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411 समाचार
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राष्ट्रीय हित

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राष्ट्रीय हित (national interest, फ्रेंच : raison d'État) से आशय किसी देश के आर्थिक, सैनिक, साम्स्कृतिक लक्ष्यों एवं महत्वाकाक्षाओं से है। राष्ट्रीय हित अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि राज्यों के आपसी संबंधों को बनाने में इनकी विशेष भूमिका होती है। किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति मूलतः राष्ट्रीय हितों पर ही आधारित होती है, अतः उसकी सफलताओं एवं असफलताओं का मूल्यांकन भी राष्ट्रीय हितों में परिवर्तन आता है जिसके परिणामस्वरूप विदेश नीति भी बदलाव के दौर से गुजरती है। परिभाषा राष्ट्रीय हितों सम्बन्धित अन्य जानकारी से पूर्व इन्हें परिभाषित करना अनिवार्य है जो इस प्रकार से है- चार्ल्स लर्च व अब्दुल सईद - राष्ट्रीय हित व्यापक, दीर्घकालीन एवं सतत् उद्देश्यों पर आधारित होते हैं जिनकी प्राप्ति हेतु राज्य, राष्ट्र व सरकार में सब अपने को प्रयत्न करता हुआ पाते हैं। वनर्न वॉन डाईक - राष्ट्रीय हित की रक्षा या उपलब्धि राज्य परस्पर मुकाबले में करना चाहते हैं। राष्ट्रीय हित की परिभाषा ही नहीं बल्कि इसके उद्देश्यों को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं है। कुछ विद्वान इन्हें विदेश नीति के उद्देश्यों से जुड़ा मानते हैं तो कुछ इसके मूलभूत मूल्यों से जुड़ा मानते हैं। पहली श्रेणी के विद्वानों के अनुसार यह स्थाई, अपरिवर्तित तथा शक्ति से जुड़ी अवधारणा है, लेकिन दूसरे इन्हें राष्ट्र के कल्याण, राजनैतिक विश्वास के संरक्षण, सीमाओं से सुरक्षा, क्षेत्रीय अखण्डता व राष्ट्रीय जीवन पद्धति से जुड़ा मानते हैं। परन्तु वास्तविक स्थिति यह है कि राष्ट्रीय हित व्यापक सन्दर्भ के रूप में लिए गए हैं। वर्गीकरण विभिन्न विद्वानों ने राष्ट्रीय हितों को कई श्रेणियों में बांटा है। उदाहरण स्वरूप, विद्वान इन्हें प्रथम कोटि के हित, गौण हित, स्थाई हित, अस्थाई हित, सामान्य हित, विशिष्ट हित आदि में वर्गीकृत करते हैं। लेकिन मूलतः इन्हें दो प्रमुख श्रेणियों में रखना ज्यादा स्पष्ट चित्रण प्रस्तुत करता है - (क) प्रमुख हित (ख) गौण हित जहां तक प्रमुख हितों की बात है प्रत्येक राष्ट्र तीन प्रमुख हितों के आधार पर अपनी विदेश नीति के उद्देश्य तय करते हैं। ये तीन प्रमुख हित हैं (१) राष्ट्रीय सुरक्षा/अखण्डता (२) आर्थिक विकास (३) अनुकूल विश्व व्यवस्था प्रत्येक राष्ट्र के प्रमुख उद्देश्यों में इन तीनों कारकों का होना इसलिए आवश्यक है कि प्रथम पर राज्य का मूल आधार/अस्तित्व टिका हुआ है। दूसरे पर उसका सुचारू विकास तथा तीसरे का महत्व इसलिए है कि इन हितों की पूर्ति एक विशिष्ट विश्व परिवेश में ही सम्भव है, एकान्तवास में नहीं। अतः कोई भी राष्ट्र इन तीन प्रमुख हितों के सन्दर्भ में ही अपनी विदेश नीति या राज्यों के साथ पारस्परिक संबंध स्थापित करता है। (ख) गौण हित प्रमुख हितों की भांति महत्वपूर्ण तो नहीं होते लेकिन किसी भी राष्ट्र को सत्ता में बनाये रखने हेतु आवश्यक होते हैं। इन हितों के लिए राष्ट्र अपना सर्वस्य या युद्धों तक जाने के लिए तैयार नहीं होता, परन्तु फिर भी इनकी पूर्ति हेतु प्रयास करता है। इन हितों के माध्यम से राष्ट्र अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, विरासत आदि द्वारा स्थापित आकांक्षाओं की पूर्ति करता है। इसके अतिरिक्त, अपने विदेशों में स्थापित कार्यों को पूर्ण करने की कोशिश करता है। इनके माध्यम से विदेशों में बसे अपने नागरिकों के हितों की पूर्ति के प्रयास भी करता है। अतः इन हितों की पूर्ति हेतु भी राष्ट्र काफी प्रयास करते हैं। परन्तु जैसा उपर कहा है कि कुल मिलाकर राष्ट्रहित गतिशील होते हैं, स्थाई नही। इसीलिए जितने ज्यादा से ज्यादा हो सकें उतने सम्भावित हितों की पूर्ति हेतु राष्ट्र प्रयासरत रहते हैं। अभिवृद्धि के साधन राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में जो भी बातें कही जाए, अन्ततः सत्य यह है कि सभी राष्ट्र इनकी अभिवृद्धि हेतु भरसक प्रयत्न करते हैं। इस संदर्भ में राष्ट्र विभिन्न साधनों का उपयोग करते हैं जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं- राजनय किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का कार्यान्वयन राजनय के माध्यम से ही होता है। राजनय अपने आप में नैतिक अनैतिक नहीं होता बल्कि अपने राष्ट्र हितों के अनुरूप होता है। न ही यह एक वस्तुनिष्ठ स्थिति है, बल्कि यह व्यक्तिपरक व्यवस्था है जिसका आकलन प्रत्येक राष्ट्र अपने-अपने दृष्टिकोण के अंतर्गत करता है। राजनय अपने देश के विदेशों में स्थापित दूतावासों व वाणिज्य केन्द्रों के अतिरिक्त विदेश मंत्रालय, राजनैतिक नेतृत्व व कई अन्य व्यक्तियों व संस्थाओं की भागीदारी के अनुरूप कार्यान्वित होता है। राजनय द्वि-पक्षीय एवं बहुपक्षीय दोनों प्रकार के होते हैं। राजनय के स्वरूप भी स्थितियों के अनुरूप नये-नये सन्दर्भों में प्रस्तुत होते हैं। कूटनीतिक राष्ट्रीय शक्ति का मस्तिष्क है। हमे इसको नही अपनाना चाहिए क्योंकि ये पागलपन है। प्रचार प्रचार भी राष्ट्रीय हितों में वृद्धि एवं पूर्ति का महत्त्वपूर्ण तरीका है। प्रचार दूसरे राष्ट्रों के तर्कों को गलत सिद्ध करने तथा अपनी बात को फैलाने का हमेशा तरीका रहा है, लेकिन 20वीं शताब्दी में ही प्रचार को एक मुख्य साधन के रूप में उपयोग किया गया है। इसका अति स्पष्ट रूप दो विश्व युद्धों के बीच के काल में देखने को मिला जब विभिन्न विचारधाराओं - साम्यवाद, नाजीवाद, फासिज्म - के माध्यमों से राष्ट्रों ने अपनी शक्ति स्थापित एवं संवर्धन हेतु इनका उपयोग किया। शीतयुद्ध काल में भी दोनों महाशक्तियों ने अपने-अपने वर्चस्व को बनाने हेतु राष्ट्रों के मध्य साम्यवादी व पूंजीवादी विकास के प्रतिमानों को अपनाने हेतु प्रतिस्पर्धा पैदा की। शीतयुद्धोत्तर युग में भी एक मात्र शक्ति द्वारा भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, मुक्त बाजार व्यवस्था आदि केवल राष्ट्रों के पास बचे विकल्प के रूप में तथा अपनी विदेश नीति की हस्तक्षेप की नीतियों को न्यायोचित स्थापित करने हेतु अत्यधिक प्रचार किया जा रहा है। इस प्रकार दो प्रमुख कारणों से पिछली शताब्दी में प्रचार का काफी प्रयोग हुआ है। पहला कारण रहा है संचार साधनों में आई क्रांति जिसने प्रचार को बहुत शीघ्रता, विश्वसनीय व आसानी से उपलब्ध करा दिया। दूसरा शायद अति आधुनिकतम हथियारों की उत्पत्ति से बल प्रयोग के विकल्प की समाप्ति ने भी इस साधन को अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। कारण जो भी रहे हों परन्तु वर्तमान में उपलब्ध संचार क्रांति के तरीकों ने प्रचार को विदेश नीति के प्रभावी तन्त्र के रूप में प्रस्तुत किया है। राजनैतिक युद्ध राजनैतिक युद्ध भी राष्ट्रहितों की अभिवृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण साधन रहा है। यह न तो युद्ध है परन्तु न ही शान्ति। इसके द्वारा राजनय के माध्यम से राज्यों के मध्य दण्डात्मक स्थिति बनाना या आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना जिससे विरोधियों पर दबाव की स्थिति बनी रहती है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विभिन्न तरीकों द्वारा राजनैतिक युद्ध की स्थिति पैदा की जाती है - (१) किसी समुदाय को भ्रमित प्रचार द्वारा विभाजित करना; (२) विरोधी राज्य में अल्पसंख्यकों को समर्थन देकर राज्य में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करना; (३) दूसरे राज्यों के महत्त्वपूर्ण उद्योगों, संचार केन्द्रों, यातायात के साधनों आदि में तोड़-फोड़ की कार्यवाही द्वारा व्यवधान उत्पन्न करना; (४) राजनेताओं की हत्या कराकर जन साधारण का मनोबल गिराना; (५) सरकार का तख्ता पलटने वालों को सक्रिय समर्थन देना (६) सीमा पार से आतंकवादी गतिविधियां चलाना आदि। आर्थिक साधन वर्तमान युग अन्तःनिर्भरता का युग है। प्रत्येक राष्ट्र, कितना ही शक्तिशाली हो या कितना ही छोटा हो, सभी को परस्पर एक दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। कोई भी सम्पूर्ण रूप से आत्म निर्भर नहीं है। परन्तु प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु वे राष्ट्र अपने संसाधनों के बल पर अपने राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि करते हैं। इन्हीं संसाधनों के प्रयोग से बड़ी शक्तियां विदेशों में सैन्य अड्डे स्थापित करने, विकासशील देशों में सत्ता परिवर्तन, सस्ता कच्चा माल प्राप्त करने, कमजोर राष्ट्रों की नीतियों को प्रभावित करने, राज्यों की मुद्रा के अवमूल्यन करने, व्यापार की शर्तें तय करने आदि में सफलता प्राप्त कर लेती हैं। इस संदर्भ में आर्थिक रूप से शक्तिशाली राष्ट्र अन्य देशों के प्रति दो प्रकार के साधनों का प्रयोग करते हैं - मुख्य आर्थिक तन्त्र तथा गौण आर्थिक तंत्र। मुख्य आर्थिक तंत्र का प्रयोग निम्न तरीकों से किया जाता है - आयात शुल्क लगाना; अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों को अपने पक्ष में रखना; कम मूल्य पर निर्यात करना; कर्ज या अनुदान देकर; विदेशी सहायता प्रदान करना आदि। गौण आर्थिक तन्त्र के आधार पर प्रयुक्त होने वाले साधनों के अंतर्गत - रियासत, बहिष्कार, नाकेबन्दी आते हैं। इन्हीं आर्थिक साधनों के द्वारा राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों में अभिवृद्धि करते हैं। साम्राज्यवाद 1945 से पूर्व अत्यधिक बड़ी शक्तियों ने साम्राज्यवाद का सहारा लेकर अपने राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि की थी। सामान्य तौर पर जब कोई राष्ट्र दूसरे राज्य की सीमा व जनता पर जबरदस्ती कब्जा कर लें तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं। इसकी व्याख्या हेतु अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। साम्राज्यवाद के स्वरूप को कई रूपों में देखा जा सकता है। यह बड़े राज्यों द्वारा कभी आर्थिक कारणों, यथास्थिति बनाये रखने, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा आदि कई कारणों से प्रेरित होती है। साम्राज्यवाद की नीतियों के द्वारा राष्ट्रों को आर्थिक लाभ, शक्ति निर्माण तथा अविकसित देशों के कल्याण आदि प्राप्त होते हैं। इससे शक्तियों के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होती है। परन्तु यदि वास्तव में देखा जाए तो कुछ चन्द राष्ट्रों के हितों के पूर्ति हेतु साम्राज्यवाद से ज्यादातर राष्ट्रों का शोषण, अन्याय, पिछड़ापन, गरीबी, भुखमरी आदि बढ़ती है। इसलिए 1945 के बाद के वर्षों में क्षेत्रीय साम्राज्यवाद समाप्त प्राय हो गया है। उपनिवेशवाद व नव उपनिवेशवाद उपनिवेशवाद के माध्यम से 18वीं व 19वीं शताब्दी में यूरोप की बड़ी ताकतों ने तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों पर राज्य किया है। इसके अंतर्गत विदेशी राज्यों पर बाह्य शक्तियों का शासन चलाया जाता रहा है जो स्थानीय लोगों के सभी विषयों पर अपना नियंत्रण रखते हैं। पूरी राजनैतिक व्यवस्था उनके हाथ में होती थी। सरकार विदेशी ताकतों द्वारा ही चलाई जाती थी। भू-भाग पर भी पूर्ण नियंत्रण बाह्य शक्तियों का ही होता था। स्थानीय लोगों की स्वतन्त्रताएं भी उन्हीं के इशारे पर चलती थी। परन्तु स्वतन्त्रता आन्दोलन के लम्बे संघर्ष ने 1950 व 1960 के दशकों में सभी को आजाद करा दिया तथा उपनिवेशी व्यवस्था का प्रायः अन्त हो गया। 1945 के बाद उपनिवेशवाद का स्थान 'नव उपनिवेशवाद' ने ग्रहण कर लिया। अब क्षेत्रीय व राजनैतिक रूप से तो राज्य स्वतन्त्र हो गए, लेकिन आर्थिक रूप से अभी भी गुलाम बने रहे। आर्थिक संसाधनों की दृष्टि से 30 प्रतिशत जनसंख्या 70 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग करती है तथा 70 प्रतिशत जनता मात्र 30 प्रतिशत संसाधनों का प्रयोग करती हैं। आज भी कच्चे माल की कीमतें, व्यापार की शर्ते, आर्थिक आदान-प्रदान, तकनीकी हस्तांतरण आदि सभी तीसरी दुनिया के देशों के विरुद्ध हैं। अब इन राष्ट्रों का शोषण अप्रत्यक्ष रूप से होने लगा है। आज बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, आर्थिक सहायता, पूंजीनिवेश कच्चे माल का आयात व तैयार-शुदा माल का निर्यात, दोयम दर्जे का तकनीकी हस्तांतरण आदि के माध्यम से विकसित देश आज भी विकासशील राज्यों का शोषण कर रहे हैं। विभिन्न गैर जरूरी मुद्दों जैसे बाल श्रम, पर्यावरण, मानवाधिकार आदि के नाम पर आज भी इनके साथ व्यापारिक व अन्य आर्थिक संबंधों में भेदभाव किया जाता है। अतः इन आर्थिक लाभों के कारण शक्तिशाली राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति एवं संवर्धन कर रहे हैं। युद्ध युद्ध को भी अन्तिम विकल्प के रूप में राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों के संवर्द्धन हेतु प्रयोग कर लेते हैं। युद्धों हेतु विभिन्न कारण व इसके विभिन्न स्वरूप होते हैं। परन्तु वर्तमान युग में हथियारों की मारक क्षमता एवं उनके विध्वंसक स्वरूप के कारण राष्ट्र युद्धों के प्रयोग से बचते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि युद्धों का त्याग कर दिया गया। बड़ी शक्तियां आज भी अपने राष्ट्र हितों की पूर्ति हेतु इसके प्रयोग से नहीं चूकती हैं। उदाहरण के रूप में वर्तमान समय में भी अमेरिका ने अफगानिस्तान व ईराक पर युद्ध करके अपनी एकमात्र वर्चस्व वाली महाशक्ति होने का परिचय दिया। अतः उपरोक्त साधनों के माध्यम से शक्तियां अपने राष्ट्रीय हितों में वृद्धि करती रहती है। यह शक्ति संवर्द्धन शान्तिपूर्ण तरीकों से लेकर युद्ध तक के अनेक निर्धारण तत्वों के द्वारा किया जाता है। लेकिन वर्तमान अन्तनिर्भरता के युग में कुछ राष्ट्रों के राष्ट्रीय हितों का संवर्द्धन अन्य राज्यों की कीमत पर होता है। इसीलिए राष्ट्रों को अपनी विदेश नीति का आधार बनाते समय दूसरे राष्ट्रों के हितों को भी देखना चाहिए। इसी प्रकार राष्ट्रीय हितों के उपयोग से विश्व में दूरगामी व निरन्तर शांति व सुरक्षा की स्थापना हो सकती है। श्रेणी:अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध