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स्वामी निगमानन्द परमहंस
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स्वामी निगमानन्द Thakur Nigamananda(bw).jpg (परमहंस श्रीमद् स्वामी निगमानन्द सरस्वती) 1880 8 18 y नदिया जिला, पश्चिम बंगाल, भारत नलिनीकांत भट्टाचार्य 1935 11 29 1863 y कलकत्ता १: बामाक्षेपा
२: सच्चिदानन्द
३: सुमेरु दासजी
४: गौरी देवी वेदान्त दर्शन - तन्त्र, योग, ज्ञान योग और प्रेम(भक्ति) परमहंस, सद्गुरु बत्छ ! इस्ट चिंता से गुरु चिंता का फल अधिक है; कियूँकी श्रीगुरु प्रतक्ष्य बिद्यमान है ; इसीलिए तुम गुरु के स्वरुप चिंता करने से उन की अगाध ज्ञानरासी तुम्हे प्राप्त होगी
स्वामी निगमानन्द परमहंस (१८८० - १९३५) भारत के एक महान् सन्यासी और सदगुरु थे।Moni Bagchee Sadguru Nigamananda: a spiritual biography http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (स्वामी निगमानन्द का जन्म १८८० में हुआ था) 1987 Assam Bangiya Saraswat Math 43 https://web.archive.org/web/20140626180743/http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 जून 2014 live उन के शिष्य लोग उन्हें आदरपूर्वक - श्री श्री ठाकुर बुलाते हैं। ऐसा माना जाता है कि स्वामी निगमानन्द ने तंत्र, ज्ञान, योग और प्रेम (भक्ति) जैसे चतुर्विध साधना में सिद्धि प्राप्त की थी, साथ साथ में कठिन समाधि जैसे निर्विकल्प समाधि का भी अनुभूति लाभ किया था। उन के इन साधना अनुभूति से वे पाँच प्रसिद्ध ग्रन्थ यथा ब्रह्मचर्य साधन, योगिगुरु, ज्ञानीगुरु, तांत्रिकगुरु और प्रेमिकगुरु बंगला भाषा में प्रणयन किये थे।Benoy Gopal Ray Religious movements in modern Bengal http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 स्वामी निगमानन्द (तंत्र, ज्ञान, योग और प्रेम(भक्ति)- चतुर्विध साधना में सिद्धि प्राप्त की थी) 1965 Visva-Bharati 102 https://web.archive.org/web/20130623063511/http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ 23 जून 2013 live उन्होंने असाम बंगीय सारस्वत मठ जोरहट जिलाM. C. Behera Pilgrim centre Parashuram Kund: articulation of Indian society, culture, and economic dimension http://books.google.com/books?id=QU0vAAAAYAAJ 26 नवम्बर 2011 (असाम बंगीय सारस्वत मठ) 1 जनवरी 1998 Commonwealth Publishers 978-81-7169-503-4 18 https://web.archive.org/web/20130623070510/http://books.google.com/books?id=QU0vAAAAYAAJ 23 जून 2013 liveSher Singh S. N. Sadhu Indian books in print http://books.google.com/books?id=-EMbAQAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (स्वामी निगमानन्द परमहंस की असाम बंगीय सारस्वत मठ जोरहट जिला) 1991 Indian Bureau of Bibliographies. 978-81-85004-46-4 572 https://web.archive.org/web/20130623061404/http://books.google.com/books?id=-EMbAQAAMAAJ 23 जून 2013 live में और नीलाचल सारस्वत संघ पूरी जिला में स्थापित करे जो आज भी अपना कार्य कर रहा है।Sher Singh S. N. Sadhu Indian Bibliographies Bureau Indian books in print http://books.google.com/books?id=zDcbAQAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (नीलाचल सारस्वत संघ) 2003 Indian Bureau of Bibliographies 866Indian Anthropological Society Journal of the Indian Anthropological Society http://books.google.com/books?id=RE6BAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (स्वामी निगमानन्द परमहंस की नीलाचल सारस्वत संघ पूरी जिला) 2001 The Society 156 https://web.archive.org/web/20130623060810/http://books.google.com/books?id=RE6BAAAAMAAJ 23 जून 2013 live उन्होंने सारे साधना मात्र ३ साल (१९०२ - १९०५) में समाप्त कर लिया और परमहंस श्रीमद् स्वामी निगमानन्द सरस्वती देव के नाम से विख्यात हुए।
जीवन
बाल्य जीवन
right|144px|स्वामी निगमानंद जी के जन्म स्थान नदिया जिल्ले में अबस्तिथ गाँब : कुतबपुर
स्वामी निगमानन्द का जन्म तत्कालीन नदिया जिला (बंगलादेश का मेहरपुर जिला) के कुतबपुर में ब्राह्मण परिवार में हुया था।Moni Bagchee Sadguru Nigamananda: a spiritual biography http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (स्वामी निगमानन्द का जन्म ) 1987 Assam Bangiya Saraswat Math 43 https://web.archive.org/web/20140626180743/http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 जून 2014 live उन के बचपन का नाम नलिनीकांत था।Benoy Gopal Ray Religious movements in modern Bengal http://books.google.com/books?id=btYXAAAAIAAJ 26 नवम्बर 2011 (बचपन का नाम नलिनीकांत था) 1965 Visva-Bharati 100 उन के पिता भुबन मोहन भट्टाचार्य एक सरल अध्यात्मिक व्यक्ति के नाम से सुपरिचित थे। बचपन में ही उन की मां, माणिक्य सुंदरी का स्वर्गवास हुया था।
सांसारिक जीवन
सत्रह बर्ष की आयु में हलिसहर निबसी स्वर्गीय बैद्यनाथ मुखोपाधाय की जेष्ठ कन्या एकादस वर्षीय सुधांशुबाला के साथ नलिनीकांत का बिबाह सम्पर्न हुआ।Moni Bagchee Sadguru Nigamananda: a spiritual biography http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (सुधांशुबाला के साथ नलिनीकांत का बिबाह) 1987 Assam Bangiya Saraswat Math 49 https://web.archive.org/web/20140626180743/http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 जून 2014 live इस बिच नलिनीकांत ने सर्भे स्कूल का पाठक्रम पूरा करके ओबरसिअर की नौकरी की। Moni Bagchee Sadguru Nigamananda: a spiritual biography http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (ओबरसिअर की नौकरी) 1987 Assam Bangiya Saraswat Math 49 https://web.archive.org/web/20140626180743/http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 जून 2014 live उनके बाद उन्होंने दीनाजपुर जमीदारी के अंतर्गत नारायणपुर में नौकरी शुरु की। एक दिन साम को नारायणपुर कचहरी में कार्यरत रहते समय सुधादेवी (उनकी पत्नी) की छायामूर्ति देखकर बह चौंक उठे। कुछ देर बाद बह मूर्ति गायब हो गई।Moni Bagchee Sadguru Nigamananda: a spiritual biography http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (सुधादेवी (उनकी पत्नी) की छायामूर्ति दर्शन) 1987 Assam Bangiya Saraswat Math 50 https://web.archive.org/web/20140626180743/http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 जून 2014 live बाद में गांब पहंच कर पता चला कि सुधादेवी इस संसार में नही रहीं। इस घटना से उनमे परलोग के प्रति बिश्वास पैदा हुआ क़ी मृत्यु के साथ परलोग का घनिष्ठ संबंध है। इस मृत्यु और परलोग तत्त्व को जानने केलिए उन्होंने मद्रास स्थित थिओसफि संप्रदाय में शामिल हो कर बह बिद्या सीखी।Moni Bagchee Sadguru Nigamananda: a spiritual biography http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 नवम्बर 2011 (थिओसफि संप्रदाय में शामिल हुए निगमानन्द) 1987 Assam Bangiya Saraswat Math 63 https://web.archive.org/web/20140626180743/http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 जून 2014 live बह दिबंगत सुधांशुबाला को प्रत्यक्ष रूप में देखना चाहते थे। इसलिए मीडियम के भीतर उनकी आत्मा को लाकर आत्मा के प्रत्यक्ष दर्शन ना होनेसे नलिनीकांत तृप्त नहीं हो पाये। अभ्यास करते समय उन्हें पता चला कि हिन्दू योगियों की कृपा से उन्हें प्रत्यक्ष ज्ञान की प्राप्ति होगी। इसलिए नलिनीकांत मद्रास से लौटकर हिन्दूयोगियों की खोज में लग गये।
साधक जीवन
तंत्र साधना
एक दिन रात को नलिनीकांत ने देखा, उनकी शय्या के पास एक ज्योतिर्मय महापुरुष खड़े होकर कह रहे हें - "बत्स ! अपना यह मंत्र ग्रहण करो"। इतना कहकर उन्होंने नलिनीकांत को बिल्वपत्र पर लिखित एकाख्यर मंत्र प्रदान किया और उसके बाद पलभर में ही गायब हो गये। उसके बाद नलिनीकांत काफी खोज की, फिर भी कोई भी उन्हें उस मंत्र का रहस्य नहीं समझा पाया। उस समय बहुत ही निरुत्चायहित होकर नलिनीकांत ने आत्म हत्या करने का संकल्प किया और उसके बाद बह नींद में सो गये। तत्पश्यात एक बृद्ध ब्राहमण ने स्वप्न में कहा, बेटा, तुम्हारे गुरु तारापीठ के बामाक्षेपा हें।
एक दिन रात को नलिनीकांत ने देखा, उनकी शय्या के पास एक ज्योतिर्मय महापुरुष खड़े होकर कह रहे हें - बत्स ! अपना यह मंत्र ग्रहण करो। इतना कहकर उन्होंने नलिनीकांत को बिल्वपत्र पर लिखित एकाख्यर मंत्र प्रदान किया और उसके बाद पलभर में ही गायब हो गये। उसके बाद नलिनीकांत काफी खोज की, फिर भी कोई भी उन्हें उस मंत्र का रहस्य नहीं समझा पाया। उस समय बहुत ही नीरू उत्चाया निरुत्चायहित होकर नलिनीकांत ने आत्म हत्या करने का संकल्प किया और उसके बाद बह नींद में सो गये। तत्पश्यात एक बृद्ध ब्राहमण ने स्वप्न में कहा, बेटा, तुम्हारे गुरु तारापीठ के बामाखेपा हें।
नलिनीकांत बीरभूम जिले के तारापीठ में साधू बामाक्षेपा के पास पहुंचे।Benoy Gopal Ray Religious movements in modern Bengal http://books.google.com/books?id=btYXAAAAIAAJ 26 नवम्बर 2011 (नलिनीकांत साधू बामाक्षेपा के पास पहुंचे) 1965 Visva-Bharati 100 सिद्ध महात्मा बामाक्षेपा ने उन्हें मंत्र की साधन प्रणाली सिखाने का बचन दिया। उनकी कृपा से नलिनीकांत ने देबी तारा को सुधांसूबाला की मूर्ति में दर्शन किया और देवी के साथ बर्तालाप किया। देवी के बार बार दर्शन पाकर भी नलिनीकांत उन्हें स्पर्श करने में असमर्थ रहे। इसका तत्व जानने के लिए बह तंत्रिक्गुरु बामाक्षेपा के उपदेशानुसार संन्यासी गुरु के खोज करने लगे।
ज्ञान साधना
गुरु की खोज करते करते उन्होंने भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण किया और अंत में पुष्कर तीर्थ में स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती के दर्शन पाकर बह उनके चरनाश्रित हुए |Benoy Gopal Ray Religious movements in modern Bengal http://books.google.com/books?id=btYXAAAAIAAJ 26 नवम्बर 2011 (सन्यासी गुरु के खोज) 1965 Visva-Bharati 101 सच्चिदानंद के दर्शन करते ही नलिनीकांत जान पाये की जिन महात्मा ने उन्हें स्वप्न में मंत्र दान किया था, बे ही यही सच्चिदानंद स्वामी है। नलिनीकांत गुरु के पास रहकर उनके आदेश से अनेक श्रमसाध्य कार्य किये। उनकी सेवा से संतुस्ट होकर गुरुदेव ने उन्हें सन्यास की दिक्ष्या दे कर उनका नाम निगमानंद रखा।
योग साधना
सन्यास लेने के बाद तत्व की उपलब्धि के लिए उन्होंने गुरु के आदेश पर चारधामों का भम्रण किया।Swami Nigamananda's visit to Char Dham https://web.archive.org/web/20111003235611/http://orissa.gov.in/e-magazine/Orissareview/june2006/engpdf/13.pdf 3 अक्तूबर 2011 Swami Nigamananda was instructed by his guru Swami Sachidananda to visit all these spiritual centers
(dhamas) to realize the deeper significance of the four great sayings of Vedas and Upanishads. Page: 1 (Para - 2nd) परन्तु जिस तत्व की उन्होंने उपलब्धि की, उस तत्व की अंतर में उपलब्धि के लिये बे ज्ञानी गुरु के आदेश से उनसे विदा ले कर योगी गुरु की खोज में निकल पड़े। योगी गुरु की खोज के समय, एक दिन बनों के रमणीय दृश्य को देखकर बह इतने मोहित ओ गये कि दिन ढल जाने कि बाद भी उन्हें पता ही नहीं चल पाया कि शाम हो चुकी है। फलतः उन्हाने बस्ती में न लौटकर एक पेड़ के कोटर में रात बिताई | रात बीत जाने का बाद परिब्राजक निगमानंद ने पेड़ के नीचे एक दीर्घकाय तेजस्बी साधू के दर्शन किये और उनके इशारे पर उनका अनुसरण किया। बाद में उस साधुने निगमानंद को अपना परिचय दिया और उन्हें योग शिख्या देने का बचन देकर उन्हें अपनी कुटिया में ठहराया। उस साधू के आश्रम में रहकर स्वामी निगमानंद ने योगसाधन के कौशल सीखे और उनके आदेश से बह योग साधना के लिय लोकालय में लौटे। उनके उन योग शिख्यादाता गुरु का नाम उदासिनाचार्य सुमेरुदास महाराज है।Benoy Gopal Ray Religious movements in modern Bengal http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ 26 दिसम्बर 2011 He found a Yogi guru called "Sumerudasji" (सुमेरु दास)otherwise known as "Koot Hoomi Lal Singh" (कूथ हुमि लाल सिंह) 1965 Visva-Bharati 101 https://web.archive.org/web/20130623063511/http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ 23 जून 2013 liveM. C. Behera Pilgrim centre Parashuram Kund: articulation of Indian society, culture, and economic dimension http://books.google.com/books?id=QU0vAAAAYAAJ 2 मई 2012 Swami Nigamananda 1 जनवरी 1998 Commonwealth Publishers 978-81-7169-503-4 19, 41 https://web.archive.org/web/20130623070510/http://books.google.com/books?id=QU0vAAAAYAAJ 23 जून 2013 live
निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति
निगमानंद हठ योग की साधना के लिए पावना जिला के हरिपुर गांव में रहने लगे। साधना में अनेक बिघ्न पैदा होने के कारण निगमानंद कामाख्या चलें गये और पहेले सविकल्प समाधि प्राप्त की। उसके बाद कामाख्या पहाड़ में निर्विकल्प समाधि प्राप्त की। ऐसा माना जाता हे, निगमानंद निर्विकल्प समाधि में निमग्न होकर में गुरु हूँ - यह स्वरुप-ज्ञान लेकर पुनः बापस आये थे। लेखक दुर्गा चरण महान्ति ने लिखा "में कौन हूँ" यह जानने केलिए स्वामी निगमानंद संसार को त्याग कर बैरागी बने थे और "में गुरु हूँ", यह भाव लेकर वह संसार में लौट आये।
भाव साधना
पूर्णज्ञानी, यह अभिमान ले कर निगमानंद काशी में पहुंचे। बहां पर माँ अर्णपुर्न्ना (काशी नगरी की इष्ट देवी) ने उनके भीतर अपूर्णता-बोध का जागरण कर दिया और कहा, तुमने ब्रहमज्ञान प्राप्त किया हे सही, परन्तु अबर ब्रहमज्ञान, या प्रेम-भक्ति के पथ में जो भगबत ज्ञान है, तुम्हें प्राप्ति नहीं हुई। इसलिए तुम पूर्ण नहीं हो । तत्पचात श्री निगमानंद देव प्रेम शिद्धा गौरीदेवी की कृपा से अबर ब्रहम ज्ञान प्राप्त कर चरम सिद्धि में पहुंचे। प्रेम सिद्धि के बाद स्वामी निगमानंद देव की इष्ट देवी तारा उन्हें प्रतख्य दर्शन देकर कहा तुम्ही सार्वभौम गुरु हो; जगत बासी तुम्हारी संतान है। तुम लोकलय में जाकर अपने शिष्य भक्त को स्वरुप ज्ञान दो। तारादेवी के बाक्य से निगमानंद ने अपने को पूर्ण समझा।
परमहंस पद से अलंकृत
इस बिच बह गुरुदेव को दर्शन के लिए कुम्भ मेले में पहुंचे। बहां उन्होंने सब से पहले अपने गुरु सच्चिदानंद देव को प्रणाम करने के बाद जगदगुरु शंकराचार्य को प्रणाम किया। दुसरे साधुओने उस पर आपति जताई। स्वामी निगमानंद ने उसका सही उत्तर देकर जगदगुरु को संतुष्ट किया।
जब उन्होंने जगदगुरु शंकराचार्य के कुछ सुचिंतित प्रश्नों के सही उत्तर दिये, तो जगदगुरु ने उनके गुरु सच्चिदानंद को निर्देश दिया की उन्हें परमहंस की उपाधि से अलंकृत करें। साधुमंडली की श्रद्धा पूर्ण सम्मति से गुरु सच्चिदानंद देव ने स्वामी निगमानंद को परमहंस की उपाधि दी। उनका पूरा नाम इसी प्रकार से रहा परिब्राजकाचार्य परमहंस श्री मद स्वामी निगमानंद सरस्वती देव।Paramahamsa Prajnanananda My Time With The Master http://books.google.com/books?id=9hrnJd9cRMcC&pg=PA25 2 मई 2012 Paramahansa Swami Nigamananda 1 दिसम्बर 2005 Sai Towers Publishing 978-81-7899-055-2 25– https://web.archive.org/web/20130623055222/http://books.google.com/books?id=9hrnJd9cRMcC&pg=PA25 23 जून 2013 live
कर्म
thumb|right|144px|स्वामी निगमानंद प्रकाशित सनातन धर्म मुख पत्र आर्य दर्पण
देश बासियों का मनोभाव बदल कर उन्हें प्रवृति से निवृति मार्ग में लौटाने के लिए श्री निगमानंद ने योगी गुरु, ज्ञानी गुरु, ब्रहमचर्य साधन, तांत्रिक गुरु और प्रेमिक गुरु आदि ग्रंथो का प्रणयन किया और सनातन धर्म के मुख पत्र के रूप में आर्य दर्पण नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया।Benoy Gopal Ray Religious movements in modern Bengal http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ 2 मई 2012 स्वामी निगमानंद प्रकाशित सनातन धर्म मुख पत्र : आर्य दर्पण 1965 Visva-Bharati 102 https://web.archive.org/web/20130623063511/http://books.google.com/books?id=6eVWAAAAMAAJ 23 जून 2013 live उसके अतिरिक्त सत शिख्या के बिश्तार और सनातन धर्म के उद्देश्य से साल 1912 में जोरहट स्तित (असम) कोकिलामुख में शांति आश्रम (सारस्वत मठ) की प्रतिष्टा की और संघ, सम्मलेन का अनुष्ठान किया।Moni Bagchee Sadguru Nigamananda: a spiritual biography http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 2 मई 2012 स्वामी निगमानंद की भक्त सम्मिलनी 1987 Assam Bangiya Saraswat Math 129 https://web.archive.org/web/20140626180743/http://books.google.com/books?id=nrkcAAAAMAAJ 26 जून 2014 live संघ और सम्मलेन के माध्यम से आदर्श गृहस्थ समाज का गठन, संघ शक्ति की प्रतिष्टा और भाव बिनिमय कराकर जगत बासियों की सेवा करना ही उनका उद्देश्य था। नारायण के ज्ञान से जिव सेवा करने का उपदेश देकर श्री निगमानंद ने शिष्य-भक्तों और जनसाधारण को उदबुद्ध किया। इस प्रकार बहुत ही कम समय के भीतर बंगाल, बिहार, असम और ब्रहमदेश के कुछ खेत्रों में उपनी भावधारा का ब्यापक प्रचार पर उन्होंने असम स्तित मठ छोड़ दिया और बे जीवन के शेष भाग को पुरीधाम में निर्जन बास में (नीलाचल कुटीर में) बिताने लगे। उन्होंने ओडिशा के भक्तों को संघबद्ध करने के उद्देश्य में उपने शुभ जन्मदिन साल 1934 की श्रावण पूर्णिमा को नीलाचल सारस्वत संघ की स्तापना करके उपनी आध्यात्मिक भावधारा का प्रचार करने का निर्देश दिया। आदर्श गृहस्थ जीवन यापन करके संघ शक्ति की प्रतिष्टा करने के साथ साथ उन्होंने शिष्य भक्तों को भाव बिनिमय करने का उपदेश दिया।
दर्शन
इष्ट और गुरु अभिर्ण व एक है
स्वामी निगमानंद ने कहा, इष्ट-देव के स्थान पर उपने गुरुदेव को ध्यान कर सकते हो इसीलिए इष्ट और गुरु अभिर्ण व एक है।
शंकर की मत्त और महाप्रभु गौरांग की पथ
जगदगुरु शंकर की मत्त (ज्ञान) और महाप्रभु गौरांग देव की पथ (प्रेम) यह आदर्श अपनाने केलिए शिष्य भक्तों को आदेश दिया है।
शिक्षा
thumb|right|144px| सदगुरु निगमानंद
जिन्होंने निर्विकल्प समाधि से उत्तीर्ण होकर बापस इस संसार को आये, उन्हें सदगुरु कहा जाता है। केवल वे ही दुसरों पर कृपा करने में समर्थ है।
जो गुरु महापुरुष त्रिगुणमयी माया को पार कर आत्मस्वरूप में प्रतिष्टित रहकर जीव उधार करते हें, वे ही सदगुरु है।
प्रेम भक्ति ही पृथ्वी की श्रेष्ट शक्ति है। इसलिए श्रीगुरु देव के चरणों का आश्रय लेकर भगवत चर्चा करने केलिय शास्त्रों का नीरेश है।
भक्ति समस्त धर्मों का मूल है। भक्ति मार्ग पर चलने से आखरी में ज्ञान की प्राप्ति होती है।
श्री गुरु देव ही मुक्ति दाता और गुरुसेवा ही शिष्यों का एकमात्र परमधर्म है।
सनातन धर्म में सदगुरु और इस्टदेवता अभिन्न है।
सदगुरु अवतार नहीं है, वे युग धर्म के पदर्शित मत और पथ पर शिषों को संचालित करते है।
सदगुरु के निर्देशानुसार कर्म करना ही कर्म योग है।
मनुष्य जीवन का लख्य आनंद की प्राप्ति है, भगवत प्राप्ति होने पर ही उस आनंद की प्राप्ति होती है।
कलियुग में संघ शक्ति ही श्रेष्ट है
महासमाधि
इस तरह पूरीधाम में अवस्थान करके समय वे सामान्य अस्वस्थता के कारण कलकता चले गये। उसके बाद 29 नवम्बर 1935 अग्रहायण शुक्ल चतुर्थी तिथि को उस महानगरी में एक निर्जन कमरे में महासमाधि ली।
इन्हें भी देखें
शंकर
गौरांग
दुर्गाचरण महान्ति
ध्यान दें
बाहरी कड़ियाँ
स्वामी निगमानन्द
नीलाचल सारस्वत संघ, पूरी
आसाम बंगीय सारस्वत मठ, कोकिलामुख, जोरहट
लेख
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