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उपालम्भ काव्य
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प्राचीन काव्याचार्यों के मतानुसार उपालम्भ काव्य मुख्यतः शृंगारकाव्य का एक भेद, जिसमें नायिका की विश्वस्त सखी उपालम्भ (उलाहना) देकर नायक को नायिका के अनुकूल करती है। लेकिन सर्वत्र सखी द्वारा ही नायिका नायक को उपालंभपूर्ण संदेश नहीं देती, बल्कि संयोग शृंगार में नायिका स्वयं ही नायक को उपालंभ देती है। कहीं-कहीं नायिका, पक्षी, मेघ अथवा पवन द्वारा भी नायक को उपालंभ भेजती है। ऐसा प्राय: वियोग शृंगार में देख पड़ता है।
लोककाव्य में विरहिणी नायिका कागा आदि पक्षियों के माध्यम से अथवा प्रवासी पति के नगरादि से आए पथिक के माध्यम से उपालंभ देती है। नवपरिणीता युवती मायके के आत्मीय जनों की अभावजन्य वेदना तथा बहन भाई की कल्पित उपेक्षा का उपालंभ देती देख पड़ती है। इष्टदेव के प्रति दास्य भाव रखनेवाले भक्त कवियों ने (यथा सूरदास) भी उपालंभ का आश्रय लिया है।
किन्तु यह परिभाषा अपने में पूर्ण नहीं है। उपालंभ में मात्र उलाहना नहीं होता या प्रियपात्र की निन्दा ही नहीं होती; इसका मुख्य भाव है, किसी प्रकार प्रिय साहचर्य की अनुभूति या चेष्टा, सहयोगाकांक्षाजन्य विकलता और मिलन की अभिलाषा। परिभाषा के इसी वैशिष्ट्य के कारण उपालम्भ काव्य केवल शृंगार तक ही सीमित नहीं माना जा सकता।
हिंदी भक्तिकाव्य में उपालंभ पर्याप्त मात्रा में मिलता है। राधा तथा गोपियों के उपालम्भ के साथ माता यशोदा का कृष्ण के प्रति मधुर उपालम्भ, कृष्ण का यशोदा तथा बलराम के प्रति उपालम्भ तथा विनयभावना के अन्तर्गत भक्तों का अपने आराध्य के प्रति उपालंभ भी भक्तिकाव्य के सुंदर प्रसंग हैं। कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद जब नंद, यशोदा, राधा, गोप, गोपियाँ सब अत्यंत दुःखी हैं, उसी समय उद्धव कृष्ण की ओर से गोपियों को समझाने-बुझाने आते हैं। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में गोपियों द्वारा उद्धव को उपलक्ष्य बनाकर कृष्ण को उपालम्भ देने का अत्यन्त सुन्दर वर्णन है। इसी प्रसंग को काव्य में भ्रमरगीत के नाम से अभिहित किया गया है।
मैथिल कवि विद्यापति, चंडीदास, सूरदास, नंददास आदि प्राचीन कवियों ने ; भारतेंदु हरिश्चंद्र और जगन्नाथदास रत्नाकर आदि इधर के कवियों ने उपालंभ काव्य का पर्याप्त प्रयोग किया है। कुछ हास्यरस के कवियों ने भी यत्र-तत्र उपालंभ का सहारा लिया है।
इन्हें भी देखें
भ्रमरगीत
अन्योक्ति अलंकार
श्रेणी:काव्य
श्रेणी:साहित्य