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प्रियप्रवास
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प्रियप्रवास, अयोध्यासिंह "हरिऔध" की हिन्दी काव्य रचना है। हरिऔध जी को काव्यप्रतिष्ठा "प्रियप्रवास" से मिली। इसका रचनाकाल सन् 1909 से सन् 1913 है। इसे आधुनिक हिन्दी ( [[खड़ी बोली ) का प्रथम महाकाव्य होने का गौरव प्राप्त है।
प्रियप्रवास वर्ष १९१३ में प्रकाशित हुआ। प्रखर मनीषा के धनी कविशिरोमणि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने ‘प्रियप्रवास’ महाकाव्य की रचना कर न केवल अपनी सर्जना-सामर्थ्य का परिचय दिया, बल्कि हिन्दी साहित्य को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित भी किया। हरिऔध को लोगों ने 'कवि सम्राट' कहा। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, पंडित रामचंद्र शुक्ल, श्रीधर पाठक आदि ने उनकी प्रशंसा की।
इस महाकाव्य में लोकमंगल की कामना कूट-कूट कर भरी है। इस खड़ीबोली के महाकाव्य में श्रीकृष्ण व राधा के अनूठे प्रेम को एक अलग परिभाषा देने तथा विश्वबंधुत्व की भावना जागृत करने का प्रयास किया गया है।
विषयवस्तु
'प्रियप्रवास' में १७ सर्ग हैं। इसका विषय है, श्रीकृष्ण की मथुरा-यात्रा। इसमें यात्रा की विशिष्टताओं के साथ नटनागर श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओं एवं कमनीय प्रसंगों को बड़े ही लालित्यपूर्ण शैली में उद्घाटित एवं चित्रित किया गया है। मथुरा-यात्रा के प्रसंग में श्रीकृष्ण की अपूर्व आभा एवं लालित्य का बड़ा ही मनभावन चित्रण हुआ है। फलस्वरूप इसके छन्दों में लालित्य, सरसता एवं संवेदना के मानो स्रोत ही फूट पडे़ हैं। "प्रियप्रवास" विरहकाव्य है। कृष्णकाव्य की परंपरा में होते हुए भी, उससे भिन्न है। "हरिऔध" जी ने कहा है - "मैंने श्री कृष्णचंद्र को इस ग्रंथ में एक महापुरुष की भाँति अंकित किया है, ब्रह्म करके नहीं। कृष्णचरित को इस प्रकार अंकित किया है जिससे आधुनिक लोग भी सहमत हो सकें।"
प्रियप्रवास की कथावस्तु का मूलाधार श्रीमद्भागवत का दशम स्कंध है, जिसमें श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनके यौवन, कृष्ण का ब्रज से मथुरा को प्रवास और लौट आना वर्णित है। सम्पूर्ण कथा, दो भागों में विभाजित है। पहले से आठवें सर्ग तक की कथा में कंस के निमंत्रण लेकर अक्रूर जी ब्रज में आते है तथा श्रीकृष्ण समस्त ब्रजवासियों को शोक में छोड़कर मथुरा चले जाते है। नौवें सर्ग से लेकर सत्रहवें सर्ग तक की कथा में कृष्ण, अपने मित्र उद्धव को ब्रजवासियों को सांत्वना देने के लिए मथुरा भेजते है। राधा अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर मानवता के हित के लिए अपने आप को न्योछावर कर देती है। राधा की प्रसिद्ध उक्ति है-
प्यारे जीवें जगहित करें, गेह चाहे न आवें।
विश्वम्भर मानव के अनुसार- “प्रियप्रवास भरतीय नवजागरण काल का महाकाव्य ही नहीं, यह जीवन के श्रेष्ठतम मानव-मूल्यों का कीर्ति-स्तंभ भी है। यह वैज्ञानिक युग की विभीषिका में मानवतावाद का विजयघोष है। कृष्ण को केन्द्र बनाकर इसमें जो कथा वर्णित है, उससे मनुष्य की महत्ता, जीवन की सुन्दरता, प्रेम की शक्ति और सबसे अधिक मानवीय संबंधों की अनुपमा कोमलता पर प्रकाश पड़ता है।”
प्रियप्रवास के पहले सर्ग में संध्या का वर्णन है।
दिवस का अवसान समीप था। गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु-शिखा पर थी अब राजती। कमलिनी-कूल-वल्लभ की प्रभा॥ (द्रुतविलम्बित छंद)
दूसरे सर्ग में गोकुलवासियों का कृष्ण से विरह होने के बाद उनका व्यथित होना दिखाया गया है।
तीसरे सर्ग में बाबा नन्द की व्याकुलता एवं माँ यशोदा के द्वारा भगवान् श्री कृष्ण की कुशलता के लिए की गई मनौतियों का वर्णन है।
चौथे सर्ग में राधा के सौंदर्य का चित्रण है।
पाँचवें सर्ग में गोकुल के विरह का वर्णन है साथ ही राधा और माता यशोदा की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
छठे सर्ग में कृष्ण और यशोदा का वर्णन है।
सातवें सर्ग में नन्द के मथुरा से लौटने पर माता यशोदा के अपने पुत्र श्री कृष्ण के विषय में प्रश्नों का मार्मिक वर्णन।
आठवें सर्ग में गोकुलवासियों के कृष्ण साथ बिताएँ गए पलों का वर्णन।
नौवें सर्ग में श्री कृष्ण का गोकुल की यादों में खोया हुए स्थिति का वर्णन है।
दसवें और ग्यारहवें सर्ग उद्धव प्रसंग के हैं।
बारहवें सर्ग में श्री कृष्ण का जननायक के रूप में वर्णन किया गया है।
तेरहवें सर्ग में कृष्ण का समाजसेवी रूप निकलकर आता है।
चौदहवें सर्ग में गोपी उद्धव संवाद का वर्णन है।
पन्द्रहवें सर्ग में श्री कृष्ण-विरह में गोपियों के विरह का वर्णन है।
सोलहवें सर्ग में राधा-उद्धव संवाद है।
सत्रहवें सर्ग में यह बताया गया है कि विश्व का प्रेम व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर है।
भाषा, छन्द एवं शैली
इसमें 'शृंगार' और ‘करुण रस’ की प्रधानता है। इसकी भाषा संस्कृत-गर्भित है। इसमें हिन्दी के स्थान पर संस्कृत का रंग अधिक है।
प्रियप्रवास की रचना के पहले से ही हिंदी कविता में ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली की स्थापना हो गई थी। मैथिलीशरण गुप्त का "जयद्रथवध" (खंडकाव्य) प्रकाशित हो चुका था। फिर भी खड़ी बोली में भाषा, छंद और शैली का नवीन प्रयोग किया जा रहा था। "प्रियप्रवास" भी ऐसा ही काव्यप्रयोग है। यह 'भिन्न तुकांत' अथवा अतुकांत महाकाव्य है। इसके पूर्व खड़ी बोली में महाकाव्य के रूप में अतुकांत का अभाव था। हरिऔध जी ने "प्रियप्रवास" की विस्तृत भूमिका में अपने महाकाव्य के लिए अतुकांत की आवश्यकता और उसके लिए उपयुक्त छंद पर विचार किया है। अतुकांत उनके लिए "भाषासौंदर्य" का "साधन" है। छंद और भाषा के संबंध में उन्होंने कहा हैं - "भिन्न तुकांत कविता लिखने के लिए संस्कृत वृत्त बहुत ही उपयुक्त हैं - कुछ संस्कृत वृत्तों के कारण और अधिकतर मेरी रुचि के कारण इस ग्रंथ की भाषा संस्कृतगर्भित है"।
"प्रियप्रवास" यद्यपि संस्कृतबहुल और समासगुंफित है, तथापि इसकी भाषा में यथास्थान बोलचाल के शब्दों का भी समावेश है। अतुकांत होते हुए भी इसके पदप्रवाह में प्राय: सानुप्रास कविता जैसा संगीत है, छंद और भाषा में लयप्रवाह है, फिर भी वर्णिक छंद के कारण यत्रतत्र भाषा हिंदी की पष्टि से कृत्रिम हो गई है, जकड़ सी गई है।
"प्रियप्रवास" द्विवेदी युग में प्रकाशित हुआ था। खड़ी बोली की काव्यकला (भाषा, छंद, अतुकांत, इत्यादि) में बहुत परिवर्तन हो चुका है। किंतु एक युग बीत जाने पर भी खड़ी बोली के काव्य-विकास में "प्रियप्रवास" का ऐतिहासिक महत्व है।
सन्दर्भ
अन्य परियोजनाओं पर
प्रियप्रवास
बाहरी कड़ियाँ
प्रिय प्रवास (कविताकोश पर)
प्रियप्रवास (हिन्दी समय, पर)
प्रियप्रवास (भारत डिस्कवरी, पर)
प्रियप्रवास में काव्य, संस्कृति और दर्शन
प्रियप्रवास
प्रियप्रवास महाकाव्य की समीक्षा (हिन्दीकुञ्ज)
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