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प्रेम (हिंदू धर्म)
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प्रेम एक संस्कृत शब्द है जिसकी जड़ क्रिया प्री (प्रीति) है, जिसका अर्थ होता है "प्रसन्न करना", "पसंद करना", "प्रेम करना" और "आनंदित होना"। इससे बना शब्द प्रेमन् और फिर प्रेमा का प्रयोग संस्कृत में निर्मल, शुद्ध प्रेम, कोमलता, करुणा, और आनंद को प्रकट करने के लिए होता है। यह शब्द कभी-कभी हवा या पवन के अर्थ में भी आता है, और देवराज इंद्र को संदर्भित करने में भी प्रयुक्त हुआ है। प्रेमा शब्द स्त्रीलिंग रूप में निष्काम, ईश्वरीय प्रेम का प्रतीक बन जाता है – ऐसा प्रेम जो मनुष्य को न केवल दूसरे मनुष्य से जोड़ता है, बल्कि ईश्वर से भी एकत्व की ओर ले जाता है।
हिंदू धर्म में, प्रेम शब्द की तुलना अक्सर काम, भाव, रति, करुणा, स्नेह आदि से की जाती है, लेकिन प्रत्येक शब्द का विशिष्ट और भिन्न संदर्भ होता है। उदाहरण के लिए, काम कामदेव द्वारा दर्शाया गया इंद्रियजन्य या यौन प्रेम है, जो जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना जाता है। वहीं, प्रेम उच्चतर और आध्यात्मिक प्रेम को सूचित करता है – एक ऐसा भाव जिसमें स्वार्थ नहीं, समर्पण और सेवा होती है। करुणा वह प्रेरक शक्ति है जो दूसरों के दुःख को देखकर सहायता के लिए प्रेरित करती है, जबकि भक्ति वह प्रेममय समर्पण है जो व्यक्ति को ईश्वर से जोड़ता है।
वैष्णव भक्ति परंपरा, विशेषकर गौड़ीय वैष्णववाद, में कृष्ण-प्रेम को आध्यात्मिक उपलब्धि का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है।Satyam Srisoham इसमें संयोग (मिलन) और विप्रलंभ (वियोग) दो अवस्थाएँ हैं, जो भगवान से प्रेम संबंध की गहराई को दर्शाती हैं। राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम इस प्रेम का सर्वोत्तम उदाहरण माना गया है – एक ऐसा प्रेम जो निर्विशेष, निरपेक्ष और भौतिकता से परे है। राधा और कृष्ण के पारस्परिक प्रेम ने गीत गोविंद, हरिभक्ति शुद्धोदय जैसे कई ग्रंथों और रचनाओं में स्थान पाया है। इस परंपरा में, यह विश्वास है कि जैसे-जैसे हृदय में कृष्ण के प्रति प्रेम बढ़ता है, व्यक्ति भौतिकता से मुक्त होता जाता है और यही मोक्ष या जीवन की पूर्णता है। वास्तव में, मोक्ष को यहां प्रेम का सह-उत्पाद माना गया है, न कि अंतिम लक्ष्य; क्योंकि सर्वोच्च लक्ष्य तो केवल ईश्वर के प्रेम में पूर्णतः लीन हो जाना है।
प्रेम के प्रकार (संस्कृत परंपरा में):
संस्कृत साहित्य, विशेषकर भक्ति और दर्शन ग्रंथों में, प्रेम के कई रूपों का वर्णन मिलता है। इन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
भौतिक (सांसारिक) प्रेम:
काम (कामना) – इंद्रियजन्य प्रेम, आकर्षण और वासना, रति (आनंद) – शारीरिक और मानसिक आनंद की अनुभूति, स्नेह – पारिवारिक और मित्रतापूर्ण स्नेह, ममता – स्वामित्व का भाव युक्त प्रेम और लालसा – प्राप्ति की तीव्र इच्छा से उत्पन्न प्रेम।
आध्यात्मिक (ईश्वरीय) प्रेम:
भक्ति – भगवान के प्रति प्रेममय समर्पण, प्रेम – विशुद्ध, निरपेक्ष, परोपकारी प्रेम, करुणा – संवेदना और सहानुभूति से उपजा प्रेम, मैत्री – समत्व और मित्रता का आध्यात्मिक रूप और अनुकम्पा – दूसरों की पीड़ा को देखकर उत्पन्न प्रेम की करुणा।
कृष्ण-राधा प्रेम की विशेषता (गौड़ीय वैष्णव परंपरा में):
राधा और कृष्ण का प्रेम सिर्फ एक पारंपरिक "प्रेम कथा" नहीं है, बल्कि यह अद्वैत-अभेद (एकता में द्वैत) की प्रतीकात्मक व्याख्या है।
राधा को कृष्ण की आंतरिक शक्ति (ह्लादिनी शक्ति) माना गया है।कृष्ण-राधा प्रेम की विशेषता उनका प्रेम निष्काम, पूर्ण समर्पण और आत्म-विलय का आदर्श है।Bhakti_ke_Aayaam विप्रलंभ (वियोग) की अवस्था में प्रेम और भी प्रगाढ़ होता है – इसमें प्रिय के बिना जीने की वेदना आत्मा को शुद्ध करती है। संयोग (मिलन) की अवस्था परमानंदमयी होती है – जिसमें आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। जयदेव का गीत गोविंद और चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाएं राधा-कृष्ण प्रेम की ऊँचाई को दिखाती हैं।
यह प्रेम इतना दिव्य और उच्च कोटि का है कि मोक्ष भी इसके सामने गौण माना जाता है। कृष्ण-प्रेम में लीन भक्त केवल भगवान के साथ प्रेम-संबंध की अनुभूति चाहता है, न कि आत्म-मुक्ति।
नारद भक्ति सूत्र में प्रेम के 11 रूप:
नारद भक्ति सूत्र ( IAST : नारद भक्ति सूत्र ) हिंदू धर्म की परंपराओं में पूजनीय एक प्रसिद्ध सूत्र है , जिसे कथित तौर पर प्रसिद्ध ऋषि नारद ने बोला था । यह पाठ भक्ति ( भक्ति ) या भक्ति योग की प्रक्रिया का विवरण देता है और इस प्रकार हिंदू धर्म के भीतर कई भक्ति आंदोलनों के लिए इसका विशेष महत्व है। इसे वैष्णव और वेदांत परंपराओं के बीच विशेष ध्यान मिला है । रहस्यवादी-संत श्री रामकृष्ण ने इस कार्य की प्रशंसा करते हुए कहा, "ईश्वर से मिलन का सबसे अच्छा मार्ग नारद द्वारा सिखाए गए दिव्य प्रेम के मार्ग का अनुसरण करना है।"Swami Nikhilananda, The Gospel of Sri Ramakrishna
संस्कृत शास्त्र अक्सर भिन्न संस्करणों में दिखाई देते हैं जो संगठन और छंद संख्या में अंतर दिखा सकते हैं। उदाहरण के लिए, स्वामी प्रभुवानंद द्वारा किए गए अनुवाद में चौरासी छंद नौ अध्यायों में व्यवस्थित हैं,Swami Prabhavananda. Narada's Way of Divine Love (Narada Bhakti Sutras). (Sri Ramakrishna Math: Madras). Provides Sanskrit text translated into English with a commentary by Swami Prabhavananda. 81-7120-506-2. जबकि एसी भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद और उनके शिष्य सत्स्वरूप दास द्वारा भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट अनुवाद में चौरासी छंद पाँच अध्यायों में व्यवस्थित हैं।Narada Bhakti Sutra Online (complete) https://web.archive.org/web/20060628012651/http://naradabhaktisutra.com/en1 June 28, 2006
नारद भक्ति सूत्र में प्रेम (भक्ति) को 11 रूपों में विभाजित किया गया है, जिन्हें "एकादश प्रकार की भक्ति" कहते हैं। ये हैं:
1 श्रवणम् – भगवान की लीलाओं, गुणों को सुनना।
2 कीर्तनम् – उनका गुणगान करना।
3 स्मरणम् – उनका निरंतर स्मरण करना।
4 पादसेवनम् – सेवा भाव से कार्य करना।
5 अर्चनम् – पूजा करना।
6 वन्दनम् – प्रणाम करना।
7 दास्यम् – भगवान का दास बनकर सेवा करना।
8 साख्यम् – भगवान को मित्र के रूप में मानना।
9 आत्मनिवेदनम् – स्वयं को पूर्णतः अर्पित कर देना।
10 रागात्मक प्रेम – जिसमें प्रेम भाव इतना प्रगाढ़ हो कि विवेक का त्याग हो जाए।
11 परमानंद स्थिति – जहां प्रेम में पूर्ण विलीनता होती है और ईश्वर तथा आत्मा में कोई भेद नहीं रहता।
सन्दर्भ