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ठुमरी
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ठुमरी भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक गायन शैली है। इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है। अर्थात जिसमें राग की शुद्धता की तुलना में भाव सौंदर्य को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रीवास्तव हरिश्चन्द्र राग परिचय origyear= संगीत सदन प्रकाशन इलाहाबाद हिन्दी 91 5
यह विविध भावों को प्रकट करने वाली शैली है जिसमें शृंगार रस की प्रधानता होती है साथ ही यह रागों के मिश्रण की शैली भी है जिसमें एक राग से दूसरे राग में गमन की भी छूट होती है और रंजकता तथा भावाभिव्यक्ति इसका मूल मंतव्य होता है। इसी कारण इसे परंपरागत रूप से 'अर्ध-शास्त्रीय' कहा जाता है, यद्यपि यह अपनी पूर्ण कलात्मक परिपक्वता वाली एक स्वतंत्र शास्त्रीय विधा है।
thumb|गौहर जान द्वारा गाई गई ठुमरी, वर्ष १९०५ में रिकॉर्ड की गई
उत्पत्ति
ठुमरी की उत्पत्ति लखनऊ के नवाब वाज़िद अली शाह के दरबार से मानी जाती है। जबकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने इसे मात्र प्रश्रय दिया और उनके दरबार में ठुमरी गायन नई ऊँचाइयों तक पहुँचा क्योंकि वे खुद 'अख्तर पिया' के नाम से ठुमरियों की रचना करते और गाते थे। http://www.lucknow.amarujala.com/news/shahar-nama-lkw/lucknow-thumri-and-begum-akhtar/ लखनऊ की ठुमरी और ठुमरी की 'बेगम' दिसम्बर 19 2014 10 2013 सितम्बर अमर उजाला https://web.archive.org/web/20140525214407/http://www.lucknow.amarujala.com/news/shahar-nama-lkw/lucknow-thumri-and-begum-akhtar/ 25 मई 2014 dead हालाँकि इसे मूलतः ब्रज शैली की रचना माना जाता है और इसकी अदाकारी के आधार पर पुनः पूरबी अंग की ठुमरी और पंजाबी अंग की ठुमरी में बाँटा जाता हैhttp://www.ignca.nic.in/coilnet/kvj0039.htm ठुमरी शैली की उत्पत्ति एवं विकास 25 मई 2014 https://web.archive.org/web/20140525233948/http://www.ignca.nic.in/coilnet/kvj0039.htm 25 मई 2014 dead पूरबी अंग की ठुमरी के भी दो रूप लखनऊ और बनारस की ठुमरी के रूप में प्रचलित हैं।
प्रारूप
ठुमरी की बंदिश छोटी होती है और शृंगार रस प्रधान होती है। भक्ति भाव से अनुस्यूत ठुमरियों में भी बहुधा राधा-कृष्ण के प्रेमाख्यान से विषय उठाये जाते हैं।
ठुमरी में प्रयुक्त होने वाले राग भी चपल प्रवृत्ति के होते हैं जैसे: खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, तिलंग, पीलू, काफी, झिंझोटी, जोगिया इत्यादि।
ठुमरी सामान्यतः छोटी लम्बाई (कम मात्रा) वाले तालों में गाई जाती हैं जिनमें कहरवा, दादरा, और झपताल प्रमुख हैं। इसके आलावा दीपचंदी और झपताल का ठुमरी में काफ़ी प्रचलन है। राग की तरह ही इस विधा में एक ताल से दूसरे ताल में जाने की छूट भी होती है।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान समय में इस विधा की ओर रूचि के कम होने का कारण शास्त्रीय गायन ही में रूचि का ह्रास है। बनारस के जाने-माने ठुमरी गायक पं॰ छन्नूलाल मिश्र की मानें तो अब ठुमरी गाने वाले कम हो गए हैं और बनारस घराने की गायकी की इस विधा को सीखने-सिखाने का दौर मंद पड़ गया है। http://www.amarujala.com/news/states/uttar-pradesh/varanasi/Varanasi-118463-140/ लुप्त न हो जाए बनारस घराने की ठुमरी 06 2014 जनवरी अमर उजाला हिन्दी दैनिक https://web.archive.org/web/20140526012552/http://www.amarujala.com/news/states/uttar-pradesh/varanasi/Varanasi-118463-140/ 26 मई 2014 live
वहीं दूसरी ओर प्रयोग के तौर कुछ लोगों द्वारा वर्तमान समय में ठुमरी को पश्चिमी संगीत के साथ जोड़ कर ठुमरी के पारंपरिक वाद्यों, तबला, हारमोनियम, सारंगी और ढोलक के अलावा इसमें ड्रम्स, वॉयलिन, की-बोर्ड और गिटार के साथ अफ्रीकी ड्रम जेम्बे, चीनी बांसुरी और ऑर्गेनिक की-बोर्ड पियानिका का इस्तेमाल भी इस्तेमाल किया जा रहा है। http://www.dw.de/%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%82%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%A0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97/a-15904799 बार लाउंज के लिए ठुमरी का नया रंग दिसम्बर 18 2014 23 2012 04 लेख डायचे वेले हिन्दी https://web.archive.org/web/20141218200324/http://www.dw.de/%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%82%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%A0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97/a-15904799 18 दिसंबर 2014 live
विशेषताएँ
1) ठुमरी एक भाव प्रधान तथा चपल चाल वाला गीत है। इसमें शब्द कम होते हैं,किन्तु शब्दों को हाव-भाव द्वारा प्रदर्शित करके गीत का अर्थ प्रकट किया जाता है।
2) इसकी गति अति द्रुत नही होती। इसके साथ दीपचन्दी अथवा जात्तताल और पंजाबी त्रिताल का वादन किया जाता है !
3) खमाज, देश, तिलक कमोद, तिलंग, पीलू , काफी , भैरवी, झिंझोटी तथा जोगिया आदि रागों मेंं गाई जाती है!
4) ठुमरी शृंगार रस प्रधान गायकी है। शृंगार रस के संयोग व वियोग दोंनो पक्षों को बोल बनाव की गायकी के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत किया जाता है।
उदाहरण
अब ना बजाओ श्याम
बंसुरिया ना बजाओ श्याम
(ए री) ब्याकुल भयी ब्रजबाला
बंसुरिया ना बजाओ श्याम
नित मेरी गलिन में अइयो ना
आओ तो छुप के रहियो
बंशी की टेर सुनैयो ना
बंशी जो सुनैयो तो सुनैयो
फिर श्याम हमे अपनैयो ना
अपनैयो तो सुनिये लालन
फिर छोड़ हमें कहिं जैयो ना
बंसुरिया ना बजाओ श्याम
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
ठुमरी शैली की उत्पत्ति एवं विकास
Thumari: THE ROLE OF AESTHETIC THEORY IN THE INTERPRETATION AND PERFORMANCE OF A MODERN GENRE द्वारा Lalita du Perron
इन्हें भी देखें
खयाल
छन्नूलाल मिश्र