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बाइबिल के अप्रामाणिक ग्रंथ

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सितंबर 2026बाइबिल के अप्रामाणिक ग्रंथ (Biblical apocrypha) ऐसे धार्मिक ग्रंथों का समूह है जिन्हें किसी यहूदी या ईसाई धार्मिक परंपरा ने पवित्र या धार्मिक साहित्य के रूप में महत्व दिया, लेकिन जिन्हें किसी विशेष बाइबिलीय कैनन में शामिल नहीं किया गया। “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग अलग-अलग काल और परंपराओं में अलग अर्थों में हुआ है। इसलिए किसी ग्रंथ का “अपोक्रिफल” होना यह आवश्यक नहीं करता कि वह सभी ईसाई परंपराओं में गैर-कैनन माना जाता हो।Encyclopædia Britannica, “Apocryphal Literature”, 1911. विशेष रूप से पुराने नियम से संबंधित कुछ ग्रंथ रोमन कैथोलिक चर्च में “द्वितीय-विधिसम्मत” (Deuterocanonical) माने जाते हैं, जबकि अधिकांश प्रोटेस्टेंट परंपराओं में उन्हें “अपोक्रिफा” कहा जाता है। कैथोलिक चर्च के वर्तमान कैनन में टोबित, जूदिथ, बारूक, सिराख, सुलैमान की बुद्धि, 1 मक्काबियों और 2 मक्काबियों के साथ एस्तेर और दानिय्येल के कुछ अतिरिक्त अंश शामिल हैं।Catechism of the Catholic Church — The Canon of Scripture, Vatican. अपोक्रिफल साहित्य का अध्ययन दूसरे मंदिर काल के यहूदी धर्म, प्रारंभिक ईसाई धर्म, बाइबिलीय कैनन के विकास, प्राचीन धार्मिक विचारों और यहूदी तथा ईसाई साहित्यिक परंपराओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।Encyclopædia Britannica, “Apocryphal Literature”, 1911. thumb|300px|1615 की जेनेवा बाइबिल की एक प्रति में अपोक्रिफा का पृष्ठ शब्दावली “अपोक्रिफा” शब्द यूनानी grc ἀπόκρυφος (apókryphos) से संबंधित है, जिसका मूल अर्थ “छिपा हुआ” या “गुप्त” है। प्रारंभिक धार्मिक साहित्य में इसका अर्थ हमेशा “झूठा” या “नकली” नहीं था। समय के साथ इसका प्रयोग उन धार्मिक रचनाओं के लिए होने लगा जो पवित्र या प्राचीन होने का दावा करती थीं, लेकिन जिन्हें किसी विशेष धार्मिक समुदाय के स्वीकृत शास्त्रीय कैनन में शामिल नहीं किया गया।Encyclopædia Britannica — The Term “Apocryphal”. आधुनिक विद्वत्ता में “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग सावधानी से किया जाता है, क्योंकि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में किसी पुस्तक की स्थिति अलग हो सकती है। उदाहरण के लिए, टोबित की पुस्तक और जूदिथ की पुस्तक प्रोटेस्टेंट बाइबिलों में सामान्यतः अपोक्रिफा मानी जाती हैं, लेकिन कैथोलिक बाइबिल में वे पुराने नियम के कैनन का हिस्सा हैं।New American Bible — Historical Books, Vatican. अपोक्रिफा और द्वितीय-विधिसम्मत ग्रंथ “द्वितीय-विधिसम्मत” (Deuterocanonical) शब्द मुख्यतः कैथोलिक और कुछ अन्य ईसाई परंपराओं में उन पुस्तकों या अंशों के लिए प्रयुक्त होता है जिनकी कैननिक स्थिति पर प्राचीन ईसाई परंपरा में कुछ समय तक मतभेद रहे, लेकिन जिन्हें बाद में उस परंपरा ने पवित्र शास्त्र का हिस्सा माना। कैथोलिक परंपरा पुराने नियम में 46 पुस्तकों को मानती है, जिनमें सात ऐसी पुस्तकें हैं जिन्हें वह द्वितीय-विधिसम्मत मानती है। इनमें टोबित, जूदिथ, बारूक, सिराख, सुलैमान की बुद्धि और 1 तथा 2 मक्काबियों की पुस्तकें शामिल हैं; एस्तेर और दानिय्येल में कुछ अतिरिक्त अंश भी इसी श्रेणी में आते हैं।The Jewish People and their Sacred Scriptures in the Christian Bible, Pontifical Biblical Commission. इसके विपरीत, अधिकांश प्रोटेस्टेंट परंपराएँ इन पुस्तकों को बाइबिल के कैनन से बाहर रखती हैं और उन्हें सामूहिक रूप से “Apocrypha” कहती हैं।The Jewish People and their Sacred Scriptures in the Christian Bible, Pontifical Biblical Commission. पुराने नियम से संबंधित अपोक्रिफा पुराने नियम के अपोक्रिफा से संबंधित पुस्तकों की सूची परंपरा के अनुसार अलग-अलग है। अंग्रेज़ी-भाषी प्रोटेस्टेंट परंपरा में “Apocrypha Proper” के अंतर्गत सामान्यतः निम्नलिखित ग्रंथों या अंशों का उल्लेख किया जाता है:Encyclopædia Britannica — Apocrypha of the Old Testament. ग्रंथ यह सूची किसी एक सार्वभौमिक “अपोक्रिफा कैनन” का प्रतिनिधित्व नहीं करती। विभिन्न बाइबिल संस्करणों और चर्चों में पुस्तकों की संख्या, क्रम और स्थिति अलग हो सकती है।Encyclopædia Britannica — Apocrypha Proper. thumb|280px|1921 में प्रकाशित अपोक्रिफल/द्वितीय-विधिसम्मत पुस्तकों का एक संस्करण प्रमुख द्वितीय-विधिसम्मत ग्रंथ टोबित टोबित की पुस्तक एक धार्मिक कथा है जिसमें टोबित, उसके पुत्र टोबियाह और स्वर्गदूत राफाएल से संबंधित घटनाएँ हैं। इसमें परिवार, दान, प्रार्थना, विवाह, मृत्यु और ईश्वर पर विश्वास जैसे विषय प्रमुख हैं। टोबित के अरामी और हिब्रू अंश कुमरान की गुफाओं से प्राप्त हुए हैं, जिससे इसके पाठ-इतिहास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण प्राचीन प्रमाण उपलब्ध हुए।New American Bible — Tobit and Maccabees, Vatican. जूदिथ जूदिथ की पुस्तक में जूदिथ नामक महिला की कथा है जो विदेशी सेनापति होलोफर्नेस के विरुद्ध अपने लोगों को बचाने के लिए साहस और रणनीति का प्रयोग करती है। यह ग्रंथ धार्मिक विश्वास, राष्ट्रीय संकट, साहस और ईश्वर पर निर्भरता जैसे विषयों को जोड़ता है। सुलैमान की बुद्धि सुलैमान की बुद्धि ज्ञान, न्याय, धर्मपरायणता और मनुष्य के अंतिम भाग्य पर दार्शनिक तथा धार्मिक चिंतन प्रस्तुत करती है। इसका साहित्यिक वातावरण यूनानी-भाषी यहूदी समाज से संबंधित माना जाता है। इस प्रकार यह ग्रंथ यहूदी धार्मिक विचार और हेलेनिस्टिक बौद्धिक संस्कृति के संपर्क को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।Encyclopædia Britannica — Apocrypha of the Old Testament. सिराख सिराख को Ecclesiasticus भी कहा जाता है। यह ज्ञान-साहित्य की रचना है जिसमें नैतिक व्यवहार, परिवार, मित्रता, शिक्षा, धन, सामाजिक संबंध और धार्मिक जीवन से संबंधित शिक्षाएँ मिलती हैं। इसके कुछ प्राचीन अंश हिब्रू में प्राप्त हुए हैं, जबकि इसकी पूर्ण परंपरा का अध्ययन यूनानी और अन्य प्राचीन अनुवादों के माध्यम से भी किया जाता है। बारूक बारूक की पुस्तक परंपरागत रूप से भविष्यवक्ता यिर्मयाह के सचिव बारूक से संबद्ध की जाती है। इसमें पाप, पश्चाताप, निर्वासन, ज्ञान और यरूशलेम के प्रति आशा जैसे विषय हैं। इसके साथ “यिर्मयाह का पत्र” भी कई ईसाई परंपराओं में संबंधित सामग्री के रूप में मिलता है। मक्काबियों की पुस्तकें 1 मक्काबियों और 2 मक्काबियों का केंद्र यहूदिया में सेल्यूकिड शासन के विरुद्ध हुए मक्काबी विद्रोह और उससे जुड़े धार्मिक-राजनीतिक संघर्ष हैं। 1 मक्काबियों का वर्णन अपेक्षाकृत ऐतिहासिक शैली में है और इसमें मत्ततियाह तथा उसके पुत्रों, विशेषकर यहूदा मक्काबी, योनातन और सिमोन से संबंधित घटनाएँ आती हैं।New American Bible — First Book of Maccabees, Vatican. 2 मक्काबियों की पुस्तक उसी व्यापक ऐतिहासिक काल की घटनाओं को अलग साहित्यिक और धार्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। इसमें शहादत, पुनरुत्थान और मृतकों के लिए प्रार्थना जैसे धार्मिक विचारों का विशेष महत्व है। thumb|260px|1 मक्काबियों की पुस्तक के लिए 1815 की चित्रित सज्जा सेप्टुआजेंट और अपोक्रिफा अपोक्रिफल पुस्तकों के इतिहास को सेप्टुआजेंट से अलग करके समझना कठिन है। सेप्टुआजेंट हिब्रू बाइबिल का प्राचीन यूनानी अनुवाद है, जिसकी पांडुलिपि परंपरा में हिब्रू कैनन से बाहर की कुछ पुस्तकें और अतिरिक्त अंश भी पाए जाते हैं। प्राचीन ईसाई समुदायों में यूनानी बाइबिल का व्यापक उपयोग हुआ। बाद में पश्चिमी ईसाई परंपरा में लैटिन अनुवादों, विशेष रूप से वुल्गाता, के माध्यम से इन ग्रंथों का प्रसार हुआ।Encyclopædia Britannica — Septuagint. इसलिए “हिब्रू बाइबिल”, “सेप्टुआजेंट”, “वुल्गाता” और विभिन्न ईसाई बाइबिलों के बीच पुस्तकों की सूची में अंतर अपोक्रिफा की स्थिति को समझने में केंद्रीय भूमिका रखता है। कैनन का विकास बाइबिलीय कैनन का निर्माण एक ही समय में हुई एकल घटना नहीं था। प्राचीन यहूदी और ईसाई समुदायों में विभिन्न धार्मिक पुस्तकों का उपयोग अलग-अलग स्तरों पर होता रहा। प्रारंभिक ईसाई लेखकों ने कभी-कभी उन पुस्तकों का उद्धरण किया जिन्हें बाद की कुछ परंपराओं ने कैनन से बाहर रखा। दूसरी ओर, कुछ धार्मिक नेताओं ने हिब्रू कैनन के बाहर के ग्रंथों को शास्त्रीय अधिकार देने पर आपत्ति की। इस कारण पश्चिमी ईसाई धर्म में इन पुस्तकों की स्थिति को लेकर लंबे समय तक मतभेद रहे।Encyclopædia Britannica — History of Apocryphal Literature. जेरोम चौथी-पाँचवीं शताब्दी के विद्वान जेरोम ने पुराने नियम के लिए हिब्रू पाठ को विशेष महत्व दिया। फिर भी वुल्गाता की पांडुलिपि परंपरा में ऐसे कई ग्रंथ बने रहे जिन्हें पश्चिमी ईसाई समुदाय धार्मिक उपयोग में लाता था। इससे कैनन, अनुवाद और चर्च-परंपरा के बीच संबंध को लेकर मध्यकालीन पश्चिमी ईसाई धर्म में एक जटिल स्थिति बनी रही।The Jewish People and their Sacred Scriptures in the Christian Bible, Pontifical Biblical Commission. ट्रेंट की परिषद ट्रेंट की परिषद ने 1546 में कैथोलिक चर्च के बाइबिलीय कैनन को औपचारिक रूप से परिभाषित किया। इसमें टोबित, जूदिथ, सुलैमान की बुद्धि, सिराख, बारूक, 1 मक्काबियों और 2 मक्काबियों सहित संबंधित अंशों को पवित्र और कैननिकल माना गया।Decretum de Canonicis Scripturis — Council of Trent, Vatican. इस प्रकार कैथोलिक उपयोग में “अपोक्रिफा” कहे जाने वाले कई पुराने नियमीय ग्रंथ वास्तव में कैनन का हिस्सा हैं और “द्वितीय-विधिसम्मत” नाम से जाने जाते हैं। प्रोटेस्टेंट परंपरा प्रोटेस्टेंट सुधार के दौरान बाइबिल के कैनन और धार्मिक अधिकार के प्रश्न पर नए सिरे से चर्चा हुई। मार्टिन लूथर ने जर्मन बाइबिल में इन पुस्तकों को अलग खंड में “Apocrypha” के रूप में रखा। कई प्रोटेस्टेंट परंपराओं ने हिब्रू बाइबिल की पुस्तकों को पुराने नियम का आधार माना और अपोक्रिफल पुस्तकों को कैनन से अलग रखा। कुछ परंपराओं में इनका नैतिक या ऐतिहासिक अध्ययन स्वीकार किया गया, जबकि उन्हें सिद्धांत स्थापित करने के लिए समान अधिकार नहीं दिया गया।Encyclopædia Britannica — Reformation and the Apocrypha. कुछ ऐतिहासिक प्रोटेस्टेंट बाइबिल, जैसे प्रारंभिक अंग्रेज़ी बाइबिल संस्करण और कुछ किंग जेम्स बाइबिल संस्करण, पुराने और नए नियम के बीच अपोक्रिफा का अलग खंड रखते थे। बाद के अनेक संस्करणों में यह खंड हटा दिया गया। thumb|260px|1685 की किंग जेम्स बाइबिल की प्रति, जिसमें अपोक्रिफा शामिल था पूर्वी ईसाई परंपराएँ पूर्वी रूढ़िवादी और कुछ अन्य प्राचीन पूर्वी ईसाई परंपराओं में पुराने नियम की पुस्तकों की सूची पश्चिमी प्रोटेस्टेंट परंपराओं से अलग है। कुछ पूर्वी कैननों में ऐसे अतिरिक्त ग्रंथ भी मिलते हैं जिन्हें पश्चिमी परंपराओं में सामान्यतः अपोक्रिफल माना जाता है। इसलिए “बाइबिल के अप्रामाणिक ग्रंथ” की कोई एक सार्वभौमिक सूची नहीं है। किसी पुस्तक की कैननिक स्थिति उस धार्मिक परंपरा और उसके द्वारा प्रयुक्त बाइबिल संस्करण पर निर्भर करती है। नए नियम के अपोक्रिफल ग्रंथ “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग केवल पुराने नियम से संबंधित पुस्तकों के लिए नहीं किया जाता। प्रारंभिक ईसाई काल में अनेक ऐसे ग्रंथ भी लिखे गए जो यीशु और प्रेरितों से संबंधित होने का दावा करते थे, लेकिन नए नियम के स्वीकृत कैनन में शामिल नहीं हुए। इनमें कई प्रकार के ग्रंथ शामिल हैं: थॉमस का सुसमाचार पतरस का सुसमाचार मरियम का सुसमाचार यहूदास का सुसमाचार शैशव सुसमाचार पतरस के कार्य पॉल के कार्य विभिन्न अपोकैलिप्स और पत्र इन ग्रंथों को सामान्यतः “नए नियम के अपोक्रिफा” या “अपोक्रिफल ईसाई साहित्य” कहा जाता है। इनका निर्माण अलग-अलग समय और ईसाई समुदायों में हुआ और इनमें धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोणों की विविधता मिलती है। thumb|280px|मध्यकालीन लैटिन बाइबिल की एक पांडुलिपि, जिसमें अपोक्रिफल पुस्तकें शामिल थीं अपोक्रिफल साहित्य और छद्मलेखकत्व अपोक्रिफल ग्रंथों का एक बड़ा भाग ऐसे नामों से जुड़ा है जिनका संबंध प्राचीन धार्मिक व्यक्तियों से बताया गया है। उदाहरण के लिए किसी पुस्तक को हनोक, बारूक, पतरस या किसी अन्य प्राचीन व्यक्ति से संबंधित बताया जा सकता है, जबकि आधुनिक विद्वान उसके वास्तविक लेखक और रचना-काल को अलग मानते हैं। ऐसी रचनाओं को समझने के लिए “छद्मलेखकत्व” (pseudepigraphy) की अवधारणा उपयोगी है। हालांकि अपोक्रिफा और pseudepigrapha एक ही श्रेणी नहीं हैं; दोनों शब्द अलग-अलग साहित्यिक और कैनन संबंधी विशेषताओं को व्यक्त करते हैं। पांडुलिपियाँ और पाठ-परंपरा अपोक्रिफल साहित्य अनेक भाषाओं में संरक्षित हुआ है। इनमें हिब्रू, अरामी, यूनानी, लैटिन, सिरिएक, कॉप्टिक, इथियोपिक, आर्मेनियाई और अन्य भाषाओं की पांडुलिपियाँ शामिल हैं। कुमरान से प्राप्त सामग्री ने विशेष रूप से यह प्रमाण दिया कि कुछ ऐसी पुस्तकों के प्राचीन हिब्रू या अरामी पाठ मौजूद थे जिनका बाद में यूनानी या अन्य भाषाओं में व्यापक प्रसार हुआ। टोबित की पुस्तक के हिब्रू और अरामी अंश कुमरान की गुफा 4 से प्राप्त हुए हैं।New American Bible — Tobit and the Dead Sea Scrolls, Vatican. मध्ययुगीन ईसाई पांडुलिपियों में भी अपोक्रिफल या द्वितीय-विधिसम्मत पुस्तकों को बाइबिल के अन्य ग्रंथों के साथ संकलित किया गया। उदाहरण के लिए, कोर्विनियाना संग्रह से संबंधित एक लैटिन बाइबिल पांडुलिपि में टोबित से लेकर मक्काबियों की पुस्तकों तक के अपोक्रिफल ग्रंथ शामिल हैं।The Bible. Second Volume of the Bible, Library of Congress. साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्व अपोक्रिफल और द्वितीय-विधिसम्मत साहित्य प्राचीन यहूदी समाज के धार्मिक और बौद्धिक जीवन के अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत है। इन ग्रंथों में निर्वासन, धार्मिक उत्पीड़न, यहूदी पहचान, ज्ञान, शहादत, पुनरुत्थान, प्रार्थना और ईश्वर के न्याय जैसे विषयों का विकास दिखाई देता है। मक्काबियों की पुस्तकें विशेष रूप से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के यहूदी प्रतिरोध और हस्मोनी इतिहास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर, सिराख और सुलैमान की बुद्धि जैसे ग्रंथ प्राचीन यहूदी ज्ञान-साहित्य और यूनानी बौद्धिक वातावरण के संपर्क को समझने में उपयोगी हैं।Encyclopædia Britannica — Historical Value of the Apocrypha. धार्मिक महत्व अपोक्रिफल ग्रंथों का धार्मिक महत्व समुदाय के अनुसार अलग-अलग है। परंपरा कैथोलिक चर्च वर्तमान में टोबित, जूदिथ, बारूक, सिराख, सुलैमान की बुद्धि, 1 और 2 मक्काबियों तथा एस्तेर और दानिय्येल के कुछ अंशों को अपने पुराने नियमीय कैनन में शामिल करता है।Catechism of the Catholic Church — Canon, Vatican. “अप्रामाणिक” शब्द की सीमा हिंदी में “अप्रामाणिक” शब्द कभी-कभी “नकली”, “झूठा” या “अविश्वसनीय” अर्थ दे सकता है। धार्मिक-अध्ययन के संदर्भ में यह अर्थ भ्रामक हो सकता है। अंग्रेज़ी “apocryphal” का अधिक सटीक अर्थ संदर्भ के अनुसार “कैनन से बाहर” या “अपोक्रिफल” हो सकता है। इसलिए किसी अपोक्रिफल पुस्तक के बारे में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि वह ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह निरर्थक या साहित्यिक रूप से असत्य है। इसी प्रकार “द्वितीय-विधिसम्मत” पुस्तक को कैथोलिक परंपरा में अप्रमाणिक नहीं माना जाता, क्योंकि वह उस परंपरा के आधिकारिक बाइबिलीय कैनन का हिस्सा है।La Biblia — Deuterocanonical Books, Vatican. आधुनिक अध्ययन आधुनिक बाइबिल अध्ययन में इन ग्रंथों का अध्ययन पाठालोचन, इतिहास, भाषाविज्ञान, धर्मों के इतिहास और साहित्यिक आलोचना के माध्यम से किया जाता है। शोधकर्ता विभिन्न पांडुलिपियों, प्राचीन अनुवादों और उद्धरणों की तुलना करके किसी ग्रंथ के मूल पाठ, रचना-काल, लेखकत्व और संपादन-इतिहास को समझने का प्रयास करते हैं। इस दृष्टि से अपोक्रिफल साहित्य केवल धार्मिक कैनन से बाहर रखे गए ग्रंथों का समूह नहीं है, बल्कि प्राचीन यहूदी और ईसाई विचारों के विकास को समझने के लिए एक व्यापक साहित्यिक स्रोत है। इन्हें भी देखें बाइबिल बाइबिल का कैनन पुराना नियम नया नियम सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ The Canon of Scripture — Vatican The Jewish People and their Sacred Scriptures in the Christian Bible — Pontifical Biblical Commission Origin and history of the books of the Bible, both the canonical and the apocryphal — Library of Congress Deuterocanonical books — Wikimedia Commons New Testament apocrypha — Wikimedia Commons