411 REFERENCE · Wikipedia
जगदेकमल्ल द्वितीय
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
प्रतीच्य चालुक्य राजा सन् 1138 से 1151 ईस्वी सोमेश्वर तृतीय तैलप तृतीय पश्चिमी चालुक्य राजवंश
सोमेश्वर तृतीय के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र कल्याणी के सिंहासन पर बैठा। अभिलेखों में उसके नाम का निर्देश नहीं है। अपने विरुद (यश या प्रर्शसासुचक पदवी) 'जगदेकमल्ल' के नाम से ही उसका उल्लेख आता है अतएव उसे जगदेकमल्ल द्वितीय (1138-55 ई.) कहा गया है। उसके अन्य विरुद थे- प्रेमप्रताप, चक्रवर्तिन् और त्रिभुवनमल्ल।
अपने पितामह विक्रमादित्य षष्ठ के समय में ही उसे शासन में विशेष महत्व का पद प्राप्त हो गया था। चालुक्य वंश की क्षीण होती हुई शक्ति का लाभ उठाकर विष्णुवर्धन् होयसल ने अपन राज्य का विस्तार धारवाड़ में बंकारपुर तक कर लिया था, फिर भी वह चालुक्यों की अधीनता स्वीकार करता था। उसने नरसिंह होयसल के साथ 1143 ई. के लगभग मालव पर आक्रमणकर जयवर्मन् के स्थान पर बल्लाल को सिंहासन पर बैठाया था। इसके अतिरिक्त लाट, गुर्जर, चोल, कलिंग और नोलंबपल्लव पर भी उसकी विजय का उल्लेख है लेकिन इसमें अतिशयोक्ति की संभावना अधिक है। जगदेकमल्ल को अपना अधिकार बनाए रखने में कई सेनानायकों और सामंतों से सहायता मिली थी। इनमें पेरमाडिदेव सिंद, बर्म्म दंडाधिप और केशिराज दंडाधीश के नाम उल्लेखनीय हैं। 1149 ई. के लगभग ही जगदेकमल्ल का छोटा भाई तैल तृतीय भी जगदेकमल्ल के साथ शासन में संयुक्त हो गया था।
जगदेकमल्ल ने एक संवत् की स्थापना की थी किंतु स्वयं उसके राज्यकाल में ही उसका सदैव उपयोग नहीं होता था; उसके शासन के बाद वह शीघ्र ही समाप्त हो गया। "संगीतचूड़ामणि" जगदेकमल्ल द्वितीय की कृति थी। कर्णाटक भाषाभूषण, काव्यालोकन और वास्तुकोश का रचयिता नागवर्म द्वितीय उसका उपाध्याय था।
1146 से 1181 ई. तक के काल में कल्याणी पर कलचुरि लोगों का अधिकार रहा। किंतु 1163 में तैल द्वितीय की मृत्यु के बाद भी चालुक्यों ने अपना दावा नहीं छोड़ा। जगदेकमल्ल तृतीय इसी समय हुआ। उसके अभिलेखों की तिथि 1164 से 1183 तक है। कदाचित् वह तैल तृतीय का पुत्र था। संभवत: परिस्थिति के अनुकूल वह कभी कलचुरि नरेश का आधिपत्य स्वीकार करता था और कभी स्वतंत्र शासक के रूप में राज्य करता था। उसके अभिलेख चितलदुर्ग, बेल्लारी और दूसरे जिलों से प्राप्त हुए हैं। एक अभिलेख में तो उसे कल्याण से राज्य करता हुआ कहा गया है। विजय पांड्य उसका सामंत था।
श्रेणी:भारत का इतिहास
श्रेणी:१२वीं शताब्दी के भारतीय शासक