहाँ मिल सकता है। वृद्धावस्था में जीर्ण तथा झुर्रियों वाले अंगों से युक्त होकर मनुष्य को सब कुछ छोड़कर काल के गर्त में जाना पड़ता है - भोगों को भोगना समाप्त नहीं होता अपितु व्यक्ति ही समाप्त हो जाता है। कवि ने कितनी गम्भीर बात कही है- भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।। कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ।।७।। (अर्थ - भोगों को हमने नहीं भोगा, बल्कि भोगों ने ही हमें ही भोग लिया । तपस्या हमने नहीं की, बल्कि हम खुद तप गए । काल (समय) कहीं नहीं गया बल्कि हम स्वयं चले गए । इस सभी के बाद भी मेरी कुछ पाने की तृष्णा नहीं गयी (पुरानी नहीं हुई) बल्कि हम स्वयं जीर्ण हो गए ।। ) इस प्रकार भृतहरि ने यहाँ संसार की आसारता और वैराग्य के महत्त्व का प्रतिपादन किया है। इस शतक में काव्य-प्रतिभा और दार्शनिकता का अद्भुत समन्वय किया गया है। इसमें सांसारिक आकर्षणों और भोगों के प्रति उदासीनता के उभरते हुये भावों का चित्रण दिखायी देता है। कवि की तो यही कामना है कि किसी पुण्यमय अरण्य में शिव-शिव का उच्चारण करते हुये उसका समय बीतता जाये। कुछ प्रसिद्ध श्लोक यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्यन्यं इच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः । अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥ 2॥(अर्थ - मैं जिसका सतत चिन्तन करता हूँ वह (पिंगला) मेरे प्रति उदासीन है। वह (पिंगला) भी जिसको चाहती है वह (अश्वपाल) तो कोई दूसरी ही स्त्री (राजनर्तकी) में आसक्त है। वह (राजनर्तकी) मेरे प्रति स्नेहभाव रखती है। उस (पिंगला) को धिक्कार है ! उस (अश्वपाल) को धिक्कार है ! उस (राजनर्तकी) को धिक्कार है ! उस कामदेव को धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है !) भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भभयं मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाभयम् । शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं ''सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।। (- वैराग्यशतकम् ३१ ) ( अर्थ - भोग करने पर रोग का भय, उच्च कुल मे जन्म होने पर बदनामी का भय, अधिक धन होने पर राजा का भय, मौन रहने पर दैन्य का भय, बलशाली होने पर शत्रुओं का भय, रूपवान होने पर वृद्धावस्था का भय, शास्त्र मे पारङ्गत होने पर वाद-विवाद का भय, गुणी होने पर दुर्जनों का भय, अच्छा शरीर होने पर यम का भय रहता है। इस संसार मे सभी वस्तुएँ भय उत्पन्न करने वालीं हैं। केवल वैराग्य से ही लोगों को अभय प्राप्त हो सकता है।) इन्हें भी देखें शृंगारशतकम् नीतिशतकम् बाहरी कड़ियाँ वैराग्यशतकम् वैराग्यशतकम् (श्रव्य रूप में) वैराग्य शतकम् , भाग-१ सन्दर्भ श्रेणी:संस्कृत साहित्य