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411 समाचार
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थेरगाथा

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थेरगाथा, खुद्दक निकाय का आठवाँ ग्रंथ है। इसमें 264 थेरों के उदान संगृहीत हैं। ग्रंथ 21 निपातों में है। पहले निपात में 12 वर्ग हैं, दूसरे निपात में 5 वर्ग हैं और शेष निपातों में एक एक वर्ग है। गाथाओं की संख्या 1279 हैं। थेरगाथा में परमपद को प्राप्त थेरों के उदान अर्थात् उद्गारपूर्ण गाथाएँ हैं। विमुक्तिसुख के परमानंद में उनके मुख से निकली हुई ये गीतात्मक उक्तियाँ हैं। आध्यात्मिक साधना के उच्चतम शिखर पर पहुँचे हुए उन महान साधकों के, आर्य मार्ग के उन सफल यात्रियों के, ये जयघोष हैं। संसार के यथास्वभाव को समझ कर जन्ममृत्यु पर विजय प्रापत करनेवाले उन महान विजेताओं के ये विजयगान हैं। इन गाथाओं में आध्यात्मिक परिशुद्धि की, आत्मविजय की और परम शांति की हर्षध्वनि गूँजती है। अधिकांश गाथाओं में सीधे निर्वाण के प्रति संकेत है। कुछ गाथाओं में साधकों की साधना को सफल बनाने में सहायक प्रेरणाओं का उल्लेख है। कुछ गाथाओं में परमपद को प्राप्त थेरों द्वारा ब्रह्मचारियों या जनसाधारण को दिए गए उपदेशों का भी उल्लेख है। परिचय थेरगाथा में भगवान् बुद्ध द्वारा स्थापित संघ का एक सुंदर चित्र मिलता है। उसमें एक ओर दीनदुखियों की कुटियों से निकले साधारण कोटि के लोग थे; दूसरी ओर कपिलवस्तु, देवदह, वैशाली, राजगृह, श्रावस्ती आदि राजधानियों के राजमहलों और प्रासादों से निकले उच्च कोटि के लोग थे। तथागत की शरण में आकर वे सब एक हो गए थे। संघ में लौकिक धन, बल तथा पद का मान नहीं था। केवल शील, समाधि तथा प्रज्ञा का मान था। वे संसार की विषमताओं से परे हो आध्यात्मिक समता को प्राप्त हुए थे। इसी कारण एक ही स्वर में उनकी हृदयतंत्रियों से विमुक्तिसुख के मधुर गीत निकलते थे। थेरगाथा में स्वानुभव के साथ साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी सुंदर वर्णन मिलता है। समाज में मन को विक्षिप्त करनेवाले अनेक साधन हैं। लेकिन प्रकृति के वातावरण में मन शांत और एकाग्र हो जाता है। इसलिये वे महान योगी प्रकृति की गोद में ही साधना करते थे। उद्यान, गहन वन, उत्तुँग पर्वतशिखर, एकांत गुफाएँ और नदीतट जैसे निर्जन स्थानों पर ही उन थेरों ने ध्यान भावना कर निर्वाण को साक्षात्कार किया था। उनकी गाथाओं में पशुपक्षियों के मधुर गान का, नदियों और निर्झररिणियों के कलरव का, वनों और पर्वतों की छटा का और मेघों के गर्जन का सुंदर वर्णन है। संतसाहित्य में थेरगाथा का विशेष स्थान है। इन गाथाओं में वे महान साधक अपने जीवन के अनुभव हमारे लिये छोड़ गए हैं। उनसे आर्यमार्ग के पथिक को बोधिचित्त के विकास के लिये, निमीलित धर्मचक्षु के उन्मीलन के लिये पर्याप्त प्रेरणा मिलती है। कुछ थेरों का उदाहरण सत्यदर्शन से प्राप्त परमानंद की ओर संकेत करते हुए महाकस्सप थेर कहते हैं : "सम्यक् रूप से धर्म के दर्शन से (योगी को), जो आनंद प्राप्त होता है, वह पंच तूर्यों से भी संभव नहीं।" सोण थेर, जो कि पहले सेनापति थे, अपने दृढ़ संकल्प को इस उदान में प्रकट करते हैं : "संग्राम भूमि में आगे बढ़कर हाथी पर से भले ही गिर जाय पर पराजित होकर जीने की अपेक्षा संग्राम में प्राप्त मृत्यु ही मुझे अभीष्ट है।" वे रात्रि में तारों के दृश्य से प्रेरित होकर इस प्रकार गाते हैं : "नक्षत्रसमूह से सुशोभित रात्रि सोने के लिये नहीं है। ऐसी रात्रि ज्ञानियों के जाग्रत रहने के लिये हैं।" वर्षा की आवाज से प्रसन्न हो गिरिमानंद थेर गाते हैं : "देव ऐसे बरसता है मानो गान हो रहा है। मेरी कुटी छाई है, सुखदाई है और हवा से सुरक्षित है। इसमें उपशांत हो मैं विहरता हूँ। देव! मन भर बरसो। उसभ थेर भी वर्षा के दृश्य से प्रभावित होकर गाते हैं : "नई वर्षा से सिक्त हो पर्वतों पर वृक्ष लहराते हैं। (यह ऋतु) एकांतप्रिय, अरणयवासी उसभ के मन में अधिकाधिक स्फूर्ति उत्पन्न करती है।" संकिच्च थेर इसी दृश्य से प्रेरित हो कर गाते हैं : "जब वर्षा ऋतु में झंझावात मेघों को उड़ा ले जाता है, तब मेरे मन में निष्कामता से युक्त विचार उठते हैं।" पर्वतों के दृश्य से प्रेरित होकर महाकस्सप थेर गाते हैं : "वर्षा के पानी से प्रफुल्लित, मोरों के नाद से प्रतिध्वनित और ऋषियों से सेवित जो रम्य पर्वत हैं, वे मुझे प्रिय हैं।" चित्तक थेर मोर की आवाज से उठकर गाते हैं : "नील ग्रीवा और शिखावाले मोर करवीय वन में गाते हैं। शीतल वायु से प्रफुल्लित हो मधुर गीत गानेवाले वे सोये हुए योगी को जगाते हैं।" इन्हें भी देखे थेरीगाथा थेरवाद बाहरी कड़ियाँ The Theragatha (Access to Insight) श्रेणी:बौद्ध धर्म श्रेणी:बौद्ध ग्रंथ