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अकहानी
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अकहानी हिन्दी साहित्य में 1960 के दशक में उभरी कहानी की एक प्रवृत्ति थी, जिसे नई कहानी के बाद विकसित हुई साठोत्तरी कहानी की आरंभिक धाराओं में गिना जाता है। ज्ञानरंजन, गंगाप्रसाद विमल, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह, जगदीश चतुर्वेदी, राजकमल चौधरी और अन्य कहानीकारों की रचनाओं के संदर्भ में अकहानी की चर्चा हुई है। इसके साथ जुड़े लेखकों की रचनात्मक दृष्टि और शिल्प में पर्याप्त भिन्नता थी, इसलिए इसे एक संगठित साहित्यिक आंदोलन मानने को लेकर आलोचकों में मतभेद भी रहा है।https://ebooks.inflibnet.ac.in/hinp01/chapter/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8/ हिन्दी कहानी का विकास INFLIBNET Centre 13 सितंबर 2026
अकहानी की पृष्ठभूमि नई कहानी के बाद हिन्दी कहानी में आए बदलावों से जुड़ी थी। 1960 के आसपास कहानीकारों की एक पीढ़ी पारंपरिक कथानक, घटना-केंद्रितता और पूर्वनिर्धारित जीवन-मूल्यों से अलग कहानी लिखने की ओर बढ़ रही थी। इस प्रवृत्ति में व्यक्ति की मानसिक स्थिति, अकेलापन, अजनबीपन, ऊब, संत्रास, निरर्थकता-बोध और संबंधों में पैदा होने वाले तनाव को कथा का आधार बनाया गया। अकहानी को पश्चिमी साहित्य में विकसित 'एंटी-स्टोरी' की अवधारणा से प्रभावित प्रवृत्ति के रूप में भी देखा गया है।https://www.hindwi.org/aalochna/ikai-do-hindwi-desk-aalochna इकाई–दो : आलोचनात्मक लेखन हिन्दवी 13 सितंबर 2026
अकहानी में कहानी के पारंपरिक ढाँचे की जगह अनुभव और मनःस्थितियों को प्राथमिकता दी गई। घटनाओं के क्रम और स्पष्ट कथानक की अपेक्षा पात्र के आंतरिक द्वंद्व, संबंधों की जटिलता और जीवन के असंगत अनुभवों को अभिव्यक्ति देने पर जोर दिखाई देता है। शिल्प के स्तर पर भी रैखिक कथानक से हटकर प्रयोग किए गए। इस कारण अकहानी की कई रचनाओं में कहानी कहने की पारंपरिक अपेक्षाएँ टूटती हुई दिखाई देती हैं।https://egyankosh.ac.in/bitstream/123456789/80917/1/Block-1.pdf हिंदी कहानी का विकास, नई कहानी, साठोत्तरी कहानी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय 13 सितंबर 2026
ज्ञानरंजन की कहानियों को भी अकहानी और साठोत्तरी कहानी की चर्चा में रखा जाता है। इसी दौर के गंगाप्रसाद विमल, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह, जगदीश चतुर्वेदी, राजकमल चौधरी और अन्य कहानीकारों की रचनाओं में कथा और शिल्प के स्तर पर अलग-अलग प्रयोग दिखाई देते हैं। हालांकि इन सभी लेखकों को एक ही साहित्यिक कार्यक्रम या घोषणापत्र से जोड़ना उचित नहीं माना गया है।
अकहानी का प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित अवधि तक रहा। इसके बाद हिन्दी कहानी में सचेतन कहानी, सहज कहानी, समान्तर कहानी और जनवादी कहानी जैसी विभिन्न प्रवृत्तियाँ सामने आईं। इस प्रकार अकहानी को हिन्दी कहानी के उस संक्रमणकाल की प्रवृत्ति के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें कहानीकारों ने कथानक, चरित्र और कहानी की पारंपरिक संरचना को नए ढंग से देखने का प्रयास किया।
अकहानी को लेकर आलोचना में मतभेद बना रहा है। कुछ साहित्येतिहासों और आलोचनात्मक अध्ययनों में इसे हिन्दी कहानी के एक आंदोलन या प्रवृत्ति के रूप में दर्ज किया गया है, जबकि स्वयं इससे जुड़े कुछ लेखकों ने बाद में इसे संगठित आंदोलन मानने से इनकार किया। गंगाप्रसाद विमल ने 2006 के एक साक्षात्कार में कहा था कि 'अकहानी' नाम से कोई लिखित और संगठित आंदोलन नहीं था।https://www.publicationsdivision.nic.in/journals/Journalarchives/Ajkal/Ajkal-Hindi/2006/August/Ajkal_2006_August_pdf.pdf अकहानी और हिन्दी कहानी के आंदोलन प्रकाशन विभाग आजकल अगस्त 2006 13 सितंबर 2026
संदर्भ
श्रेणी:हिन्दी साहित्य
श्रेणी:हिन्दी कहानी
श्रेणी:साहित्यिक आंदोलन