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वल्ख के महाराजा
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वल्ख के महाराजा मध्य भारत के वल्ख क्षेत्र में तीसरी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में शासन करने वाला एक प्राचीन भारतीय राजवंश था। यह राजवंश ताम्रपत्र अभिलेखों से ज्ञात होता है, जो 38 से 134 वर्ष तक की तिथियों में अंकित हैं। आधुनिक इतिहासलेखन, विशेष रूप से वी. वी. मिराशी के शोध के आधार पर, इन तिथियों को आभीर-कलचुरि संवत (248/249 ई. से आरम्भ) में निर्धारित किया गया है, जिसके अनुसार उनका शासनकाल लगभग 286 से 382 ईस्वी तक माना जाता है। ये शासक प्राचीन अनूप क्षेत्र (आधुनिक खरगोन एवं धार जिले, मध्य प्रदेश) में महत्वपूर्ण थे और महिष्मति के कलचुरि राजवंश के पूर्ववर्ती माने जाते हैं।
ऐतिहासिक स्रोत
इस राजवंश काज्ञान मुख्य रूप से ब्राह्मणों एवं स्थानीय देवताओं को दान में दी गई भूमि का उल्लेख करने वाले ताम्रपत्र अभिलेखों से होता है। इनमें महाराजा भुलुण्ड (वर्ष 38-59), महाराजा स्वामिदास (वर्ष 67) और महिष्मति के महाराजा सुबंधु (वर्ष 167) के अभिलेख प्रमुख हैं। कई ताम्रपत्रों का प्राप्ति स्थान अज्ञात है, परंतु इनमें से एक बड़ा भाग धार जिले के बाघ स्थान के निकट रिसावला में खोजा गया था।
शासन क्षेत्र
वल्ख राजवंश कामुख्य क्षेत्र नर्मदा नदी के किनारे, वर्तमान खरगोन (पश्चिम निमाड़) एवं धार जिले में स्थित था। आधुनिक कस्बे "बाघ" का नाम कुछ विद्वानों के अनुसार "वल्ख" से व्युत्पन्न हुआ है। वी. वी. मिराशी ने वल्ख की पहचान आधुनिक वाघली (बहाल), जिला जलगाँव, महाराष्ट्र से की है, जो इस राजवंश को आभीर संवत के प्रचलन क्षेत्र में स्थापित करता है।
तिथि निर्धारण एवं संवत
वल्ख अभिलेखोंके तिथि निर्धारण को लेकर ऐतिहासिक बहस रही है।
आर. सी. मजुमदार एवं डी. सी. सरकार ने अनुमान लगाया था कि इन तिथियों का आधार गुप्त संवत (319 ई. से आरम्भ) है और वल्ख के शासक गुप्त साम्राज्य के सामंत थे।
इतिहासकार वी. वी. मिराशी ने इस सिद्धांत का स्पष्ट खंडन किया। उनके तर्क इस प्रकार हैं:
वल्ख के प्रारंभिक अभिलेख (जैसे वर्ष 67 = 316 ईस्वी) उस समय के हैं जब गुप्त साम्राज्य ने मालवा क्षेत्र पर लगभग 388 ईस्वी तक पश्चिमी क्षत्रपों से विजय प्राप्त नहीं की थी। ऐसे में गुप्त सामंत का उस क्षेत्र में अभिलेख जारी करना ऐतिहासिक दृष्टि से असंभव है। वल्ख क्षेत्र (अनूप) मालवा के पश्चिम में स्थित था, जो गुप्त हृदय स्थल से दूर था। इस क्षेत्र में स्थानीय आभीर संवत (249 ई. से आरम्भ) का ही प्रचलन था। वल्ख राजवंश, महिष्मति के कलचुरियों का सीधा पूर्ववर्ती था, जो स्पष्ट रूप से आभीर-कलचुरि संवत का प्रयोग करते थे।
इन ठोस प्रमाणों के आधार पर, आभीर-कलचुरि संवत के अनुसार ही वल्ख के महाराजाओं का शासनकाल लगभग 286 ईस्वी से 382 ईस्वी तक निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाता है तथा गुप्त संवत वाला सिद्धांत अमान्य माना जाता है।
ज्ञात शासक
अभिलेखोंमें निम्नलिखित शासकों का उल्लेख मिलता है:
महाराज भुलुण्ड
महाराज स्वामिदास
महाराजा रुद्रदास
महाराज सुबन्धु
महाराज भट्टारक
महाराज नागभट्ट
सन्दर्भ
वासुदेव विष्णु मिराशी : इंसक्रिप्शंस ऑव दि कलचुरि-चेदि इरा