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411 समाचार
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रमाबाई आम्बेडकर

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रमाबाई आम्बेडकर Ramabai Ambedkar - wife of Dr. Babasaheb Ambedkar.jpg 1898 02 07 वणंदगाव, रत्नागिरी 1935 05 27 1898 02 07 भारतीय महार भीमराव आम्बेडकर यशवंत आम्बेडकर रमाबाई भीमराव आंबेडकर ( 07 फ़रवरी 1898 - २७ मई १९३५) भीमराव आम्बेडकर की पत्नी थीं।The life and times of Ramabai Ambedkar रमाबाई अम्बेडकर का जीवन और समय http://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/entertainment/the-life-and-times-of-ramabai-ambedkar/article8478085.ece द हिन्दू अंग्रेज़ी मुरलीधर खजने १५ अप्रैल २०१६ १२ फ़रवरी २०१७ https://web.archive.org/web/20170213091745/http://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/entertainment/the-life-and-times-of-ramabai-ambedkar/article8478085.ece 13 फ़रवरी 2017 live जीवन रमाबाई का जन्म एक गरीब महार (दलित) परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम भिकु धोत्रे (वलंगकर) और माता का नाम रुक्मिणी था। वे रत्नागिरी जिले के दापोली के पास वंणद गाँव में नदी किनारे स्थित बस्ती में रहते थे। रमाबाई की तीन बहनें और एक भाई (शंकर) थे। उनके पिता भिकु वलंगकर दाभोल बंदरगाह में मछलियों की टोकरियाँ पहुँचाने का काम करते थे। रमा के बचपन में ही उनकी माता का बिमारी से निधन हुआ था। माता के जाने से बच्ची रमा के मन पर आघात हुआ। छोटी बहन गौरा और भाई शंकर तब छोटे थे। कुछ दिन बाद उनके पिता भिकु का भी निधन हो गया। आगे वलंगकर चाचा और गोविंदपुरकर मामा इन सब बच्चों को लेकर मुंबई में चले गये और वहां भायखला चाळ में रहने लगे। सुभेदार रामजी आंबेडकर यह अपने पुत्र भीमराव आंबेडकर के लिए वधू की तलाश कर रहे थे। वहां उन्हे रमाबाई का पता चला, वे रमा को देखने गये। रमा उन्हें पसंद आई और उन्होंने रमा के साथ अपने पुत्र भीमराव की शादी कराने का फैसला कर लिखा। विवाह के लिए तारिख सुनिश्चित कि गई और अप्रैल १९०६ में रमाबाई का विवाह भीमराव आंबेडकर से सपन्न हुआ। विवाह के समय रमा की आयु महज ९ वर्ष एवं भीमराव की आयु १४ वर्ष थी और वे ५ वी अंग्रेजी कक्षा पढ रहे थे। == पत्र-व्यवहार और संघर्ष "जब डॉ. भीमराव आंबेडकर उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका (1913-1916) और बाद में लंदन (1920 के दशक) में थे, तब उनके और रमाबाई के बीच पत्रों का सिलसिला शुरू हुआ। उन दिनों घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी, लेकिन रमाबाई ने कभी भी अपनी तकलीफों का जिक्र बाबासाहेब से नहीं किया ताकि उनकी पढ़ाई में बाधा न आए।प्रिया रामू सावरकर सुदाम भीमरत्न प्रकाशन बाबासाहेब अपने पत्रों में अक्सर घर के खर्च और बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में चिंता जताते थे। रमाबाई उन्हें सांत्वना देते हुए उत्तर लिखती थीं कि वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें। इन्ही पत्रों के माध्यम से बाबासाहेब उन्हें 'रामू' और रमाबाई उन्हें 'साहेब' कहकर संबोधित करती थीं। प्रिया रामू सावरकर सुदाम भीमरत्न प्रकाशन भारत hi यह पत्र-व्यवहार केवल पारिवारिक हाल-चाल नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के प्रति अगाध विश्वास और भविष्य के सामाजिक संघर्ष की नींव था।" प्रिया रामू सावरकर सुदाम भीमरत्न प्रकाशन भारत hi डॉ. अंबेडकर ने अपने विभिन्न निजी पत्रों में अपनी शैक्षणिक सफलता का श्रेय माता रमाबाई के त्याग को दिया। उन्होंने प्रसिद्ध रूप से लिखा था कि उनके "अद्वितीय आत्म-त्याग" के बिना, वह कभी भी अपनी विदेश यात्रा और पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते।प्रिय रामू सावरकर सुदाम == महाड़ सत्याग्रह और सामाजिक चेतना == मार्च 1927 के ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह (चवदार तालाब सत्याग्रह) के दौरान माता रमाबाई आंबेडकर ने भी बाबासाहेब के साथ आंदोलन में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की थी। वे केवल एक मूक दर्शक नहीं, बल्कि इस सामाजिक बदलाव और स्वाभिमान की लड़ाई का सक्रिय हिस्सा बनना चाहती थीं।कीर, धनंजय (1954). डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर: जीवन और कार्य, पॉपुलर प्रकाशन हालाँकि, उस समय महाड़ में जातिवादी तत्वों द्वारा हिंसा और दंगों की भारी आशंका थी। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा तथा माता रमाबाई के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए, डॉ. आंबेडकर ने उन्हें साथ ले जाने से मना कर दिया। इस निर्णय से माता रमाबाई काफी उदास और नाराज हुईं, क्योंकि उनका मानना था कि समाज के इस कठिन संघर्ष में उन्हें अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए था। यह घटना प्रमाणित करती है कि माता रमाबाई के मन में सामाजिक अन्याय के विरुद्ध गहरी चेतना और विद्रोह की भावना थी।कीर, धनंजय (1954). डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर: जीवन और कार्य, पॉपुलर प्रकाशन == नेतृत्व और महिला संगठन == जनवरी 1928 में, माता रमाबाई आंबेडकर को बॉम्बे (मुंबई) में स्थापित एक महिला संघ का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने वंचित समुदायों की महिलाओं को संगठित करने और उन्हें सामाजिक एवं शैक्षिक उत्थान के लिए एक मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व ने आगे चलकर महाड़ सत्याग्रह और कालाराम मंदिर सत्याग्रह (1930) जैसे आंदोलनों में महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया। महिलाओं के प्रति उनकी साझा प्रतिबद्धता का प्रमाण तब भी मिलता है जब जुलाई 1928 में डॉ. आंबेडकर ने बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल में 'प्रसूति लाभ विधेयक' (Maternity Benefit Bill) का पुरजोर समर्थन किया थापवार, उर्मिला और मून, मीनाक्षी. हम भी इतिहास का हिस्सा हैं: महाराष्ट्र में दलित महिलाओं का संघर्ष, प्रकाशक: जुबान बुक्स धारवाड़ हॉस्टल की घटना और "रमाई" उपाधि धारवाड़ के छात्रावास (Hostel) की यह घटना माता रमाबाई अंबेडकर के स्वतंत्र नेतृत्व, निर्णय लेने की क्षमता और समाज के प्रति उनके समर्पण का सबसे बड़ा उदाहरण है। बी.एच. वराले (B.H. Varale), जिन्हें बाबासाहब ने छात्रावास की जिम्मेदारी सौंपी थी, उनके संदर्भों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार यह घटना इस प्रकार है:Ref Cross Book Chapter Submission Validation Test 2019 https://doi.org/10.5555/bookchaptervalidation/test002 Book Title Submission Validation Test 87–107 The Test Institution 2026-02-10 संकट की स्थिति जब डॉ. बी.आर. अंबेडकर 1930-31 के दौरान गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) के लिए लंदन में थे, तब भारत में दलित आंदोलन और उनके द्वारा स्थापित संस्थानों को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा। बाबासाहब ने धारवाड़ (कर्नाटक) में छात्रों के लिए एक छात्रावास खोला था, जिसके संचालन की देखरेख श्री वराले कर रहे थे।Sewell Bernadette Farr Angela Akbari Ashley Carson-Stevens Andrew Dale Jeremy Edwards Adrian Evans Bridie Angela John Ann Torabi Fatemeh 2023-11-26 The cost of implementing the COVID-19 shielding policy in Wales https://doi.org/10.1186/s12889-023-17169-3 BMC Public Health 23 1 10.1186/s12889-023-17169-3 1471-2458 माता रमाबाई का धारवाड़ दौरा लंदन जाने से पहले बाबासाहब ने रमाबाई से छात्रावास का हालचाल लेने का आग्रह किया था। जब माता रमाबाई धारवाड़ पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि:Al-Muzahimi Maryam Khamis Rashid Mohammed Abunaser Fathi Mohammed Al-Housni Houda Abdullah Mohammed 2025-07-12 Exploring female leadership: servant leadership practices in basic education in Oman https://doi.org/10.1057/s41599-025-05185-0 Humanities and Social Sciences Communications 12 1 10.1057/s41599-025-05185-0 2662-9992 छात्रावास में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा था। धन की कमी के कारण छात्र कई दिनों से भूखे रहने को मजबूर थे। छात्रों की दयनीय स्थिति देखकर श्री वराले भी काफी चिंतित और लाचार थे। साहसी निर्णय और गहनों का त्याग ऐसी गंभीर स्थिति में माता रमाबाई ने किसी की मदद का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता (Leadership) और निर्णय लेने की शक्ति का परिचय दियाRef Cross Book Chapter Submission Validation Test 2019 https://doi.org/10.5555/bookchaptervalidation/test002 Book Title Submission Validation Test 87–107 The Test Institution 2026-02-10 ऐतिहासिक संदर्भ और घटना माता रमाबाई का नेतृत्व: रमाबाई तुरंत धारवाड़ पहुंचीं। छात्रों को भूख से व्याकुल देख उनका हृदय भर आया। उन्होंने बिना देर किए अपने सोने के गहने (आभूषण) उतारे और वराले जी को सौंप दिए ताकि उन्हें बेचकर छात्रों के लिए राशन खरीदा जा सके। निर्णय क्षमता: उन्होंने न केवल आर्थिक मदद की, बल्कि खुद वहां रहकर छात्रों के लिए भोजन बनाया। उनका यह निर्णय कि "गहनों से कीमती मेरे बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य है", उनके महान नेतृत्व गुणों को दर्शाता है। त्यागवंती माता रमाई मनोहर डॉ. यशवंत भीमरत्न प्रकाशन hi आज का कॉलेज (वर्तमान संदर्भ): माता रमाबाई के इसी ऐतिहासिक बलिदान और शिक्षा के प्रति उनके प्रेम को सम्मान देने के लिए, आज धारवाड़ में उनके नाम पर शिक्षण संस्थान मौजूद हैं।त्यागवंती माता रमाई मनोहर डॉ. यशवंत भीमरत्न प्रकाशन hi धारवाड़ में 'माता रमाबाई अंबेडकर आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज' (Mata Ramabai Ambedkar Arts & Commerce College) और उनसे जुड़े छात्रावास उनकी स्मृति को जीवित रखते हैं। त्यागवंती माता रमाई मनोहर डॉ. यशवंत भीमरत्न प्रकाशन hi इस कॉलेज का नाम माता रमाबाई के उसी "त्याग और नेतृत्व" की याद दिलाता है, जो उन्होंने बाबासाहब की अनुपस्थिति में धारवाड़ के छात्रों के लिए दिखाया था। रमाई' संबोधन: जैसा कि आपने गौर किया, उस समय के उनके नेतृत्व और ममतामयी व्यवहार को देखते हुए, उद्घाटन के बाद समाज ने उन्हें 'रमाई' नाम से संबोधित करना शुरू किया। 'रमाई' शब्द में 'आई' (मराठी में माँ) समाया हुआ है, जो उनके प्रति छात्रों के अगाध प्रेम और सम्मान का प्रतीक बन गया। यही कारण है कि आज भी उन्हें 'त्यागमूर्ति' कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने समाज के भविष्य के लिए अपनी आखिरी जमापूंजी (गहने) भी कुर्बान कर दी थीत्यागवंती माता रमाई मनोहर डॉ. यशवंत भीमरत्न प्रकाशन hi निधन २७ मई १९३५ को सुबह के ९ बजे रमाईबाई का निधन हुआ। उनके निधन के पाँच साल बाद, १९४० में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' माता रमाबाई को समर्पित की। उन्होंने पुस्तक के समर्पण पृष्ठ पर लिखा: 'मैं यह पुस्तक रामू (रमाबाई) को उसकी मन की सादगी, भलाई और मेरे साथ दुखों को सहने की उसकी क्षमता के लिए समर्पित करता हूँ।'Thoughts on Pakistan आंबेडकर बी. आर. Thacker and Company 1940 Bombay Dedication Page en सन्दर्भ कीर, धनंजय (1954): डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर: जीवन और कार्य, प्रकाशक: पॉपुलर प्रकाशन। मनोहर, डॉ. यशवंत: त्यागवंती माता रमाई, प्रकाशक: भीमरत्न प्रकाशन। गौतम, सी. डी. (2014): माता रमाबाई आंबेडकर, प्रकाशक: सम्यक प्रकाशन। श्रेणी:भीमराव आम्बेडकर का परिवार श्रेणी:1898 में जन्मे लोग श्रेणी:१९३५ में निधन श्रेणी:भारतीय महिला श्रेणी:महाराष्ट्र के लोग