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मांडना
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मांडना राजस्थान , मालवा और निमाड़ क्षेत्र की लोक कला है। इसे विशेष अवसरों पर महिलाएँ ज़मीन अथवा दीवार पर बनाती हैं। मांडना, मंडन शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है सज्जा। मांडने को विभिन्न पर्वों, मुख्य उत्सवों तथा ॠतुओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसे आकृतियों के विभिन्न आकार के आधार पर भी बाँटा जा सकता है। उदाहरण-स्वरुप चौका, मांडने की चतुर्भुज आकृति है जिसका समृद्धि के उत्सवों में विशेष महत्व है जबकि त्रिभुज, वृत्त एवं स्वास्तिक लगभग सभी पर्वों या उत्सवों में बनाए जाते है। कुछ आकृतियों में आनेवाले पर्व का निरुपण एवं उस दौरान पड़ने वाले पर्वों को भी बनाया जाता है। मांडना की पारंपरिक आकृतियों में ज्यामितीय एवं पुष्प आकृतियों को लिया गया है। इन आकृतियों में त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त, स्वास्तिक, शतरंज पट का आधार, कई सीधी रेखाएँ, तरंग की आकृति आदि मुख्य है। इनमें से कुछ आकृतियाँ हड़प्पा की सभ्यता के काल में भी मिलती है। पुष्प आकृतियाँ ज्यादातर सामाजिक एवं धार्मिक विश्वास तथा जादू-टोने से जुड़ी हुई हैं जबकि ज्यामितीय आकृतियां तंत्र-मंत्र एवं तांत्रिक रहस्य से। कुछ ज्यामितीय आकृतियों के रूप किसी देवी या देवता से जुड़े होते हैं जैसे कि षष्टकोण जो दो त्रिभुज के जोड़कर बनाया जाता है, देवी लक्ष्मी को चिह्नित करता है। माडने की यह आकृति काफी प्रसिद्ध है तथा इसे विशेषत: दीपावली तथा सर्दियों में फसल कटाई के समय उत्सव में बनाया जाता है। इनके अलावा बहुत सारी आकृतियां किसी मुख्य आकृति के चारों ओर बनाई जाती है। ये आकृतियां सामाजिक एवं धार्मिक परंपरा पर आधारित होती है जिसमें वर्षों पुराने रीति-रिवाज तथा विभिन्न पर्वों में महिलाओं की दृष्टि को प्रदर्शित करती है। http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rj023.htm मांडना - राजस्थान की एक लोककला १७ मार्च २००८ एचटीएम टीडीआईएल https://web.archive.org/web/20081212032057/http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rj023.htm 12 दिसंबर 2008 dead
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