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नस्लवाद
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thumb|पेंसिल्वेनिया, संयुक्त राज्य अमेरिका में गवर्नर चुनाव के लिए एक नस्लवादी अभियान पोस्टर, १८६६
नस्लवाद या प्रजातिवाद एक सिद्धान्त या अवधारणा है, जो किसी एक नस्ल को दूसरी से श्रेष्ठतर या निम्नतर मानती है। नस्लवाद को ऐसे परिभाषित किया गया हैं-"यह विश्वास कि हर नस्ल के लोगों में कुछ खास खूबियां होती हैं, जो उसे दूसरी नस्लों से कमतर या बेहतर बनाती हैं।"http://navbharattimes.indiatimes.com/world/europe/-racism-named-biggest-of-the-modern-seven-deadly-sins/articleshow/16438481.cms 'नस्लवाद है आज का सबसे बड़ा पाप' नवभारत टाइम्स 17 सितम्बर 2012 29 जून 2014 नस्लवाद लोगों के बीच जैविक अंतर की सामाजिक धारणाओं में आधारित भेदभाव और पूर्वाग्रह दोनों होते हैं। यह विभिन्न नस्लों के सदस्यों को अलग ढंग से व्यवहार किया जाना चाहिए कि सोच और धारण भी हैं। संयुक्त राष्ट्र के सभागम के मुताबिक, नस्लीय भेदभाव के आधार पर श्रेष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टि से गलत, नैतिक रूप से निन्दनीय, सामाजिक अन्याय और खतरनाक है और नस्लीय भेदभाव के लिए कोई औचित्य नहीं है, सिद्धांत में या व्यवहार में, कहीं भी।http://www.ohchr.org/EN/ProfessionalInterest/Pages/CERD.aspx International Convention on the Elimination of All Forms of Racial Discrimination नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय 29 जून 2014 अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20151117035747/http://www.ohchr.org/EN/ProfessionalInterest/Pages/CERD.aspx 17 नवंबर 2015 live
इतिहास में, नस्लवाद अटलांटिक दास व्यापार के पीछे एक प्रमुख प्रेरक शक्ति रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका में उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल का नस्लीय अलगाव और दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति भी इसी विचारधारा पर आधारित थीं। यह सिद्धांत भेदभाव, नस्लीय हिंसा तथा नरसंहार के राजनीतिक और वैचारिक आधार का एक प्रमुख हिस्सा रहा है, जिसका उदाहरण यहूदी नरसंहार है। औपनिवेशिक संदर्भों में भी नस्लवाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जैसे यूरोपीय शक्तियों द्वारा अमेरिका पर विजय, अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के औपनिवेशीकरण, तथा दक्षिण अमेरिका और कांगो में रबर बूम के दौरान स्थानीय लोगों से दासों जैसी परिस्थितियों में श्रम करवाने की घटनाएँ। समकालीन उदाहरणों में मणिपुर में मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच हुई हिंसा को भी कुछ विश्लेषकों द्वारा जातीय और नस्लीय पूर्वाग्रहों के संदर्भ में चर्चा का विषय माना गया है।
कुछ लोग नस्लवाद के अस्तित्व या उसके प्रभावों पर प्रश्न उठाते हैं। सामाजिक विज्ञान के अनेक विद्वानों के अनुसार, नस्लवाद का अनुभव और उसका प्रभाव सभी व्यक्तियों के लिए समान नहीं होता, क्योंकि यह किसी व्यक्ति की नस्ल, जातीय पहचान, सामाजिक स्थिति तथा ऐतिहासिक और संस्थागत परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस अंतर को समझाने के लिए कुछ लेखकों ने यह उपमा दी है कि जिस प्रकार हमेशा जूते पहनने वाला व्यक्ति नंगे पैर चलने वाले व्यक्ति के पैर में कांटा चुभने से होने वाले दर्द का पूरा अनुभव नहीं कर सकता, उसी प्रकार जो व्यक्ति स्वयं नस्लीय भेदभाव का सामना नहीं करता, उसके लिए उसके प्रभावों को पूरी तरह समझ पाना कठिन हो सकता है। इसी प्रकार यह भी कहा गया है कि संवेदनशीलता व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न स्तरों की होती है; उदाहरणस्वरूप, जिस प्रकार किसी छोटे बच्चे के पैर के तलवे पर हल्का दबाव या रगड़ भी सूजन या निशान उत्पन्न कर सकती है, जबकि वही प्रभाव किसी अन्य व्यक्ति में न हो, उसी प्रकार नस्लवाद के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी व्यक्तियों और समुदायों में अलग-अलग रूपों और तीव्रता के साथ प्रकट हो सकते हैं।
सन्दर्भ
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