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मागी
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जून 2015
प्राचीन ईरान में पारसी धर्म के पुजारियों को मागी कहते थे। इन्हें उच्च वर्ग का समझा जाता था। इस्लाम के आने के बाद ये ईरान के प्राचीन धर्म के प्रतीक बन गए और मुस्लिम धर्म की शराब-नृत्य-संगीत की मनाही के नियम के पालन करने के बाद इनकी छवि भौतिकतावादी पुजारियों की तरह हो गई। मध्यकाल के ईरानी कवियों तथा सूफ़ियों ने इनका ज़िक्र कई बार शराब पीने व विधर्मी लोगों के रूप में किया है। आधुनिक प़ारसी में इसे माग़ुन नाम से भी बुलाया जाता है। ग्यारहवीं सदी में लिखी ये फ़ारसी रचना -
गर मन ज़े मय-ए-मैग़ाने मस्तम्, हस्तम।
वर आशिक़, व रिन्द व बुतपरस्तम, हस्तम।
हर कस ख़याल-ए-ख़ुद गुमान दारन्द
मन मीदानम ख़ुद, हमचूँ हस्तम, हस्तम।
(अगर मैं किसी माग़ी की दी शराब पीकर मस्त हूं, तो हूँ। अगर आशिक़, पाग़ल या मूर्ति पूजक हूँ तो हूँ। हर किसी को अपने बारे में शक है, मैं ख़ुद को जानता हूँ, जैसी हूँ, हूँ। इस्लामिक विचार में शराब पीना और मूर्तिपूजन दोनों मना हैं।)
श्रेणी:पारसी धर्म