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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

शिवानन्द गोस्वामी

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शिरोमणि भट्ट अनिश्चित / (अनुमानित १६५३ ईस्वी) पाणमपट्ट/कांचीपुरम (तमिलनाडु) अनिश्चित अनिश्चित / संभवतः बीकानेर (??) वृद्धावस्था चंदेरी, ओरछा, महापुरा, आमेर जयपुर, बीकानेर, काशीhttps://jharkhandlivenews.com/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE/ संग्रहीत प्रति 25 जनवरी 2022 25 जनवरी 2022 https://web.archive.org/web/20220125075029/https://jharkhandlivenews.com/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE/ dead तथा कुछ अज्ञात अन्य नगर भारतीय भारतीय शिरोमणि भट्ट / गोस्वामी शिवानन्द भट्ट/ शिवानन्द भट्ट / गोस्वामी शिरोमणि भट्ट / भट्टाचार्य शिरोमणि संस्कृत कविता तंत्रसाधना साहित्यकार पारम्परिक पद्धति से स्वाध्याय से संस्कृत, तमिल, तेलगू, ज्योतिष, खगोलशास्त्र, पालि, प्राकृत, तन्त्र-मंत्र, आयुर्वेद, धर्मशास्त्र, व्याकरण आदि महाराजा विष्णुसिंह, महाराजा अनूपसिंह, बुंदेला महाराजा देवीसिंह, राजा दुर्गसिंह चंदेरी राजगुरु / कुलगुरु विक्रम-संवत १७१० से १७९७(?) महापुरा जयपुर बीकानेर साक्षी-नाट्य-शिरोमणि/ गोस्वामी/ हिन्दू नाम शोधाधीन दो- श्री श्रीनिकेतन भट्ट (द्वितीय) / श्री विद्यानिवास गोस्वामी श्री जगन्निवास भट्ट / 'शिवानन्द गोस्वामी'| शिरोमणि भट्ट (अनुमानित काल : संवत् १७१०-१७९७) तंत्र-मंत्र, साहित्य, काव्यशास्त्र, आयुर्वेद, सम्प्रदाय-ज्ञान, वेद-वेदांग, कर्मकांड, धर्मशास्त्र, खगोलशास्त्र-ज्योतिष, होरा शास्त्र, व्याकरण आदि अनेक विषयों के जाने-माने विद्वान थे।1. अशोक आत्रेय : 'केसर क्यारी' : साप्ताहिक स्तम्भ : दैनिक नवज्योति इनके पूर्वज मूलतः कांचीपुरम तमिलनाडू के तेलगूभाषी उच्चकुलीन पंचद्रविड़ वेल्लनाडू ब्राह्मण थे, जो उत्तर भारतीय राजा-महाराजाओं के आग्रह और निमंत्रण पर राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य प्रान्तों में आ कर कुलगुरु, राजगुरु, धर्मपीठ निर्देशक, आदि अनौपचारिक पदों पर आसीन हुए|2. नागरिक (नंद किशोर पारीक) 'नगर-परिक्रमा' दैनिक स्तंभलेख:'राजस्थान पत्रिका शिवानन्द गोस्वामी त्रिपुर-सुन्दरी के अनन्य साधक और शक्ति-उपासक थे। एक चमत्कारिक मान्त्रिक और तांत्रिक के रूप में उनकी साधना और सिद्धियों की अनेक घटनाएँ उल्लेखनीय हैं।अशोक आत्रेय : 'शहर सवाया ' : साप्ताहिक स्तम्भ : दैनिक नवज्योति श्रीमद्भागवत के बाद सबसे विपुल ग्रन्थ सिंह-सिद्धांत-सिन्धु लिखने का श्रेय शिवानंद गोस्वामी को है।"संक्षिप्त मोनोग्राफ : 'साक्षीनाट्यशिरोमणि गोस्वामी शिवानंद' प्रकाश परिमल : स्मृति-प्रकाशन, डी-३९, देवनगर, जयपुर-302018 परिचय भारत के विपुल गौरवशाली और वैविध्यपूर्ण सांस्कृतिक-इतिहास के निर्माण में जिन महापुरुषों का योगदान चिरस्मरणीय रहा है - उन में आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु की लम्बी विद्वत-परम्परा की एक सुदृढ़ कड़ी के रूप में सत्रहवी शताब्दी के तैलंग ब्राह्मण, दार्शनिक-कवि तंत्र-चूड़ामणि शिवानन्द गोस्वामी (सं. १७१०-१७९७) का सांस्कृतिक और साहित्यिक योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है|5.हेमंत शेष : संपादक' समवेत' का आलेख 'उत्तर भारत के आन्ध्र' (१९७७) उत्तर भारतीय आन्ध्र-तैलंग-भट्ट-वंशवृक्ष6. 'उत्तर भारतीय आन्ध्र-तैलंग-भट्ट-वंशवृक्ष' (भाग-२) संपादक स्व. पोतकूर्ची कंठमणि शास्त्री और करंजी गोकुलानंद तैलंग द्वारा 'शुद्धाद्वैत वैष्णव वेल्लनाटीय युवक-मंडल', नाथद्वारा से वि. सं. २००७ में प्रकाशित के विवरणानुसार "तैलंग ब्राह्मणों के आत्रेय गोत्र में कृष्ण-यजुर्वेद के तैत्तरीय आपस्तम्ब में मूलपुरुष श्रीव्येंकटेश अणणम्मा थे"- जिनकी छठी पीढ़ी में जगन्निवासजी (प्रथम) के परिवार में शिवानन्द गोस्वामी के रूप में एक ऐसे विलक्षण विद्वान7.'संस्कृत-कल्पतरु' : संपादक कलानाथ शास्त्री एवं घनश्याम गोस्वामी : मंजुनाथ शोध संस्थान, सी-८, पृथ्वीराज रोड, सी-स्कीम, जयपुर-३०२००१ https://books.google.co.in/books?id=36JPAQAAMAAJ&q=shivanandgoswami&dq=shivanandgoswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&sa=X&ved=2ahUKEwi65P3Clcz1AhXqzIsBHVpYA7MQ6AF6BAgcEAI ने जन्म लिया जिनके तप, साधना, ज्ञान, शाक्त-भक्ति, तंत्र-सिद्धि और अध्यवसाय से प्रभावित हो कर काशी, चंदेरी, जयपुर, बीकानेर, ओरछा आदि राज्यों के तत्कालीन नरेशों ने इन्हें न केवल राज-सम्मानस्वरूप बड़ी-बड़ी जागीरें ही भेंट कीं https://books.google.co.in/books?id=Ad4BAAAAMAAJ&q=shivanand+goswami&dq=shivanand+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiI8emFksz1AhUxyYsBHR8YAIMQ6AF6BAgJEAI बल्कि अपने कुलगुरु https://books.google.co.in/books?id=0jzrAAAAMAAJ&q=shivanand+goswami&dq=shivanand+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiI8emFksz1AhUxyYsBHR8YAIMQ6AF6BAgIEAIऔर प्रथमपूज्य के रूप में आजीवन अपने साथ रख कर अपने-अपने राज्यों के सम्मान में श्रीवृद्धि भी की। https://books.google.co.in/books?id=SAJDAAAAYAAJ&q=shivanand+goswami&dq=shivanand+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiI8emFksz1AhUxyYsBHR8YAIMQ6AF6BAgLEAI https://books.google.co.in/books?id=YRFUAAAAYAAJ&q=shivanand+goswami&dq=shivanand+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiI8emFksz1AhUxyYsBHR8YAIMQ6AF6BAgCEAI ऐतिहासिक स्रोतों के अनुरूप शिवानन्द गोस्वामी तक का वंशवृक्ष 8.हेमंत शेष:'समवेत' प्रवेशांक : उत्तर-देशीय-आन्ध्र-संगति द्वारा १९७० में प्रकाशित : सी-८, पृथ्वीराज रोड, सी-स्कीम, जयपुर-३०२००१ कुछ इस प्रकार उपलब्ध होता है- श्रीव्येंकटेश अणम्मा→ → → → → → श्री समरपुंगव दीक्षित→ → → → → श्रीतिरुमल्ल्ल दीक्षित→ → → → श्रीश्रीनिकेतन (प्रथम)→ → → श्रीश्रीनिवास→ → श्रीजगन्निवास (प्रथम)→ श्रीशिवानन्द गोस्वामी (जो बाद में 'शिरोमणि भट्ट' के नाम से भी विख्यात हुए). वंशावली शिवानन्द गोस्वामी अपने यशस्वी पिता के दो अन्य पुत्रों-श्री जनार्दन गोस्वामी (प्रथम) और श्री चक्रपाणि से बड़े थे। कहीं उल्लेख है- ऐतिहासिक संस्कृत ग्रंथों- 'मुहूर्तरत्न' एवं श्रीनिकेतन (द्वितीय) द्वारा रचित 'आर्यासप्तशती' (रचनाकाल सन १६८८ ईस्वी) में शिवानन्द के द्रविड़-कुल का 'कवितामय' परिचय कुछ यों मिलता है - " भारतवर्ष के दक्षिण स्थित 'द्रविड़' प्रदेश में समस्त पापों का नाश करने वाली पावन नदी पेन्ना (वेना) के किनारे पाणमपट्ट नगर में निवास करते आत्रेय गोत्र मूलपुरुष श्रीव्येंकटेश अन्न्म्मा और उनके पुत्र समरपुन्गव दीक्षित के कुल में आगम निगम रहस्य और वेद-वेदांग/गों के ज्ञाता जो चूड़ान्त विद्वान थे, उन्होंने शास्त्रार्थों में अपने समय के अनेक उद्भट विद्वानों को 'पराजित' कर उन्हें अपना शिष्यत्व ग्रहण कराया था| उसी आत्रेय कुल की यशोपताका, नदियों और सागरों के पार फ़ैलाने वाले इस कुल में जन्मे जगन्निवासजी को बुंदेलखंड नरेशों ने आमंत्रित किया था और इनसे 'दीक्षा' ग्रहण कर वे नरेश उनके शिष्य बने थे| इन्हीं प्रतापी विद्वान जगन्निवासजी के तीन पुत्र हुए- (सबसे बड़े)- श्रीशिरोमणि भट्ट (शिवानन्द), (तत्पश्चात) श्रीजनार्दन और (अंत में) श्रीचक्रपाणि." 'सभेदा आर्या सप्तशती' में ही लिखा है- " श्रीनिवास गोस्वामी के पुत्र जगन्निवास के ज्येष्ठ पुत्र 'शिरोमणि' नाम से विख्यात हुए जो विद्यावंत, संत-प्रकृति के त्रयोगजा-वृत्ति के थे और जो अपने असाधारण पांडित्य के बल पर समस्त पंडित-समाज में समादृत हुए..." ग्रन्थ भूमिका 9.प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, रातानाडा, जोधपुर गोस्वामी सरनाम का आरम्भ शिवानंदजी के पितामह श्री श्रीनिवास भट्ट (प्रथम) दक्षिण से उत्तर भारत में आये थे। अपनी युवावस्था में उन्होंने तंत्रशास्त्र और 'श्रीविद्या' की दीक्षा जालंधर-पीठ के अधिपति द्रविड़ क्षेत्र के मनीषी देशिकेन्द्र सच्चिदानंद सुन्दराचार्य से ली थी- गुरु ने इन्हें तब संवत १६३० में 'गोस्वामी' की उपाधि दी। दीक्षा के उपरांत इनका नया नाम गोस्वामी विद्यानन्दनाथ पड़ा| ललिता की अर्चा में, श्रीविद्या में निरत हो जाने से इन्हीं का तीसरा नाम ललितानन्दनाथ गोस्वामी भी है। अतः तमिलनाडु तेलंगाना और आन्ध्र से आये इन आत्रेय ब्राह्मणों में 'गोस्वामी' कोई जातिसूचक शब्द नहीं, विद्वत्ता के लिए दी गई उपाधि है। इसके तीस वर्ष बाद में, संवत १६६० में महाप्रभु वल्लभाचार्य के योग्य पुत्र गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी को भी अकबर के एक फरमान से 'गोस्वामी' की जो उपाधि मिली वह आज तक अपने नाम के साथ पुष्टिमार्ग के संप्रदाय के आचार्य और उनके वंशज लगाते आये हैं। मोनोग्राफ: 'साक्षीनाट्यशिरोमणि गोस्वामी शिवानंद' प्रकाश परिमल : स्मृति-प्रकाशन, डी-39, देवनगर, जयपुर-302018 पृष्ठ ४) इस तरह 'गोस्वामी' सरनाम अलग अलग सन्दर्भों में मथुरास्थ और गोकुलस्थ- दोनों तैलंग-ब्राह्मणों के लिए प्रचलित हुआ। प्रवासी आत्रेय-आन्ध्र और संस्कृत-साहित्य शिवानन्द गोस्वामी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करने से पहले इनके कुछ पूर्वजों के सांस्कृतिक-अवदान की संक्षिप्त चर्चा भी प्रसंगवश ज़रूरी है ताकि यह ज्ञात हो सके इनके पूर्वजों की जो अटूट-विद्वत-परंपरा तमिलनाडु और आन्ध्रप्रदेश में चली आयी थी, उत्तर-भारत में इन वंशजों के आगमन पर भी अक्षुण्ण रही और प्रायः सभी प्रवासी-आंध्र पंडितों ने अपने वैदुष्य और अध्यवसाय से तत्कालीन उत्तर-भारतीय रजवाड़ों में 'कुलगुरु' या 'राजगुरु' के रूप निवास करते हुए प्राकृत, संस्कृत-साहित्य, ज्योतिषशास्त्र, संगीत, चित्रकला और तंत्र-साहित्य आदि के गूढ़ ज्ञान-भंडार की श्रीवृद्धि की। श्री व्येंकटेश अणम्मा की दूसरी पीढ़ी में शास्त्रार्थ-विशारद समरपुंगव दीक्षित हुए थे, कहा जाता है जिन्होंने अश्वमेध-यज्ञ तक करवाया था और 'अद्वैत-विद्यातिलकम' और 'यात्रा-प्रबंध' जैसे ग्रन्थ लिखे थे। विश्वविख्यात विद्वान गोपीनाथ कविराज की भूमिका के साथ ब्रह्मसूत्र की व्याख्या का यह ग्रन्थ 'अद्वैत-विद्यातिलकम' १९३० में गवर्मेंट संस्कृत लाइब्रेरी, काशी से प्रकाशित हुआ है। 10.अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, बीकानेर श्रीतिरुमल्ल दीक्षित ने 'योग-तरंगिनी', 'पथ्यापथ्य-निर्णय', श्रीनिकेतन भट्ट ने 'यशस्तिलक चम्पू', श्रीनिवास भट्ट ने सं. १५५३ में रची अपनी कृति 'शिवार्चन-चन्द्रिका', 'सौभाग्यरत्नाकर', 'चंडी-समयानुक्रम', 'श्रीनिवास चम्पू', 'त्रिपुरसुन्दरी पद्धति', 'सौभाग्य-सुधोदय', 'श्रीचंडिकायजन', श्री जगन्निवास भट्ट ने 'त्रिपुर-सुन्दरी' और 'शिवार्चान्चंद्रिका सूची', तथा चक्रपाणि गोस्वामी ने 'पंचायतन-प्रकाश' के माध्यम से दर्शन, साहित्य, आयुर्वेद, शाक्तोपासना, पूर्वज-प्रशस्ति और तंत्र आदि २ अनेक विषयों पर लेखन किया।'उत्तर भारतीय आन्ध्र-तैलंग-भट्ट-वंशवृक्ष' (भाग-२) संपादक स्व. पोतकूर्ची कंठमणि शास्त्री और करंजी गोकुलानंद तैलंग द्वारा 'शुद्धाद्वैत वैष्णव वेल्लनाटीय युवक-मंडल', नाथद्वारा शिवानन्द गोस्वामी का विशाल कृतित्व शिवानन्द गोस्वामी ने पैंतीस से भी अधिक छोटे-बड़े संस्कृत-ग्रंथों की रचना की थी। (Source : Genealogical Tree of Tailang-Brahmans: 1942)चम्पू आदि को छोड़ कर इनकी अधिकांश रचनाएं ललित-पद्य (कविता) में निबद्ध हैं। ग्रंथों के विषय देखने से ज्ञात होता है शिवानन्द गोस्वामी तंत्र-मंत्र, साहित्य, काव्यशास्त्र, आयुर्वेद, सम्प्रदाय-ज्ञान, वेद-वेदांग, कर्मकांड, धर्मशास्त्र, खगोल-, होराशास्त्र, ज्योतिर्विज्ञान आदि अनेक विषयों के कितने गहरे विद्वान थे। https://books.google.co.in/books?id=X2Q8AAAAMAAJ&q=shivanand+goswami&dq=shivanand+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiI8emFksz1AhUxyYsBHR8YAIMQ6AF6BAgGEAI'सिंह सिद्धांत सिन्धु' की प्रथम दस 'तरंगों' के उद्धरण-ग्रंथों की सूची चेन्नई (मद्रास) में प्रकाशित है। गोस्वामी जी नी यह ग्रन्थ ओरछा के राजा देवीसिंह के राज्याश्रय में रहते हुए लिखा था| (नीचे देखें-बाहरी कड़ियाँ) अंगूठाकार|सिंह सिद्धांत सिन्धु : महाग्रंथ का आवरण वह मूलतः त्रिपुर-सुन्दरी (देवी) के अनन्य-साधक और शक्ति-उपासक थे। https://books.google.co.in/books?id=36JPAQAAMAAJ&q=shivanandgoswami&dq=shivanandgoswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&sa=X&ved=2ahUKEwi65P3Clcz1AhXqzIsBHVpYA7MQ6AF6BAgcEAI कहा जाता है-अपनी आराध्य-देवी के प्रति उनकी निष्ठा इतनी सघन थी कि माता स्वयं सशरीर उपस्थित हो कर उनसे संवाद करती थीं! कुछ इसी स्तर की अविचल और एकनिष्ठ साधना आधुनिक समय में रामकृष्ण परमहंस की भी कही जाती है । श्रीविद्या के माध्यम से शक्ति-उपासना की इस उत्कट प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप उन्हें काशी के पंडित समाज ने 'साक्षी-नाट्य-शिरोमणि' की संज्ञा भी दी। https://books.google.co.in/books?id=36JPAQAAMAAJ&q=shivanandgoswami&dq=shivanandgoswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&sa=X&ved=2ahUKEwi65P3Clcz1AhXqzIsBHVpYA7MQ6AF6BAgcEAI पद्यबद्ध (काव्य के प्रारूप में) ज्ञान से भरी उनकी उपलब्ध ३० कृतियाँ इस प्रकार हैं : संस्कृत ग्रन्थ [[ सिंह-सिद्धांत-सिन्धु (सन १६७४ ईस्वी) [22] सिंह-सिद्धांत-प्रदीपक सुबोध-रूपावली श्रीविद्यास्यपर्याक्रम-दर्पण विद्यार्चनदीपिका ललितार्चन-कौमुदी लक्ष्मीनारायणार्चा-कौमुदी लक्ष्मीनारायण-स्तुति सुभगोदय-दर्पण आचारसिन्धु प्रयाश्चित्तारणव-संकेत आन्हिकरत्न महाभारत-सुभाषित-श्लोक-संग्रह व्यवहारनिर्णय [23] तंत्र-दर्शन-मीमांसा पृष्ठ ८१ |https://books.google.co.in/books?id=85fXAAAAMAAJ&q=%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%AF%E0%A4%83&dq=%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%AF%E0%A4%83&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwilrNDGrqn2AhXczzgGHY2ODgw4ChDoAXoECAkQAg वैद्यरत्न [24] https://books.google.com/books?id=0IIhyQEACAAJ&dq=%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A8&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&sa=X&ved=2ahUKEwiR9fjt1qn2AhX4R2wGHaamBeA4ChDoAXoECAgQAQ मुहूर्तरत्न कालविवेक तिथिनिर्णय अमरकोशस्य बालबोधिनी टीका स्त्री-प्रत्ययकोश कारक-कोश समास-कोश शब्द भेद प्रकाश आख्यानवाद पदार्थतत्वनिरूपण नय-विवेक ईश्वरस्तुति कुलप्रदीप श्रीचंद्रपूजा-प्रयोग नित्यार्चन-कथन जब कि डॉ.प्रभाकर शास्त्री https://epustakalay.com/book/55265-jaipur-ki-sanskrit-sahitya-ko-den-18351965-by-dr-prabhakar-shastri/ ने लिखा है- "शिवानन्द गोस्वामी की ४२ रचनाएं अनूप संस्कृत पुस्तकालय,बीकानेर; बीकनेरस्थ गोस्वामी परिवार; पुरातत्व मंदिर- शाखा जयपुर; सिंधिया ओरिएण्टल इंस्टीटयूट -उज्जैन; भंडारकर रिसर्च इंस्टीटयूट -पूना आदि अनेक स्थानों पर उपलब्ध हैं।" सिंह-सिद्धांत-सिन्धु इन सब ग्रंथों में 'सिंह-सिद्धांत-सिन्धु' वि॰सं॰१७३१ (सन १६७४ ई.) ऐसी कालजयी रचना है, जिसका अपने समकालीन-संस्कृत-ग्रंथों में कोई सानी नहीं है। इसमें रचे गए मौलिक श्लोकों की संख्या सर चकरा देने वाली है। सिंह-सिद्धांत-सिन्धु में कुल ३५,१३० संस्कृत श्लोक हैं जोश्रीमद्भागवत की कुल श्लोक संख्या से कहीं ज्यादा हैं। भागवत में 18 हजार श्लोक, 335 अध्याय तथा 12 स्कंध हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण से बड़ा विपुल सन्दर्भ सामग्री से संयोजित संभवतया यह अपनी तरह का सबसे बड़ा ग्रन्थ है। श्रीमद्भागवत महापुराण और 'महाभारत' जैसे कालजयी ग्रन्थ, अनेकानेक ऋषियों-विद्वानों की संयुक्त सुदीर्घ लेखन-परम्परा का प्रतिफल हैं, क्योंकि वेद व्यास एक व्यक्ति-विशेष का ही नाम नहीं, विभिन्न विद्वानों द्वारा समय-समय पर ग्रहण किया गया 'अकादमिक पद' (या चेयर) भी है) पर एक अकेले कृतिकार ने इतनी विशालकाय पाण्डुलिपि तैयार कर दी हो, ऐसा विलक्षण उदाहरण संस्कृत के साहित्यिक-इतिहास में मिलना दुर्लभ है। यह कृति जयपुर के पोथीखाना में https://books.google.co.in/books?id=22puAAAAMAAJ&q=shivanand+goswami&dq=shivanand+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&sa=X&ved=2ahUKEwjTifiIlMz1AhWKvpQKHckwBzY4ChDoAXoECAwQAg और अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, बीकानेर में पाण्डुलिपि की प्रति होने के बावजूद https://books.google.co.in/books?id=DLQeSBLpUwsC&pg=PA126&dq=shivanand+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&sa=X&ved=2ahUKEwjTifiIlMz1AhWKvpQKHckwBzY4ChDoAXoECDAQAg विद्वानों की दृष्टि से अनेक वर्षों तक लुप्तप्राय रही और इसका प्रकाशन लेखन के प्रायः चार सौ साल बाद संभव हुआ पर सौभाग्य से यह अब सुलभ है। जोधपुर के राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान ने यह महारचना लक्ष्मीनारायण गोस्वामी के सम्पादन में 5 खण्डों में प्रकाशित करने की योजना बनाई थी । इसके 3 खंड वहां से आ भी चुके हैं| https://www.rajasthanstudy.co.in/2019/11/rajasthan-oriental-research-institute.html https://web.archive.org/web/20211230164606/https://www.rajasthanstudy.co.in/2019/11/rajasthan-oriental-research-institute.html 30 दिसंबर 2021 ]] [] id=g3rXAAAAMAAJ&q=simha+siddhant+sindhu&dq=simha+siddhant+sindhu&hl=en&sa=X&ei=3ymyU-fbBIOSuATAg4DgCA&ved=0CCgQ6AEwAg यह महाग्रंथ संस्कृत काव्य, तंत्रशास्त्र, मंत्रशास्त्र, न्याय, निगम, मीमांसा, सूत्र, आचार, ज्योतिष, वेद-वेदांग, व्याकरण, औषधिशास्त्र, आयुर्वेद, यज्ञ-विधि, कर्मकांड, धर्मशास्त्र होराशास्त्र न जाने कितनी विधाओं और विद्याओं का विलक्षण और विश्वसनीय विश्वकोश (एनसाइक्लोपीडिया) ही है। इनके वंशज गोस्वामी हरिकृष्ण शास्त्री ने भी सिंह-सिद्धांत-सिन्धु की कुछ तरंगों का संपादन किया है ! https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%80_%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80 'सिंह-सिद्धांत-सिन्धु' https://epustakalay.com/book/281730-singh-siddhant-sindhu-vol-1-by-goswami-shivanand-bhatta-fatah-singh/ ^ https://rgbooks.net/shop/sanskrit/singh-siddhant-sindhu-vol-1/ ^ https://rgbooks.net/shop/sanskrit/singh-siddhant-sindhu-vol-3/ ^https://www.exoticindiaart.com/book/details/singh-siddhanta-sindhu-by-goswami-shri-shivananda-bhatt-part-2-old-and-rare-book-uaa813/ ^https://books.google.co.in/books?id=wWramj9u8Z0C&pg=PA92&dq=Singh-Siddhant-Sindhu&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&sa=X&ved=2ahUKEwiguNPYuIj2AhXwSGwGHV7YDu4Q6AF6BAgLEAI ^https://books.google.co.in/books?id=0FNFAQAAIAAJ&q=Singh-Siddhant-Sindhu&dq=Singh-Siddhant-Sindhu&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiguNPYuIj2AhXwSGwGHV7YDu4Q6AF6BAgDEAI सहित इनकी कुछ रचनाओं की हस्तलिखित प्रतियाँ जयपुर के पोथीखाने में भी हैं, जैसा इस सूची में अंकित है। जन्म और जन्म-स्थान यद्यपि प्रकाश परिमल जैसे अनुसंधानकर्ताओं'साक्षी नाट्य शिरोमणि : गोस्वामी शिवानन्द ने शिवानन्द जी का जन्म विक्रम संवत १७१० अंकित किया है, तथापि उनकी लघु-पुस्तक में इस तथ्य के साक्ष्य का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। सच तो यह है इनका जन्म असल में किस साल, कहाँ हुआ यह शोध का विषय है। इस का कारण केवल यह है कि पुराने ज़माने में महान से महान लेखक तक अपने निजी-जीवन के बारे में कोई सूचना या जानकारी अपनी कृतियों में अक्सर नहीं देते थे। उस युग में पूर्णतः गुप्त या अविज्ञप्त रह कर उच्चस्तरीय मौन सारस्वत-साधना में लीन रहना ही शिवानन्द जी जैसी अनेक विद्वत-विभूतियों की आन्तरिक मनोप्रवृत्ति रही होगी। ऐसा अनुमान बहुप्रचलित है कि अनेक नरेशों के सम्मानित कुलगुरु होने के बावजूद, अपना अंतिम समय गोस्वामीजी ने बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह के आग्रह पर उनके साथ ही व्यतीत किया होगा ।12. Bikaner Gazetteer, 1946 पर शिवानन्द गोस्वामी का देहावसान कहाँ हुआ- दक्षिण भारत में कहीं, या बीकानेर या आमेर / महापुरा में- यह शोध का विषय है। राज्याश्रय और सम्मान शिवानन्द गोस्वामी चंदेरी के गवर्नर (सूबेदार) देवीसिंह बुंदेला ( 1634-1642) https://books.google.co.in/books?id=qSYKAAAAIAAJ&q=%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9+%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE&dq=%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9+%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiGq5S3u6n2AhUr4zgGHT6yAAEQ6AF6BAgIEAI के समकालीन थे, जिन्होंने गोस्वामीजी से 'मंत्र-दीक्षा' लेकर भेंट में कुछ गांवों की जागीर बख्शी थी। इसी प्रकार ओरछा के सातवीं पीढ़ी के राजा देवीसिंह(1635-1641) ने भी इनकी विद्वत्ता से प्रभावित हो कर 4 ग्रामों की जागीर दी थी। https://books.google.co.in/books?id=YN4BAAAAMAAJ&q=sivananda+goswami&dq=sivananda+goswami&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&printsec=frontcover&sa=X&ved=2ahUKEwiv1NuE0Yj2AhWyyDgGHSr0B0QQ6AF6BAgEEAI <परिमल : उक्त जयपुर राजा विष्णुसिंह https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9 ने सन 1692 ईस्वी में इन्हें रामजीपुरा (जिस पर आज जयपुर का मालवीय नगर बना है), हरिवंशपुरा, चिमनपुरा और महापुरा ग्रामों की जागीर भेंट की थी, जिसका प्रमाण जयपुर के पोथीखाना के अभिलेख में आज भी सुरक्षित है। यह पट्टा वर्ष 2006 में पुनः प्रकाशित श्रीकृष्णभट्ट कविकलानिधि के ऐतिहसिक संस्कृत महाकाव्य ईश्वर विलास (संपादक : रमाकांत पाण्डेय) जयपुर के पृष्ठ 49 पर प्रकाशित देखा जा सकता है। जयपुर से 15 किलोमीटर दूर अजमेर रोड पर स्थित महापुरा ग्राम आज तो जयपुर महानगर का ही भाग है। महापुरा में गोस्वामी जी के वंशज पीढ़ियों तक निवास करते रहे। जनार्दन गोस्वामी को आमेर राजा बिशन सिंह ने ग्राम रामचन्द्रपुरा अजमेर रोड की जागीर बक्शी थी ! महापुरा में शिवानंदजी के वंशज श्रीमद्भागवत के आचार्य पुराण-मार्तंड गोपीकृष्ण गोस्वामी की सुपुत्री रामादेवी भट्ट से विख्यात संस्कृत साहित्यकार भट्ट मथुरानाथ शास्त्री का विवाह सन १९२२ में हुआ था। बीकानेर के महाराजा अनूप सिंह (१६६९-९८ ई.) https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9 द्वारा गोस्वामीजी को दो गांवों - पूलासर और चिलकोई की जागीर भेंट की गई थी। अपने जीवन के संध्याकाल में ये बीकानेर में ही रहे। संभवतः इनका देहावसान भी वहीं हुआ हो- किन्तु इनके अंतिम दिनों के बारे में कोई ऐतिहासिक-सामग्री उपलब्ध नहीं होती| शिवानन्द जी के बाद इनके पुत्रों ने भी अपनी कुल-परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए राज्याश्रय में अनेकानेक उपलब्धियां प्राप्त करना जारी रखा, जैसा अंग्रेज़ी दस्तावेज़14. The Biography of Rulers, Nobles,Gentlemen of Bikaner : Volume III : Page 134 by R.D. Sodhi, Hukum Singh, Extra Assistant Commissioner in Punjab and Vice-resident of the Regency Council, Bikaner से सिद्ध होता है- 'Maharaj shri Shivanandji, sole ascendant, gave Purnabhishek-Mantra to Maharaja Shri Anoop Singh ji Bahadur of Bikaner at Dilsuri (Pargana Delhi). The Maharaja bequeathed two villages CHIKLOI (tehsil Taranagar) and POOLASAR (tehsil Sadar) in Bhent on this most auspicious occasion to Shri Shivanandji Maharaj, the Rajguru. Thus Goswami Paramsukhji Maharaj, the youngest son of great Shri Shivanandji Maharaj settled at Bikaner on the request of HH Shri Gajsingh ji Bahadur,the Maharaja of Bikaner. Shri Suratsinghji, Maharaja of Bikaner also accepted Purnabhishek Mantra from Goswami Shri Paramsukhji Maharaj, the Rajguru, in 1855 AD and bequeathed the village KHETOLAI (tehsil Sadar)in Bhent and bequeathed on the most auspicious occasion of the sacred thread ceremony of Bishwnathji and kanhaiyalalji, real sons of shri Paramsukhji Goswami, village SURJANSAR (tehsil Shri Dungargarh. The Maharaja also granted the privilege of taking Rs. 1/- on each marriage of persons other than Brahmans and Mohammedans. The privilege of taking one paisa in the form of tax on each animal loaded with the custom chargeable goods and who enters the state boundary, was also granted to Goswami Paramsukhji Maharaj. The family enjoys the privilege of TAZIM and LAWAZMA...." बाएँ|अंगूठाकार|अंगूठाकार|शिवानंदजी के शिष्य महाराजा देवीसिंह के राजमहल :ओरछा thumb|शिवानन्द जी के आश्रम और ओरछा के महलों के मार्ग में स्थित मंदिर तांत्रिक-सिद्धियों की दो प्रसिद्ध घटनाएं प्रकाश परिमल ने अपने संक्षिप्त मोनोग्राफ में शिवानंदजी से सम्बद्ध एक आश्चर्यजनक घटना का उल्लेख कुछ इन शब्दों में किया है - ....जो महापुरुष अपनी अभूतपूर्व साधना के बल पर प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं, उनके प्रति ईर्ष्या-विद्वेष, ऐसे व्यक्तियों में जाग्रत होना अत्यंत स्वाभाविक है, जो अन्यथा राज्याश्रय में अपनी गरिमा और प्रभुत्व बनाये रख सकते थे। यद्यपि शिवानन्द गोस्वामी ओरछा में एक वनखंडी में अपना अलग आश्रम बना कर साधना में लीन रहते और दिन-रात अध्यवसाय में ही व्यतीत करते थे, तथापि (राजा) देवीसिंह के दरबारी विद्वान् उनके विरुद्ध अनेक प्रकार के प्रवाद उनकी अनुपस्थिति में बना कर राजा के कान भरते रहते थे| यह बात तो सर्वविदित थी कि ओरछा या बुंदेलों के इष्ट देवता, भगवान राम थे और इसी कारण इस क्षेत्र में अनेक राम और हनुमान मंदिरों की स्थापना भी हुई है, वैसे ओरछा में ही बुंदेलों के इष्ट हनुमानजी का एक मंदिर आज भी है| यह (हनुमान) मंदिर शिवानन्दजी के आश्रम और देवीसिंह के महलों के बीच पड़ता था। शिवानन्द के विद्वेशियों ने राजा से यह शिकायत कर दी कि बुंदेलखंड के इष्टदेवता का मंदिर रास्ते में होते हुए भी आपके गुरु, (आपके) इष्टदेव हनुमान जी को कभी प्रणाम नहीं करते| स्वयं राजा देवीसिंह ने जब यही बात इनके सामने रखी तो इन्होने विनोद में इतना ही कह कर टाल दिया कि "महाराज! यह मामला व्यक्तिगत श्रद्धाभाव का है और चूंकि में अहर्निश देवी के भाव में ही लीन रहता हूँ, इसलिए 'अन्य' भाव में जाने से इसमें मेरा और आपका अनिष्ट ही होगा! वैसे भी सब देवता तो भगवान के ही रूप हैं।.. " इनके उत्तर से राजा कदाचित पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो सका। इसलिए एक बार जब वे दोनों उसी हनुमान मंदिर के मार्ग से आ रहे थे, राजा ने फिर अपने इष्ट हनुमान को प्रणाम करने की आग्रह भरी विनती कर ही डाली। कहते हैं- जैसे ही आदिशक्ति के परम आराधक शिवानंदजी ने अपने हाथ प्रणाम हेतु आधे ही उठाए, उससे पूर्व ही पत्थर फटने की गडगडाहट की भयानक आवाज़ के साथ हनुमानजी की मूर्ति में ऊपर से नीचे तक एक गहरी दरार पड गयी! राजा यह अविश्वसनीय किन्तु प्रत्यक्ष चमत्कार देख कर बहुत भयभीत हो गया और तब उसी पल से उसके मन में आद्याशक्ति के प्रति भी गहरी निष्ठा जाग्रत हो गयी। ओरछा में उस हनुमान-मंदिर की मूर्ति में आज भी वह गहरी दरार देखी जा सकती है।...इस प्रसंग के बाद शिवानन्द गोस्वामी का मन दरबार में विद्वेशियों और चमत्कार के बल पर ही श्रद्धा रखने वाले धर्मप्राण राजन्यों के प्रति कुछ अधिक असम्प्रक्त हो गया। हनुमान जी की मूर्ति यों फट जाने पर उन्होंने "संक्षेप-प्रायश्चित्त" और "व्यवहार-निर्णय" जैसे ग्रन्थ लिख कर अपने इष्ट के समक्ष स्वयं अपनी शक्ति पर प्रायश्चित्त किया।..." शिवानंदजी के तांत्रिक-चमत्कार की दूसरी घटना औरंगजेब शासन के दौरान आमेर के राज्य पर आये राजनैतिक-संकटों के निवारण के लिए जयपुर के तत्कालीन पंडितों ने महाराजा विष्णुसिंह को नगर में शांति बनाये रखने के लिए वाजपेय-यज्ञ करवाने का मशविरा दिया था। तब काशी और मिथिला के कुछ पंडित अपनी साधना और सिद्धियों के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। आमेर के नरेश ने उन्हें ही इस काम के लिए जयपुर आमंत्रित किया। किन्तु दुर्योग से जब-जब भी उस राजसी वाजपेय-यज्ञ में पूर्णाहुति की वेला आती, यज्ञकर्ता पुरोहित की आकस्मिक मृत्यु हो जाती। ऐसा एक बार नहीं, कई बार हुआ। एक के बाद एक काशी-मिथिला के पांच सिद्ध पुरोहित यज्ञ पूरा कराने से पूर्व ही काल-कवलित हो गए। ऐसे विकट अपशकुन को देख कर राजा ने बीकानेर नरेश अनूपसिंह के माध्यम से ओरछा महाराज को यह संदेश भिजवाया कि वे कृपा कर उनके कुलगुरु और महान तांत्रिक शिवानंदजी को जयपुर भिजवाएं ताकि वह वाजपेय-यज्ञ की पूर्णाहुति करवा सकें| अंततः शिवानन्द गोस्वामी, सन १६८० ईस्वी में आमेर पहुंचे और जलमहल के पास उन्होंने जयपुर नरेश का वाजपेय-यज्ञ निर्विघ्न पूरा करवाया| पूर्णाहुति से एक रात पहले, कहते हैं एक विकट ब्रह्मराक्षस स्वप्न में गोस्वामीजी के सामने उपस्थित हुआ- जिसने उनसे शास्त्रार्थ करने की चुनौती इस सूचना के साथ दी कि पहले के पांच काशी-पंडित शास्त्रार्थ में उससे पराजित हो कर ही उसका ग्रास बन चुके थे। गोस्वामीजी ने ब्रह्मराक्षस की इस चुनौती को स्वीकार किया और उसे शास्त्रार्थ में हरा कर वाजपेय-यज्ञ पूर्णाहुति के साथ विधिवत संपन्न कराया| डॉ. प्रभाकर शास्त्री की पुस्तक https://booksinhindi.com/jaipur-ki-sanskrit-sahitya-ko-den-1835-1965-by-shastri-dr-prabhakar/ संग्रहीत प्रति 29 जनवरी 2022 29 जनवरी 2022 https://web.archive.org/web/20220129043929/https://booksinhindi.com/jaipur-ki-sanskrit-sahitya-ko-den-1835-1965-by-shastri-dr-prabhakar/ dead के अनुसार " श्रीकृष्ण भट्ट ने अपने 'ईश्वरविलास' महाकाव्य सर्ग २ श्लोक ५ में लिखा है इन्होनें महाराज विष्णु सिंह को (पूर्णाभिषेक) पूर्ण याग करवाने में सहयोग दिया था |" बाएँ|अंगूठाकार|300x300पिक्सेलपर राजा द्वारा इस तथ्य को छिपाने के लिए कि पहले के पांच काशी-पंडित शास्त्रार्थ में ब्रह्मराक्षस से पराजित हो कर उसका निवाला बन चुके थे, खिन्न शिवानंदजी, आमेर महाराजा से बिना दान-दक्षिणा लिए आमेर लौट आये| कहते हैं जब राजा विष्णुसिंह को शिवानन्दजी की नाराजगी की भनक लगी तो उन्हें मनाने खुद वह अपने पुत्र सवाई जयसिंह के साथ पहुंचे| शिवानंदजी ने सवाई जयसिंह के बारे में कुछ बेहद सटीक भविष्यवाणियां करते हुए राजा को निर्देश दिया कि ब्रह्मराक्षस की 'प्रेतमुक्ति' के लिए वह किसी जाने-माने कर्मकांडी पंडित को गया और काशी भिजवाएं| उन्होंने किंचित अप्रसन्नतापूर्वक महाराजा को पांच-पंडितों के वध का उत्तरदायी मानते, उन्हें कई प्राचीन शास्त्रों का हवाला देते हुए प्रायश्चित स्वरूप अश्वमेध यज्ञ करवाने की सलाह भी तभी दी होगी| निर्दोष ब्राह्मणों की मृत्यु से व्यथित होने के कारण उन्होंने महाराजा के सामने महापुरा में और रहने में अनिच्छा भी बड़ी विनम्रता से प्रकट की| अंततः अपने छोटे भाई [जनार्दन भट्ट] के पास पांच गांवों की जागीर और अकूत-संपत्ति का परित्याग कर गोस्वामीजी कुछ समय बाद आमेर त्याग कर बीकानेर के राजगुरु के रूप में महाराजा अनूपसिंह15.http://www.realbikaner.com/history/rulers/anupsingh.html के यहाँ चले गए"16.संक्षिप्त मोनोग्राफ : 'साक्षीनाट्यशिरोमणि गोस्वामी शिवानंद' प्रकाश परिमल- जिनका बीकानेर कुलगुरु-राजगुरु होने का आमंत्रण/अनुरोध कब से इनके पास लंबित था''| शिवानन्द जी के वंशज / सजातीय और उनकी कृतियाँ यह शुभ है कि छह सौ साल बाद भी शिवानन्द गोस्वामी की प्राचीन साहित्यिक रचना-परंपरा उत्तर भारत के प्रवासी आन्ध्र आत्रेय परिवारों में आज भी निर्बाध निरंतर जारी है! कलानाथ शास्त्री एवं घनश्याम गोस्वामी और पंडित कंठमणि शास्त्री ने शिवानंदजी के बाद की पीढी के विद्वान तैलंग ब्राह्मणों द्वारा समय-समय पर लिखे संस्कृत/ वृजभाषा ग्रंथों की सूची17.'संस्कृत-कल्पतरु' : संपादक कलानाथ शास्त्री एवं घनश्याम गोस्वामी : मंजुनाथ शोध संस्थान, सी-8, पृथ्वीराज रोड, सी-स्कीम, जयपुर-302001 प्रकाशित की है, जिसमें श्री निकेतन जी की 'आर्यासप्तशती, चक्रपाणि भट्ट की 'पंचायतन-प्रकाश' रमणजी (राधारमण गोस्वामी) की कृति 'वंशावली', कन्हैयालालजी की पुस्तक 'कनिष्ठ पूर्णाभिषेक स्तोत्र', ईश्वरीदत्त गोस्वामी (भूऋषि जी ) के ३१ ग्रन्थ और जनार्दन गोस्वामी, आनंदी देवी, देवीदत्त गोस्वामी, मंडन कवि, पद्माकर, गदाधर भट्ट, रामप्रसाद भट्ट 'प्रभाकर', लक्ष्मीधर भट्ट'श्रीधर', बंशीधर भट्ट, अम्बुज भट्ट, मिहीलाल, गौरीशंकर सुधाकर, गोविन्द कवीश्वर, गुरु कमलाकर 'कमल', प्रो. भालचंद्र राव, आचार्य भालचंद्र गोस्वामी 'प्रखर', प्रकाश परिमल, अशोक आत्रेय और हेमन्त शेष जैसे अनेक विद्वानों की पुस्तकें शामिल हैं। आधार Madras Presidency Library Catalog [[from_old_catalog] अशोक आत्रेय : 'केसर क्यारी' : स्तम्भ : दैनिक नवज्योति में प्रकाशित आलेख अशोक आत्रेय : 'शहर सवाया ' : साप्ताहिक स्तम्भ : दैनिक नवज्योति में प्रकाशित आलेख नागरिक (नंदकिशोर पारीक) 'नगर-परिक्रमा' दैनिक स्तंभलेख:'राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित आलेख https://web.archive.org/web/20190827173434/https://epustakalay.com/book/16689-raj-darbar-aur-ranivas-by-nk-pareek/ 'जयपुर-दर्शन': जयपुर अढाई शती समारोह समिति: संपादक : डॉ॰ प्रभुदयाल शर्मा 'सहृदय' नाट्याचार्य एवं हरि महर्षि तथा अन्य : १९७८ में प्रकाशित आलेख डॉ॰ सी. कुन्हनराजा प्रेजेंटेशन वोल्यूम, अड्यार लाइब्रेरी, मद्रास, तमिलनाडु, १९४६ जिसने पहले पहल 'सिंह-सिद्धांत-सिन्धु' के प्रथम दस 'तरंगों' में गोस्वामी जी द्वारा उल्लिखित सहायक-ग्रंथों की सूची प्रकाशित की है [] [] इन्हें भी देखें जनार्दन गोस्वामी पद्माकर महापुरा महाराजा बिशनसिंह भट्ट मथुरानाथ शास्त्री गोस्वामी हरिकृष्ण शास्त्री‎ कलानाथ शास्त्री प्रकाश परिमल [] [] सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ ] श्रेणी:महाकवि श्रेणी:संस्कृत कवि श्रेणी:राजस्थान के लोग श्रेणी:संस्कृत आचार्य श्रेणी:संस्कृत विद्वान श्रेणी:संस्कृत साहित्यकार श्रेणी:जयपुर के लोग