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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

कपिल

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कपिल प्राचीन भारत के एक प्रभावशाली मुनि थे। उन्हे प्राचीन ऋषि कहा गया है। इन्हें सांख्यशास्त्र (यानि तत्व पर आधारित ज्ञान) के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है जिसके मान्य अर्थों के अनुसार विश्व का उद्भव विकासवादी प्रक्रिया से हुआ है। कई लोग इन्हें अनीश्वरवादी मानते हैं लेकिन गीता में इन्हें श्रेष्ठ मुनि कहा गया है। कपिल ने सर्वप्रथम विकासवाद का प्रतिपादन किया और संसार को एक क्रम के रूप में देखा। "कपिलस्मृति"उनका धर्मशास्त्र है। सुखसागर में इन्हें भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में से ही एक अवतार बताया गया है। संसार को स्वाभाविक गति से उत्पन्न मानकर इन्होंने संसार के किसी अति प्राकृतिक कर्ता का निषेध किया। सुख दु:ख प्रकृति की देन है तथा पुरुष अज्ञान में बद्ध है। अज्ञान का नाश होने पर पुरुष और प्रकृति अपने-अपने स्थान पर स्थित हो जाते हैं। अज्ञानपाश के लिए ज्ञान की आवश्यकता है अत: कर्मकाण्ड निरर्थक है। ज्ञानमार्ग का यह प्रवर्तन भारतीय संस्कृति को कपिल की देन है। यदि बुद्ध, महावीर जैसे नास्तिक दार्शनिक कपिल से प्रभावित हों तो आश्चर्य नहीं। आस्तिक दार्शनिकों में से वेदान्त, योग दर्शन और पौराणिक स्पष्ट रूप में सांख्य के त्रिगुणवाद और विकासवाद को अपनाते हैं। इस प्रकार कपिल प्रवर्तित सांख्य का प्रभाव प्राय: सभी दर्शनों पर पड़ा है। कपिल ने क्या उपदेश दिया, इस पर विवाद और शोध होता रहा है। तत्वसमाससूत्र को उसके टीकाकार कपिल द्वारा रचित मानते हैं। सूत्र छोटे और सरल हैं। इसीलिए मैक्समूलर ने उन्हें बहुत प्राचीन बतलाया। 8वीं शताब्दी के जैन ग्रं्न्थ 'भगवदज्जुकीयम्‌' में सांख्य का उल्लेख करते हुए कहा गया है– अष्टौ प्रकृतय:, षोडश विकारा:, आत्मा, पंचावयवा:, त्रैगुण्यम, मन:, संचर:, प्रतिसंचरश्च, (आठ प्रकृतियाँ, सोलह विकार, आत्मा, पाँच अवयव, तीन, गुण, मन, सृष्टि और प्रलय) ये सांख्यशास्त्र के विषय हैं। 'तत्वसमाससूत्र' में भी ऐसा ही पाठ मिलता है। साथ ही तत्वसमाससूत्र के टीकाकार भावागणेश कहते हैं कि उन्होंने टीका लिखते समय पंचशिख लिखित टीका से सहायता ली है। रिचार्ड गार्वे के अनुसार पंचशिख का काल प्रथम शताब्दी का होना चाहिए। अत: भगवज्जुकीयम्‌ तथा भावागणेश की टीका को यदि प्रमाण मानें तो 'तत्वसमाससूत्र' का काल ईसा की पहली शताब्दी तक ले जाया जा सकता है। इसके पूर्व इसकी स्थिति के लिए सबल प्रमाण का अभाव है। सांख्यप्रवचनसूत्र को भी कुछ टीकाकार कपिल की कृति मानते हैं। कौमुदीप्रभा के कर्ता स्वप्नेश्वर 'सांख्यप्रवचनसूत्र' को पंचशिख की कृति मानते हैं और कहते हैं कि यह ग्रन्थ कपिल द्वारा निर्मित इसलिए माना गया है कि कपिल सांख्य के प्रवर्तक हैं। यही बात 'तत्वसमास' के बारे में भी कही जा सकती है। परन्तु सांख्यप्रवचनसूत्र का विवरण माधव के 'सर्वदर्शनसंग्रह' में नहीं है और न तो गुणरत्न में ही इसके आधार पर सांख्य का विवरण दिया है। अत: विद्वान्‌ लोग इसे 14वीं शताब्दी का ग्रन्थ मानते हैं। लेकिन गीता (१०.२६) में इनका वर्णन आने से ये और प्राचीन लगते हैं। == परिचय == इनके समय और जन्मस्थान के बारे में निश्चय नहीं किया जा सकता। पुराणों तथा महाभारत में इनका उल्लेख हुआ है। कहा जाता है, प्रत्येक कल्प के आदि में कपिल जन्म लेते हैं। जन्म के साथ ही सारी सिद्धियाँ इनको प्राप्त होती हैं। इसीलिए इनको आदिसिद्ध और आदिविद्वान्‌ कहा जाता है। इनका शिष्य कोई आसुरि नामक वंश में उत्पन्न वर्षसहस्रयाजी श्रोत्रिय ब्राह्मण बतलाया गया है। परम्परा के अनुसार उक्त आसुरि को निर्माणचित्त में अधिष्ठित होकर इन्होंने तत्वज्ञान का उपदेश दिया था। निर्माणचित्त का अर्थ होता है सिद्धि के द्वारा अपने चित्त को स्वेच्छा से निर्मित कर लेना। इससे मालूम होता है, कपिल ने आसुरि के सामने साक्षात्‌ उपस्थित होकर उपदेश नहीं दिया अपितु आसुरि के ज्ञान में इनके प्रतिपादित सिद्धान्तों का स्फुरण हुआ, अत: ये 'आसुरि' के गुरु कहलाए। महाभारत में ये सांख्य के वक्ता कहे गए हैं। इनको अग्नि का अवतार और ब्रह्मा का मानसपुत्र भी पुराणों में कहा गया है। श्रीमद्भगवत के अनुसार कपिल विष्णु के पंचम अवतार माने गए हैं। कर्दम और देवहूति से इनकी उत्पत्ति मानी गई है। बाद में इन्होंने अपनी माता देवहूति को सांख्यज्ञान का उपदेश दिया जिसका विशद वर्णन श्रीमद्भगवत के तीसरे स्कन्ध में मिलता है। कपिलवस्तु, जहाँ बुद्ध पैदा हुए थे, कपिल के नाम पर बसा नगर था और सगर के पुत्र ने सागर के किनारे कपिल को देखा और उनका शाप पाया तथा बाद में वहीं गंगा का सागर के साथ संगम हुआ। इससे मालूम होता है कि कपिल का जन्मस्थान संभवत: कपिलवस्तु और तपस्याक्षेत्र गंगासागर था। इससे कम-से-कम इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि बुद्ध के पहले कपिल का नाम फैल चुका था। यदि हम कपिल के शिष्य आसुरि का शतपथ ब्राह्मण के आसुरि से अभिन्न मानें तो कह सकते हैं कि कम-से-कम ब्राह्मणकाल में कपिल की स्थिति रही होगी। इस प्रकार 700 वर्ष ई.पू. कपिल का काल माना जा सकता है। सांख्यशास्त्र का उद्देश्य तत्वज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त करना है। ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञकर्म के द्वारा अपवर्ग की प्राप्ति बतलाई गई है। कर्मकाण्ड के विपरीत ज्ञानकाण्ड को महत्व देना सांख्य की सबसे बड़ी विशेषता है। उपनिषदों में ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ माना गया है। यद्यपि अधिकांश उपनिषदों में ब्रह्म को चरम सत्ता और संसार को उसी का परिणाम या विवर्त बतलाया गया है; तथापि कुछ उपनिषदों में, मुख्य रूप से श्वेताश्वतर उपनिषद में सांख्य के सिद्धांतों का प्रतिपादन मिलता है। परन्तु यह प्रतिपादन क्रमबद्ध रूप में नहीं है, केवल कुछ ऐसे सिद्धान्तों की ओर संकेत करता है जिसका आगे चलकर सांख्य सिद्धान्त में समावेश हो गया। कपिल को आदिसिद्ध अथवा सिद्धेश कहने का अर्थ यह है कि सभ्भवत: कपिल ने ही सर्वप्रथम ध्यान और तपस्या का मार्ग बतलाया था। उनके पहले कर्म ही एक मार्ग था और ज्ञान केवल चर्चा तक सीमित था। ज्ञान को साधना का रूप देकर कपिल ने त्याग, तपस्या एवं समाधि को भारतीय संस्कृति में पहली बार प्रतिष्ठित किया। == सांख्य दर्शन == सांख्य में प्रकृति और पुरुष ये दो तत्व माने गए हैं। प्रकृति को सत्व, रजस्‌ और तमस्‌ इन तीन गुणों से निर्मित कहा गया है। त्रिगुण की साम्यावस्था, प्रकृति और इनके वैषम्य से सृष्टि होती है। सृष्टि में कुछ नया नहीं है, सब प्रकृति से ही उत्पन्न है। संसार प्रकृति का परिणाम मात्र है। सत्कार्यवाद और परिणामवाद के प्रवर्तक के रूप में सांख्य की प्रसिद्धि है। पुरुष के संनिधि मात्र से प्रकृति में वैषम्य होने से सृष्टि होती है। प्रकृति जड़ है-पुरुष चेतन, प्रकृति कर्ता है-पुरुष निष्क्रिय। लँगड़े और अन्धे के संयोग की तरह पुरुष और प्रकृति का संयोग है। पुरुष चेतन है और अपना बिम्ब प्रकृति में देखकर अपने को ही कर्ता समझता है और इसी अज्ञान के बन्धन में पड़कर दु:ख भोगता है, मोह को प्राप्त होता है। जिस समय पुरुष को ज्ञान हो जाता है कि वह कर्ता नहीं है, निर्लिप्त, कूटस्थ साक्षी मात्र है, प्रकृति का नाटय उसके लिए समाप्त हो जाता है। अज्ञानजन्य कर्मबन्ध से मुक्त होकर अपने केवल रूप को जान लेना कैवल्य या मोक्ष है और यही परम पुरुषार्थ है। मुक्त होने पर मुक्त पुरुष के लिए प्रकृति महत्वहीन है परन्तु अन्य संसारी पुरुष के लिए वह सत्य है क्योंकि प्रकृति का नाश नहीं होता। यही कारण है कि सांख्य में नाना पुरुष माने गए हैं। पुराणों तथा 'सांख्यप्रवचनसूत्र' के अनुसार पुरुषों के ऊपर एक पुरुषोत्तम भी माना गया है। यह पुरुषोत्तम या ईश्वर पुरुष को मोक्ष देता है। परन्तु प्राचीनतम उपलब्ध सांख्य ग्रन्थ 'सांख्यकारिका' के अनुसार ईश्वर को सांख्य में स्थान नहीं है। स्पष्टत: कपिल भी निरीश्वरवादी थे, सेश्वर सांख्य (ईश्वरवादी सांख्य) का विकास बाद में हुआ। सांख्य में पचीस तत्व माने गए हैं। पुरुष, पुरुष की संनिधियुक्त प्रकृति से महत्‌ या बुद्धि, बुद्धि से अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ अथवा सूक्ष्म भूत और मन, पाँच तन्मात्राओं से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेद्रियाँ और पाँच स्थूलभूत उत्पन्न होते हैं। इनमें से प्रकृति किसी से उत्पन्न नहीं है, महत्‌ अहंकार और तन्मात्राएँ, ये सात प्रकृति से उत्पन्न हैं और दूसरे तत्वों को उत्पन्न भी करते हैं। बाकी सोलह तत्व केवल उत्पन्न हैं, किसी नए तत्व को जन्म नहीं देते। अत: ये सोलह विकार माने जाते हैं, प्रकृति अविकारी है, महत्‌ आदि सात तत्व स्वयं विकारी हैं और विकार उत्पन्न भी करते हैं। == सन्दर्भ ग्रन्थ == विज्ञानभिक्षु :सांख्यप्रवचनभाष्य (रिचार्ड गार्वे द्वारा सम्पादित); ईश्वरकृष्ण : सांख्यकारिका; सुरेंद्रनाथ दासगुप्त : हिस्ट्री ऑफ़ इण्डियन फिलासफ़ी, भाग 1; एस. राधाकृष्णन्‌ : इण्डियन फिलासफ़ी, भाग 2; चक्रवर्ती : ओरिजिन ऐण्ड डेवेलपमेण्ट ऑफ़ सांख्य; ए.बी. कीथ : सांख्य; उदयवीर शास्त्री : सांख्य शास्त्र का इतिहास == बाहरी कड़ियाँ == सृष्टि विकास सिद्धांत के प्रवर्तक : कपिलमुनि महर्षि कपिल का जीवन वृत्तान्त