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411 समाचार
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राजा महेन्द्र प्रताप सिंह

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महेन्द्र प्रताप Mahendra Pratap 1979 stamp of India.jpg सन् 1979 के एक भारतीय डाकटिकट पर राजा महेन्द्र सिंह भारत की अस्थायी सरकार के अध्यक्ष 1 दिसम्बर 1915 - जनवरी 1919 सांसद (लोकसभा) भारतीय 1957–1962 1 दिसम्बर 1886 हाथरस जिला, संयुक्त प्रान्त 29 अप्रैल 1979 (92 वर्ष की आयु में) मिन्टो सर्कल राजा महेन्द्र प्रताप सिंह (1 दिसम्बर 1886 – 29 अप्रैल 1979) भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पत्रकार, लेखक, क्रांतिकारी, समाज सुधारक और महान दानवीर थे। http://www.nayaharyana.com/484/raja-mahendra-partap-singh महान क्रान्तिकारी दानवीर राजा महेन्द्र प्रताप सिंह 20 मार्च 2021 16 जनवरी 2021 https://web.archive.org/web/20210116142306/http://www.nayaharyana.com/484/raja-mahendra-partap-singh dead वे 'आर्यन पेशवा' के नाम से प्रसिद्ध थे और भारत की अन्तरिम सरकार के अध्यक्ष थे। यह सरकार प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बनी थी और भारत के बाहर से संचालित हुई थी। उन्होने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान १९४० में जापान में 'भारतीय कार्यकारी बोर्ड' (Executive Board of India) की स्थापना की थी। अपने कॉलेज के साथियों के साथ मिलकर उन्होने सन १९११ में बाल्कन युद्ध में भी भाग लिया। उनकी सेवाओं को याद करते हुए भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया है। जीवन परिचय महेन्द्र प्रताप का जन्म १ दिसम्बर १८८६ को एक जाट परिवार में हुआ था जो मुरसान रियासत के शासक थे। यह रियासत वर्तमान उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में थी। वे राजा घनश्याम सिंह के तृतीय पुत्र थे। जब वे ३ वर्ष के थे तब हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने उन्हें पुत्र के रूप में गोद ले लिया। १९०२ में उनका विवाह बलवीर कौर से हुआ था जो जिन्द रियासत के कायस्थ परिवार की थीं। विवाह के समय वे कॉलेज की शिक्षा ले रहे थे। हाथरस के कायस्थ राजा दयाराम ने 1817 में अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया। मुरसान के जाट राजा ने भी युद्ध में जमकर साथ दिया। अंग्रेजों ने दयाराम को बंदी बना लिया। 1841 में दयाराम का देहान्त हो गया। उनके पुत्र गोविन्दसिंह गद्दी पर बैठे। 1857 में गोविन्दसिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया फिर भी अंग्रेजों ने गोविन्दसिंह का राज्य लौटाया नहीं - कुछ गाँव, 50 हजार रुपये नकद और राजा की पदवी देकर हाथरस राज्य पर पूरा अधिकार छीन लिया। राजा गोविन्दसिंह की 1861 में मृत्यु हुई। संतान न होने पर अपनी पत्नी को पुत्र गोद लेने का अधिकार दे गये। अत: रानी साहबकुँवरि ने जटोई के ठाकुर रूपसिंह के पुत्र हरनारायण सिंह को गोद ले लिया। अपने दत्तक पुत्र के साथ रानी अपने महल वृन्दावन में रहने लगी। राजा हरनारायन को कोई पुत्र नहीं था। अत: उन्होंने मुरसान के राजा घनश्यामसिंह के तीसरे पुत्र महेन्द्र प्रताप को गोद ले लिया। इस प्रकार महेन्द्र प्रताप मुरसान राज्य को छोड़कर हाथरस राज्य के राजा बने। हाथरस राज्य का वृन्दावन में विशाल महल है उसमें ही महेन्द्र प्रताप का शैशव काल बीता। बड़ी सुख सुविधाएँ मिली। महेन्द्र प्रताप का जन्म 1 दिसम्बर 1886 को हुआ। अलीगढ़ में सैयद खाँ द्वारा स्थापित स्कूल में बी. ए. तक शिक्षा ली लेकिन बी. ए. की परीक्षा में पारिवारिक संकटों के कारण बैठ न सके। जिंद रियासत के राजा की राजकुमारी से संगरूर में विवाह हुआ। दो स्पेशल ट्रेन बारात लेकर गई। बड़ी धूमधाम से विवाह हुआ। विवाह के बाद जब कभी महेन्द्र प्रताप ससुराल जाते तो उन्हें 11 तोपों की सलामी दी जाती। स्टेशन पर सभी अफसर स्वागत करते। रात को दरबार लगता और नृत्य-गान चलता जिसमें कभी-कभी रानी भी भाग लेती। उनके 1909 में पुत्री हुई-भक्ति, 1913 में पुत्र हुआ-प्रेम। देश-विदेश की खूब यात्राएँ कीं। 1906 में जिंद के महाराजा की इच्छा के विरुद्ध राजा महेन्द्र प्रताप ने कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया और वहाँ से स्वदेशी के रंग में रंगकर लौटे। 1909 में वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत में प्रथम केन्द्र था। मदनमोहन मालवीय इसके उद्धाटन समारोह में उपस्थित रहे। ट्रस्ट का निर्माण हुआ-अपने पांच गाँव, वृन्दावन का राजमहल और चल संपत्ति का दान दिया। उनकी दृष्टि विशाल थी। वे जाति, वर्ग, रंग, देश आदि के द्वारा मानवता को विभक्त करना घोर अन्याय, पाप और अत्याचार मानते थे। ब्राह्मण-भंगी को भेद बुद्धि से देखने के पक्ष में नहीं थे। वृन्दावन में ही एक विशाल फलवाले उद्यान को जो 80 एकड़ में था, 1911 में आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश को दान में दे दिया। जिसमें आर्य समाज गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी है। प्रथम विश्वयुद्ध से लाभ उठाकर भारत को आजादी दिलवाने के पक्के इरादे से वे विदेश गये। इसके पहले 'निर्बल सेवक' समाचार-पत्र देहरादून से राजा साहेब निकालते थे। उसमें जर्मन के पक्ष में लिखे लेख के कारण उन पर 500 रुपये का दण्ड किया गया जिसे उन्होंने भर तो दिया लेकिन देश को आजाद कराने की उनकी इच्छा प्रबलतम हो गई। विदेश जाने के लिए पासपोर्ट नहीं मिला। मैसर्स थौमस कुक एण्ड संस के मालिक बिना पासपोर्ट के अपनी कम्पनी के पी. एण्ड ओ स्टीमर द्वारा इंगलैण्ड राजा महेन्द्र प्रताप और स्वामी श्रद्धानंद के ज्येष्ठ पुत्र हरिचंद्र को ले गया। उसके बाद जर्मनी के शासक कैसर से भेंट की। उन्हें आजादी में हर संभव सहाय देने का वचन दिया। वहाँ से वह अफगानिस्तान गये। बुडापेस्ट, बुल्गारिया, टर्की होकर हैरत पहुँचे। अफगान के बादशाह से मुलाकात की और वहीं से 1 दिसम्बर 1915 में काबुल से भारत के लिए अस्थाई सरकार की घोषणा की जिसके राष्ट्रपति स्वयं तथा प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्ला खाँ बने। स्वर्ण-पट्टी पर लिखा सूचनापत्र रूस भेजा गया। अफगानिस्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया तभी वे रूस गये और लेनिन से मिले। परंतु लेनिन ने कोई सहायता नहीं की। 1920 से 1946 तक विदेशों में भ्रमण करते रहे। विश्व मैत्री संघ की स्थापना की। 1946 में भारत लौटे। सरदार पटेल की बेटी मणिबेन उनको लेने कलकत्ता हवाई अड्डे गईं। वे संसद-सदस्य भी रहे। center|450px|thumb|सन १९१५ में काबुल में भारत के अस्थायी सरकार के अध्यक्ष महेन्द्र प्रताप (मध्य में) । उनके दायें वर्नर ऑटो फॉन हेंटिग (Werner Otto von Hentig) बैठे हैं। right|thumb|300px|राजा महेन्द्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के स्थापना के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ 26 अप्रैल 1979 में उनका देहान्त हो गया। मार्च २०२१ में उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके नाम पर अलीगढ़ में एक विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की। जमीन देने के बावजूद ए एम यू में एक शिलापट तक नहीं, अब उन्ही राजा के नाम से सीएम ने किया अलीगढ़ में नई यूनिवर्सिटी बनाने का ऐलान यह विश्वविद्यालय अब शिक्षण कार्य कार्य करना आरम्भ कर चुका है।यूनिवर्सिटी का बदला नाम, एक शब्द हटाया, शासन ने लगाई मुहरराजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय : स्नातक-परास्नातक की परीक्षाएं 4 दिसंबर से, ये हैं अन्य परीक्षा तिथियां यह अलीगढ़ के पलवल रोड, लोधा में स्थित है। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय : विवि का पता बदला, कैंप कार्यालय कैंपस में पहुंचा इन्हें भी देखें भारत की अन्तरिम सरकार बाहरी कड़ियाँ महान स्वतन्त्रता सेनानी राजा महेंद्र प्रताप (प्रवक्ता) भारत की पहिली अस्थाई सरकार के संस्थापक आर्यन पेशवा राजा महेन्द्र प्रताप काबुल से उठी चिंगारी ने लगाया था अंग्रेजों के सपनों को पलीता (पाञ्चजन्य) सन्दर्भ श्रेणी:1886 में जन्मे लोग श्रेणी:१९७९ में निधन