Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

कलि अहर्गण

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

कलि अहर्गण (कल्याहर्गण अथवा कलिदिन) एक सावन दिवस से सम्बद्ध पूर्णांक है। यह पूर्णांक कलि युगादि नामक विशेष दिन से आरम्भ होकर किसी निर्दिष्ट दिन तक के क्रमिक दिनों के समूह में सावन दिवसों की संख्या को निरूपित करता है। कलि अहर्गण भारतीय खगोलशास्त्र के आधारभूत प्राचलों में से एक है और सभी प्रकार की खगोलीय गणनाओं में इसका व्यापक रूप से प्रयोग होता है।A. K. Bag 2003 Luni-solar calendar, Kali ahargana and Julian days http://repository.ias.ac.in/74673/1/22-PUB.pdf Indian Journal of History of Science 38 1 17–37 22 March 2017 कलि युगादि का आरम्भ कलि युगादि के आरम्भ की तिथि की गणना किस प्रकार की गई, इसका सारांश इस प्रकार है। सम्पूर्ण गणना का आधार आर्यभट द्वारा आर्यभटीय (अध्याय ३ कालक्रिया का श्लोक १०) में दिया गया निम्नलिखित गूढ़ कथन हैhttps://archive.org/details/Aryabhatiya1976/Aryabhatiya%20v1%201976/page/n167/mode/2up?view=theater Aryabhatiya of Aryabhata (Critically edited with introduction, English translation, nites and comments) Kripa Shankar Shukla and K. V. Sarma 1976 Indian national Science Academy New Delhi 95 18 December 2023S. K. Chatterjee 1997 A note on Kali era Indian Journal of History of Science 32 1 69–86 दाएँ|अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|आर्यभटीय (श्लोक १०, अध्याय ३ कालक्रिया) में आर्यभट की तिथि निर्दिष्ट करता श्लोक। "जब साठ गुणा साठ वर्ष और (वर्तमान युग के) तीन चतुर्थांश युग व्यतीत हो चुके थे, तब मेरे जन्म से तेईस वर्ष व्यतीत हो चुके थे।" टीकाकारों के अनुसार, यह श्लोक इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि कलि युग के आरम्भ से साठ गुणा साठ वर्ष, अर्थात् ३६०० वर्ष, व्यतीत हो चुके थे। अतः इस कथन को आधार मानकर, कलि युगादि के आरम्भ की तिथि निर्धारित करने के लिए यह निर्धारित करना आवश्यक है कि आर्यभट ने यह कथन ठीक किस दिन किया था। इतिहासकारों में उस वर्ष के विषय में जिसमें यह कथन किया गया था, पर्याप्त सहमति है। इतिहासकारों का मत है कि आर्यभट ने यह कथन ४९९ सामान्य युग में किया था। किन्तु उस वर्ष का ठीक दिन जिस दिन यह कथन किया गया था, अभी भी अनुमान का विषय है क्योंकि इसका उल्लेख आर्यभटीय में अथवा अन्यत्र कहीं नहीं किया गया है। तथापि, एक मत के अनुसार, यह कथन २१ मार्च ४९९ सामान्य युग को किया गया था, सम्भवतः क्योंकि उस दिन को उस वर्ष का वसन्त विषुव दिवस अथवा उसके पश्चात् का दिन गणना किया गया था।S. K. Chatterjee 1997 A note on Kali era Indian Journal of History of Science 32 1 69–86 आर्यभट के अनुसार, एक वर्ष की अवधि ३६५ दिन ६ घण्टे १२ मिनट ३० सेकण्ड है, अर्थात् लगभग ३६५.२५८६८ दिन। अतः आर्यभट के मतानुसार, ३६०० वर्ष की अवधि में दिनों की संख्या १३,१४,९३१.२५ दिन है। चूँकि एक जूलियन वर्ष ३६५.२५ दिन का होता है, १३,१४,९३१.२५ दिन की अवधि में जूलियनीय वर्षों की संख्या ३६०० वर्ष ३१.२५ दिन होती है। यह मानते हुए कि यह कथन २१ मार्च को सूर्योदय के समय किया गया था, उससे ३१ दिन पूर्व का सूर्योदय १८ फ़रवरी को पड़ेगा। शेष ०.२५ दिन एक दिन का चतुर्थांश है, अतः २१ मार्च के सूर्योदय से ठीक ३६०० आर्यभटीय वर्ष पूर्व १७–१८ फ़रवरी की अर्धरात्रि में पड़ेंगे। अब, वर्ष के सम्बन्ध में, यह ध्यातव्य है कि इतिहासकारों ने कभी भी शून्य वर्ष को सम्मिलित नहीं किया है, अतः ४९९ सामान्य युग से ३६०० वर्ष पूर्व ३१०२ सामान्य युग पूर्व होगा। इस प्रकार, कलि युगादि का आरम्भ १७–१८ फ़रवरी ३१०२ सामान्य युग पूर्व की अर्धरात्रि के रूप में निर्धारित किया जा सकता है। कलि युगादि के ठीक उस क्षण के सम्बन्ध में दो भिन्न परिपाटियाँ हैं। एक परिपाटी, जिसे आर्धरात्रिक परिपाटी कहा जाता है, के अनुसार युगादि १७–१८ फ़रवरी ३१०२ सामान्य युग पूर्व की अर्धरात्रि है। दूसरी परिपाटी, जिसे औदायिक परिपाटी कहा जाता है, के अनुसार युगादि १८ फ़रवरी ३१०२ सामान्य युग पूर्व को सूर्योदय का क्षण है। सत्यापन अनेक भारतीय पंचांगकार नियमित रूप से सम्बन्धित वर्ष के प्रत्येक दिन की कलि अहर्गण संख्याओं को पंचांगों में सम्मिलित करते हैं। इन पंचांगों से हम देख सकते हैं कि १ जनवरी २०२४ की कलि अहर्गण १८,७१,८४५ है। यह सत्यापित किया जा सकता है कि पूर्वव्यापी जूलियनीय पंचांग में १८ फ़रवरी ३१०२ सामान्य युग पूर्व से ग्रेगोरीय पंचांग में ३१ दिसम्बर २०२३ सामान्य युग तक की अवधि में (दोनों दिन सम्मिलित) दिनों की संख्या ठीक १८,७१,८४५ है। गणना करते समय निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए शून्य वर्ष नहीं होता। वर्ष n सामान्य युग अधिवर्ष होता है यदि n, ४ से विभाज्य हो। वर्ष n सामान्य युग पूर्व अधिवर्ष होता है यदि (n-1), चार से विभाज्य हो। इस प्रकार वर्ष १ सामान्य युग पूर्व अधिवर्ष है। १४ सितम्बर १७५२ सामान्य युग के पश्चात्, अधिवर्ष नियम “प्रत्येक वर्ष जो ठीक चार से विभाज्य है, अधिवर्ष है, उन वर्षों को छोड़कर जो ठीक १०० से विभाज्य हैं, परन्तु ये शताब्दी वर्ष अधिवर्ष हैं यदि वे ठीक ४०० से विभाज्य हों। उदाहरणार्थ, वर्ष १७००, १८००, और १९०० अधिवर्ष नहीं हैं, किन्तु वर्ष २००० अधिवर्ष है।” गणनाओं का सारांश निम्नलिखित आरेख में दर्शाया गया है। यह आरेख १८ फ़रवरी ३१०२ सामान्य युग पूर्व से ३१ दिसम्बर २०२३ सामान्य युग तक की अवधि के कुछ उप-अवधियों में दिनों की संख्याएँ दर्शाता है। केंद्र|अंगूठाकार|600x600पिक्सेल|१८ फ़रवरी ३१०२ सामान्य युग पूर्व से ३१ दिसम्बर २०२३ सामान्य युग तक की अवधि में (दोनों दिन सम्मिलित) दिनों की संख्या की गणना दर्शाता आरेख, जो १ जनवरी २०२४ की कलि अहर्गण है। अहर्गण भारतीय खगोलीय परम्पराओं में, कलि अहर्गण (जिसे कलिदिन भी कहा जाता है) पद एक सावन दिवस से सम्बद्ध पूर्णांक है। यह पूर्णांक कलि युगादि नामक विशेष दिन से आरम्भ होकर किसी निर्दिष्ट दिन तक के क्रमिक दिनों के समूह में सावन दिवसों की संख्या को निरूपित करता है।A. K. Bag 2003 Luni-solar calendar, Kali ahargana and Julian days http://repository.ias.ac.in/74673/1/22-PUB.pdf Indian Journal of History of Science 38 1 17–37 22 March 2017 किसी दिन की कलि अहर्गण, कलि युगादि से लेकर विचाराधीन दिन के सूर्योदय अथवा पूर्ववर्ती अर्धरात्रि तक की अवधि में दिनों की संख्या है, यह इस पर निर्भर करता है कि कलि युगादि के सम्बन्ध में कौन सी परिपाटी अपनाई जाती है, औदायिक अथवा आर्धरात्रिक। कलि अहर्गण की गणना सामान्य युग पंचांग में दी गई तिथि के लिए, उस दिन की कलि अहर्गण की गणना करना सरल और सीधा है। सामान्य युग पंचांग शताब्दियों में हुए विकास का परिणाम है, जिसमें ग्रेगोरीय सुधार और विभिन्न देशों में सुधार को अपनाने की भिन्न-भिन्न तिथियाँ जैसी अन्तर्वर्ती घटनाएँ सम्मिलित हैं। किन्तु, यदि तिथि किसी अन्य पंचांग में दी गई हो, जैसे पूर्व-आधुनिक शक पंचांग, तो सम्बन्धित कलि अहर्गण की गणना वास्तव में अत्यन्त जटिल होती है। शास्त्रीय भारतीय खगोलशास्त्र के ग्रन्थ कलि अहर्गण की गणना की प्रक्रिया को विस्तार से समझाने में बहुत श्रम करते हैं। गणना प्रक्रिया भास्कर प्रथम ने कलि अहर्गण की गणना के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया दी है। ब्रह्मगुप्त, लल्ल, श्रीपति और भास्कर द्वितीय सभी ने कलि अहर्गण की गणना के लिए यही प्रक्रिया दी है।A. K. Bag 2003 Luni-solar calendar, Kali ahargana and Julian days http://repository.ias.ac.in/74673/1/22-PUB.pdf Indian Journal of History of Science 38 1 17–37 22 March 2017A. K. Bag 2001 Ahargana and weekdays as per modern suryasidhanta http://insa.nic.in/writereaddata/UpLoadedFiles/IJHS/Vol36_1and2_3_AKBag.pdf India Journal of History of Science 36 1 - 2 55–63 22 March 2017 ४३,२०,००० वर्षों के एक युग के लिए दत्तांश (स्थिरांक) MS = एक युग में सौर मासों की संख्या ४३,२०,००० × १२ ५,१८,४०,००० DS = एक युग में सौर दिवसों की संख्या ५,१८,४०,००० × ३० १,५५,५२,००,००० ML = एक युग में चान्द्र मासों की संख्या = (चान्द्र परिक्रमाओं की संख्या) - (सौर परिक्रमाओं की संख्या) = ५,७७,५३,३३६ - ४३,२०,००० (आर्यभटीय से चान्द्र परिक्रमाओं का दत्तांश) = ५,३४,३३,३३६ DL = एक युग में चान्द्र दिवसों की संख्या = १,६०,३०,००,०८० MI = एक युग में अधिमासों की संख्या = (चान्द्र मासों की संख्या) - (सौर मासों की संख्या) = ५,३४,३३,३३६ - ५,१८,४०,००० = १५,९३,३३६ DO = एक युग में क्षय तिथियों की संख्या = (चान्द्र दिवसों की संख्या) - (सावन दिवसों की संख्या) = १,६०,३०,००,०८० - १,५७,७९,१७,५०० (आर्यभटीय से सावन दिवसों का दत्तांश) = २,५०,८२,५८० सम्बन्धित दिन के लिए दत्तांश m = प्रथम चैत्र से व्यतीत मासों की संख्या d = अन्तिम अमावास्या के अन्त से व्यतीत दिनों की संख्या y = शक में व्यतीत सौर वर्ष गणनाएँ mS = कलि युगादि से सौर मासों की संख्या = १२ (y + ३१७९) + m dS = कलि युगादि से सौर दिवसों की संख्या = ३०mS + d mI = कलि युगादि से अधिमासों की संख्या = (mS × MI) / MS dL = कलि युगादि से चान्द्र दिवसों की संख्या = ३०mI + dS dO = कलि युगादि से क्षय चान्द्र दिवसों की संख्या = (dL × DO) / DL A = कलि अहर्गण = dL - dO सत्यापन एवं संशोधन उपर्युक्त प्रक्रिया को लागू करने से प्राप्त अहर्गण संख्या कभी-कभी एक दिन से त्रुटिपूर्ण हो सकती है। गणना किए गए मान की शुद्धता अथवा अशुद्धता की परीक्षा अहर्गण संख्या द्वारा दी गई तिथि के दिन और उस तिथि के दिन, जिसकी अहर्गण संख्या गणना की जा रही थी, को ज्ञात करके की जा सकती है। मान लीजिए कि अहर्गण संख्या को ७ से विभाजित करने पर शेषफल r है। यदि r = ० है, तो अहर्गण संख्या द्वारा दिया गया दिन शुक्रवार होगा; यदि r = १ है, तो दिन शनिवार होगा; और इसी प्रकार आगे। अहर्गण संख्या में न्यूनता अथवा अधिकता को तदनुसार संख्या को एक से बढ़ाकर अथवा घटाकर संशोधित किया जा सकता है। उदाहरण इस प्रक्रिया का उदाहरण मंगलवार १० जुलाई २००१ की कलि अहर्गण की गणना द्वारा दिया गया है। इस तिथि से सम्बन्धित दत्तांश इस प्रकार है mS = २, d = १८, y = १९२३। गणनाएँ इस प्रकार आगे बढ़ती हैं। mS = १२ (y + ३१७९) + m = १२(१९२३ + ३१७९) + २ = ६१,२२६ mI = (mS × MI) / MS = (६१,२२६ × १५,९३,३३६) / ५,१८,४०,००० = १,८८२ dL = ३० (mS + mI) + d = ३० (६१,२२६ + १,८८२) = १८,९३,२५८ dO = (dL × DO) / DL = (१८,९३,२५८ × २,५०,८२,५८०) / १,६०,३०,००,०८० = २९,२६४ A = dL - dO = १८,६३,६३४ मान की शुद्धता की जाँच के लिए ध्यातव्य है कि १८,६३,६३४ को ७ से विभाजित करने पर शेषफल ३ है, जो सोमवार के संगत है, और तिथि का दिन मंगलवार है। अतः अहर्गण संख्या का गणना किया गया मान एक दिन से न्यून है। मान को एक से बढ़ाने पर मंगलवार १० जुलाई २००१ की अहर्गण संख्या १८,६३,६३५ प्राप्त होती है। एक व्यावहारिक विधि यदि किसी निकटवर्ती तिथि की कलि अहर्गण ज्ञात हो, तो किसी भी अभीष्ट तिथि की कलि अहर्गण निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करके गणना की जा सकती है : मान लीजिए कि किसी तिथि D की कलि अहर्गण KD है और X वह तिथि है जिसकी कलि अहर्गण KX गणना की जानी है। तब KX = (X - D) + KD, जहाँ X - D, X और D के बीच दिनों की संख्या है उचित चिह्न के साथ (धनात्मक यदि D, X से पूर्व है और ऋणात्मक यदि X, D से पूर्व है) उदाहरणार्थ, १० जुलाई २००१ की कलि अहर्गण का प्रयोग अब १५ अगस्त १९४७ की कलि अहर्गण की गणना के लिए किया जा सकता है। K(१५ अगस्त १९४७) = (१५ अगस्त १९४७) - (१० जुलाई २००१) + K(१० जुलाई २००१) = - १९,६८८ + १८,६३,६३५ = १८,४३,९४७ दी गई कलि अहर्गण के संगत सामान्य युग तिथि का निर्धारण दी गई कलि अहर्गण के संगत सामान्य युग तिथि, अर्थात् सामान्यतः स्वीकृत जूलियनीय/ग्रेगोरीय पंचांग के अनुसार तिथि, का निर्धारण करने की विपरीत समस्या भी महत्वपूर्ण है। पुरातत्त्वविदों को कई अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनमें तिथियाँ कलि अहर्गण के रूप में अंकित हैं, और कई संस्कृत ग्रन्थ हैं जिनमें कार्य की समाप्ति का दिन सूचित करने वाली कलि अहर्गण है। इन दत्तांशों को आधुनिक पंचांग की तिथियों में विकूटित करना स्मारकों अथवा ग्रन्थों की तिथियों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है। इस समस्या को हल करने के लिए सारणियाँ बनाई गई हैं जो जटिल गणनाओं को करने की कठिनाई को सरल बनाने में सहायता करती हैं।A. K. Bag 2001 Ahargana and weekdays as per modern suryasidhanta http://insa.nic.in/writereaddata/UpLoadedFiles/IJHS/Vol36_1and2_3_AKBag.pdf India Journal of History of Science 36 1 - 2 55–63 22 March 2017Ancient Indian Astronomy: Planetary Positions and Eclipses S. Balachandra Rao 2000 B. R. Publishing Corporation Delhi 26–41 (Chapter 5: Ahargaṅa) साहित्यिक एवं अन्य कृतियों में कलि अहर्गण उत्तर भारत और दक्कन के ऐतिहासिक अभिलेख, साहित्यिक और अभिलेखीय, कलि अहर्गण के विषय में मौन हैं। परन्तु केरल की किंवदन्तियों में अनेक तिथियाँ कलि अहर्गण (कलिदिन) के रूप में कटपयादि संकेतन में व्यक्त की गई हैं। इनमें से कुछ नीचे दी गई हैं।A. K. Bag 2001 Ahargana and weekdays as per modern suryasidhanta http://insa.nic.in/writereaddata/UpLoadedFiles/IJHS/Vol36_1and2_3_AKBag.pdf India Journal of History of Science 36 1 - 2 55–63 22 March 2017K. Chandra Hari 2009 Indian astronomical epoch: 310 CE 18 February implications of Aryabhata's works to Indian chronology Annals of the Bhandarkar Oriental Research Institute 90 59–90 केरल के सेरन केयप्पेरुमाल् का १२ वर्षीय शासन कलिदिन "भूमौभूपोयम्प्राप्य", अर्थात् १२,११,४५४, से आरम्भ हुआ माना जाता है, जो ३० नवम्बर २१५ सामान्य युग के संगत है। यह तिथि उस ३१ मार्च ४९९ की तिथि से पूर्व है जिसका आर्यभट ने आर्यभटीय में उल्लेख किया माना जाता है और जिसके आधार पर कलि युगादि का क्षण गणना किया गया है। सम्भवतः कलि अहर्गण केरल में आर्यभट के समय से पूर्व भी प्रचलन में रही होगी। केरल के वररुचि के पुत्र मेझत्तोल् अग्निहोत्री, जो गीर्णश्रेयादि चन्द्रवाक्यों के किंवदन्तीय रचयिता हैं, कहा जाता है कि उन्होंने पहली बार कलिदिन "यज्ञस्थानसम्रक्ष्यं", अर्थात् १२,७०,७०१, पर यज्ञाग्नि प्रज्वलित की थी, जो १३ फ़रवरी ३७८ सामान्य युग के संगत है। इसके आधार पर वररुचि को तृतीय शताब्दी सामान्य युग में रखा गया है। केरल के त्रिशूर जिले के पेरुवनम् महादेव मन्दिर के अभिलेखों में मन्दिर के महोत्सव के आरम्भ की तिथि "आयातुशिवलोकं", अर्थात् १३,४५,६१०, दी गई है, जो १८ मार्च ५८३ सामान्य युग के संगत है। मलयालम संवत् (कोल्लवर्षम्) की आरम्भ तिथि कलि अहर्गण "आचार्यवागभेद्य", अर्थात् १४,३४,१६०, द्वारा सूचित की गई है, जो २५ अगस्त ८२५ सामान्य युग के संगत है। नीलकण्ठ सोमयाजी ने अपने जन्म की तिथि कलि अहर्गण "त्यजाम्यज्ञातं तर्कैः", अर्थात् १६,६०,१८१, के रूप में सूचित की है, जो १७ जून १४४४ के संगत है। केरल के कवि और व्याकरणकार मेल्पथुर नारायण भट्टथिरि ने अपनी कृति नारायणीयं के समापन की तिथि कलि अहर्गण "आयुरारोग्यसौख्यं", अर्थात् १७,१२,२११, के रूप में अंकित की है, जो ९ दिसम्बर १५८६ के संगत है। सम्बन्धित विषय कलियुग सन्दर्भ अग्रिम पठन For a full and thorough discussion of kali ahargaṅa: Ancient Indian Astronomy: Planetary Positions and Eclipses S. Balachandra Rao 2000 B. R. Publishing Corporation Delhi 26–41 (Chapter 5: Ahargaṅa) K. Chandra Hari 2004 Julian Days in Astronomy https://insa.nic.in/writereaddata/UpLoadedFiles/IJHS/Vol39_3_5_HistoricalNotes.pdf Indian Journal of History of Science 39 3 359–364 22 March 2017 Report of the Calendar Reforms Committee: https://ia801000.us.archive.org/30/items/HistoryOfCalendarPanchangaCommittee/History-of-Calendar-Panchanga-Committee.pdf History of the Calendar in Different Countries through the Ages (Part C of the Report of the Calendar Reforms Committee, Govt. of India) M. N. Saha and N. C. Lahiri 1992 Council of Scientific and Industrial Research New Delhi 161–164 22 March 2017 For a "disturbing discontinuity" in the ahargaṅa computations: Olaf Schmidt 1952 On the Computation of the Ahargana Centaurus 2 140–180 For a discussion on the use of different epochs in Indian astronomy: K. Chandra Hari 2000 Search for an ancient epoch in Indian astronomy http://sandhi.hss.iitb.ac.in/Sandhi/Mathematics%20and%20Astronomy%20articles/Hari%20KC/Hari%20-%20Search%20for%20and%20Ancient%20Epoch%20of%20Indian%20Astronomy%20(2000).pdf Indian Journal of History of Science 35 2 109–115 24 March 2017January 2026 S. K. Uma and S. Balachandra Rao 2018 Ahargana in Makarandasārinī and Other Indian Astronomical Texts https://www.researchgate.net/profile/Sk-Uma/publication/323909290_Ahargana_in_Makarandasarini_and_Other_Indian_Astronomical_Texts/links/5bd180b792851cabf265f040/Ahargana-in-Makarandasarini-and-Other-Indian-Astronomical-Texts.pdf Indian Journal of History of Science 53 1 16–32 19 December 2023 श्रेणी:हिन्दू कैलेंडर श्रेणी:भारतीय खगोलिकी श्रेणी:पंचांग