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411 समाचार
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छत्तीसगढ़ के उत्सव

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छत्तीसगढ़ भारत में सांस्कृतिक और पारंपरिक प्रथाओं की एक विविध श्रृंखला को अपनाता है। राज्य सरकार द्वारा जनजातीय संस्कृति को संरक्षित करने के लिए सावधानीपूर्वक कदम उठाए जाने के कारण, ये त्योहार और परंपराएँ प्राचीन काल से मनाई जाती रही हैं, जो इस क्षेत्र की गहरी जड़ें जमाए विरासत को दर्शाती हैं। छत्तीसगढ़ में बहुत से त्यौहार, पर्व व उत्सव मनाए जाते हैं। प्रमुख त्योहार बस्तर दशहरा thumb|right|250px|बस्तर दशहरा जुलूस के दौरान उपयोग किया जाने वाला विशाल लकड़ी का रथ। बस्तर दशहरा बस्तर संभाग का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है, जो आदिवासी समुदायों की सर्वोच्च देवी दंतेश्वरी को समर्पित है। 75 दिनों की अवधि में मनाया जाने वाला यह त्योहार दुनिया के सबसे लंबे त्योहारों में से एक माना जाता है।Bastar Dussehra - Jagdalpur, Chhattisgarh https://utsav.gov.in/view-event/bastar-dussehra-jagdalpur-chhattisgarh-1 Ministry of Tourism, Government of India 17 February 2026 भारत भर में मनाए जाने वाले मानक दशहरा के विपरीत, जो राम की रावण पर विजय के लिए मनाया जाता है, यह उत्सव स्थानीय देवताओं के समागम और जनजातीय अनुष्ठानों पर केंद्रित है, जिसकी शुरुआत 13वीं शताब्दी में राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा की गई थी।Bastaria Dussehra: A Coming Together of Deities https://www.sahapedia.org/bastaria-dussehra-coming-together-of-deities Sahapedia 17 February 2026 बस्तर लोक उत्सव बस्तर लोक उत्सव छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यह वर्षा ऋतु के बाद प्रतिवर्ष (आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में) मनाया जाता है और इसमें दूरस्थ क्षेत्रों से विभिन्न जनजातीय समूहों की भागीदारी होती है।Bastar Lokotsav: Cultural Extravaganza https://en.wikipedia.org/wiki/Bastar_Lokotsav 17 February 2026 इस समय के दौरान जगदलपुर में "बस्ता परब" नामक एक प्रमुख आयोजन किया जाता है, जिसमें जनजातीय गीत, नृत्य और दुर्लभ हस्तशिल्प प्रदर्शित किए जाते हैं। भोरमदेव महोत्सव यह महोत्सव ऐतिहासिक भोरमदेव मंदिर परिसर में कबीरधाम जिला में आयोजित किया जाता है और यह भगवान शिव को समर्पित है। इसे सबसे पहले 14वीं शताब्दी में नागवंशी वंश के राजाओं द्वारा आयोजित किया गया था।https://www.chhattisgarhtours.com/bhoramdeo-festival.html Bhoramdeo Festival of Chhattisgarh 17 February 2026 यह महोत्सव मार्च के अंत में आयोजित होता है, जिसमें पूरे राज्य से लोक कलाकार आते हैं और पंथी तथा राउत नाचा जैसे पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत करते हैं। चंपारण मेला चंपारण पुष्टिमार्ग संप्रदाय के संस्थापक संत वल्लभाचार्य की जन्मस्थली के रूप में एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहाँ प्रतिवर्ष दो प्रमुख मेले आयोजित किए जाते हैं: एक संत की जयंती के अवसर पर अप्रैल में और दूसरा, अधिक बड़ा मेला कार्तिक पूर्णिमा (अक्टूबर–नवंबर) के दौरान, जिसमें पूरे भारत से वैष्णव भक्त शामिल होते हैं। राजिम माघी पुन्नी मेला पूर्व में राजिम कुंभ के नाम से जाना जाने वाला यह राज्य के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है। यह "छत्तीसगढ़ का प्रयाग" में आयोजित होता है, जो महानदी, पैरी और सोंडूर नदियों का संगम (संगम) है।Rajim Maghi Punni Mela: The Fifth Kumbh http://www.sahapedia.org/rajim-maghi-punni-mela-rudri-0 Sahapedia 17 February 2026मेला माघ पूर्णिमा से शुरू होता है और महाशिवरात्रि पर समाप्त होता है, जिसमें पवित्र स्नान और आध्यात्मिक प्रवचन शामिल होते हैं। सांस्कृतिक और भाषा संबंधी पालन छत्तीसगढ़ राज्योत्सव: 1 नवंबर को राज्य के 2000 में गठन की स्मृति में मनाया जाता है। यह एक बहु-दिवसीय सांस्कृतिक और औद्योगिक उत्सव है, जो मुख्यतः नया रायपुर में आयोजित किया जाता है।Chhattisgarh Rajyotsava - Foundation Day https://en.wikipedia.org/wiki/Chhattisgarh_Rajyotsava 17 February 2026 छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस: 28 नवंबर को मनाया जाता है, उस दिन का उत्सव मनाने के लिए जब 2007 में छत्तीसगढ़ी को विधान सभा द्वारा आधिकारिक राज्य भाषा का दर्जा दिया गया था।Chhattisgarhi Rajbhasha Diwas Celebrations https://hanka.gurturgoth.com/chhattisgarhi-official-language-day-2/ Gurtur Goth 17 February 2026 होली जातीय उत्साह की अभिव्यक्ति का एक और उम्दा माध्यम है, छत्तीसगढ़ के अपने तीज-त्यौहार हैं। हिन्दुओं के त्यौहार ही प्रायः मानते हैं। अलबत्ता कुछेक त्यौहार जरुर ऐसे होते हैं जो खास महत्व लिए रहते हैं। इन्हीं में फागुन की मस्ती में डूबा होली विशेष त्यौहार है। होली देवार में काफी उमंग-हड़दंग के संग मनती है। इस दिन समूचा कुनबा महुये की मदमस्ती में मस्त हो जाता है। मांदर, ढोल मंजीरे के संग गीत भी गाये जाते है। होली पर किसी चिन्हित स्थान पर एकत्र होने का चलन है। इस रोज शुभ मुहुर्त देखकर बैगा अनुष्ठान करना है और उसकी अनुमति के उपरांत प्रतीकात्मक होली जलाई जाती है। वृद्ध-जवान और बच्चा मंडली भी मदिरा पीकर लोट-पोट होती है। पोरा देवारों में पोरा काफी महत्व है। अलबला तीजा नहीं मानते। सामान्यतः बहन को भाई जिस तरह अपने घर लाते हैं उस परंपरा की बजाय बहन ससुराल में रहकर ही तीजा मानती है। वहीं व्रत-उपवास आदि होता है। लेकिन वस्त्रादि उपहार स्वद्वप देने का कोई चलन नहीं है। पोरा में कुम्हारों से मिट्टी की कुछ वस्तुयें खरीदकर उसकी पूजा के बाद बलि दी जाती है। भादो के शुक्ल पक्ष में ठाकुर देव को भी ये लोग बड़ी आस्था से पूजते हैं और बलि के बाद प्रसाद बंटता है। सकट देवारों में सकट का अत्यधिक महत्वपूर्ण पर्व है। सकट में महिलायें अपने माता-पिता के घर आती है। उपवास रखा जाता है। सामूहिक भोज से उपवास तोड़ा जाता है। परिजन वस्त्र, श्रृंगार सामग्रियां अपनी कन्या को देते हैं। हरेली हरेली यद्यपि खेतिहर-समाज का पर्व है फिर भी इसके दूसरे स्वरुप यानी तंत्र मंत्र वाले हिस्से को देवारों का वर्ग मानता है। जिस तरह छत्तीसगढ़ के ग्राम्यांचलों में बुरी-बलाओं को बाहर ही रखने नीम की पत्तियों को लवय की तरह इस्तेमाल करते है। उसी तरह देवार भी नीम की डंगालों का सहारा लेते है। सुअर डेरा के बाहर नीम की पत्तियां खोंसी जाती हैं। अपने संगीतिक उपकरण को भी हरेली पर पूजते हैं। लेकिन व्यापक तौर पर हरेली का उत्सव नहीं मनता। thumb|हरेली के अवसर पर नीम के साथ एक ग्रामीण नृत्य-गान देवारों की प्रामणिक पहचान उनका सांस्कृतिक ज्ञान हैं। जन-सामान्य में भी उनके इसी रूप की सर्वाधिक ख्याति हैं। इन्हें प्रतिष्ठा दिलवाने में गायन, वादन एवं नृत्य पर इनका अचूक अधिका माना गया हैं। इस जन्म-जात और असाधारण कला-ज्ञान के चलते हर हमेशा से देवार जीवंत बने हुए हैं। जीवन के प्रत्येक पल में गीत नृत्य की खनक दीवारों का जातीय गुण हैं। इनकी इसी विशेषता के दर्शन रोजमर्रा की दिनचर्या में सायंकाल के समय में डेरा में आसानी से कर सकते हैं। जीविकोपार्जन का एक ठोस माध्यम तो यह हैं ही, वाद्य, गायन एवं नर्तन इन तीन बिंदुओं के सहारे भी इनकी विशेषतायें समझी जा सकती है। सांगीतक भेद को आधार मानें तो रायपुरिहा और रतनपुरिहा देवारों की अलग-अलग पहचान हैं। जो इन्हें समझने में भी सहायक बनते हैं। गोंचा महोत्सव इसे रथ महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है, यह पुरी की रथ यात्रा के साथ मेल खाता है। यह "टुपकी" परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहां आदिवासी युवा बांस की नकली बंदूकों का उपयोग करके गोंचा फलों को बिना नुकसान पहुंचाने वाले प्रक्षेप्य के रूप में चलाते हैं।Bastar Goncha Festival https://utsav.gov.in/view-event/bastar-goncha-festival-2025 Ministry of Tourism 17 February 2026 मड़ई उत्सव गोंड जनजाति का एक महत्वपूर्ण त्योहार, मड़ई दिसंबर से मार्च तक मनाया जाता है। यह एक भ्रमणशील त्योहार है जो एक गांव से दूसरे गांव (बस्तर से शुरू होकर नारायणपुर और कांकेर की ओर बढ़ते हुए) तक जाता है, जहां भक्त स्थानीय अधिष्ठाता देवता की पूजा करते हैं।Madai Festival Traditions https://en.wikipedia.org/wiki/Madai_Festival 17 February 2026 जनजातीय पांडुम बीजा पांडुम (प्रथम फल उत्सव): बस्तर क्षेत्र में एक वार्षिक अनुष्ठान, जहां जनजातीय समुदाय भरपूर फसल सुनिश्चित करने के लिए मौसम के पहले बीज देवताओं को अर्पित करते हैं।PM Modi lauds Bastar Pandum Festival https://www.newsonair.gov.in/chhattisgarhs-bastar-pandum-festival-showcases-rich-tribal-culture-says-pm-modi/ News On AIR 10 February 2026 17 February 2026 माटी तिहार (पृथ्वी उत्सव): जिसे माटी पूजा के नाम से भी जाना जाता है, यह उत्सव धरती माता को समर्पित है। इस दिन जनजातियाँ अपने खेतों से दूर रहती हैं ताकि धरती को विश्राम मिल सके, और उसकी उर्वरता तथा अकाल से सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं।https://bastariya.com/festivals-in-bastar/ Mati Tihaar (Earth Festival) in Bastar Bastariya.com 17 February 2026 अन्य मेलों की सूची नारायणपुर मेला: नारायणपुर जिले में आयोजित एक प्रमुख मड़ई-शैली का मेला, जिसमें जनजातीय बाज़ार और अनुष्ठानों का प्रदर्शन किया जाता है।https://www.chhattisgarhtours.com/narayanpur-mela.html Narayanpur Mela 17 February 2026 तीजा (तीज): एक मानसूनी पर्व जिसमें विवाहित महिलाएँ अपने पति के कल्याण के लिए कठोर निर्जला व्रत रखती हैं और देवी पार्वती को प्रार्थनाएँ अर्पित करती हैं।https://www.clubmahindra.com/blog/experience/everything-you-need-to-know-about-the-monsoon-festival-of-teej-5 Significance of Teej in Central India 17 February 2026 सन्दर्भ श्रेणी:छत्तीसगढ़ के उत्सव