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केरल का इतिहास
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सितंबर 2014
thumb|alt=परशुराम, बसने वालों से घिरा हुआ है, वरुण को समुद्र का हिस्सा बनाने और केरल को प्रकट करने के लिए आज्ञा देता है। |परशुराम, बसने वालों से घिरा हुआ है, वरुण को समुद्र का हिस्सा बनाने और केरल को प्रकट करने के लिए आज्ञा देता है।
केरल भारत का एक दक्षिणी राज्य है जिसके प्रागैतिहासिक मानवों के बारे में कम ही पता है। मुख्यतः चेर शासनकाल से ही उनका इतिहास आरंभ होता है।
Kerala's इतिहास
पौराणिक कथाओं के अनुसार परशुराम ने अपना परशु पानी में फेंका जिसकी वजह से उस आकार की भूमि समुद्र से बाहर निकली और केरल अस्तित्व में आया। यहां 10वीं सदी ईसा पूर्व से मानव बसाव के प्रमाण मिले हैं।
केरल शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में एकमत नहीं है। कहा जाता है कि "चेर - स्थल", 'कीचड' और "अलम-प्रदेश" शब्दों के योग से केरल शब्द बना है। केरल शब्द का एक और अर्थ है : - वह भूभाग जो समुद्र से निकला हो। समुद्र और पर्वत के संगम स्थान को भी केरल कहा जाता है। प्राचीन विदेशी यायावरों ने इस स्थल को 'मलबार' नाम से भी सम्बोधित किया है।
केरल की संस्कृति हज़ारों साल पुरानी है। प्रारंभ में लोग पहाडी इलाकों में रहते थे। केरल के कुछ भागों से प्राचीन प्रस्तर युग के कतिपय खण्डहर प्राप्त हुए हैं। प्राचीन खण्डहरों के अतिरिक्त महाप्रस्तर स्मारिकाएँ (megalithic monuments) भी केरल में मानव जीवन की प्रामाणिक जानकारियाँ देती हैं। ये अधिकतर श्मशान रूप में प्राप्त होती हैं। यहाँ पर प्राचीन महाप्रस्तर काल के अनेक श्मशान-स्थल खोजे गये हैं जिन्हें कुडक्कल्लु (छत्राकार शिलाएँ), तोप्पिक्कल्लु (टोपी नुमा शिलाएँ), कल्मेशा (पत्थर से बनी मेज़), मुनियरा (मुनियों की कोठरी), नन्नङाडि (भस्मकुंभ) आदि नामों से जाना जाता है। इनका काल 500 ईं. पूर्व से 300 तक माना जाता है। अधिकतर महाप्रस्तर युगीन स्मारिकाएँ पहाडी क्षेत्रों से प्राप्त हुई। अतः यह सिद्ध होता है कि केरल में अतिप्राचीन काल से मानव का वास था।
केरल में आवास केन्द्रों के विकास का दूसरा चरण संघमकाल माना जाता है। यही प्राचीन तमिल साहित्य के निर्माण का काल है। संघमकाल सन् 300 ई. से 800 ई तक रहा। इसी काल में भारत के अन्य प्रान्तों से भी आकर लोग केरल में बसने लगे, तथा बौद्ध और जैन धर्मों का प्रचार हुआ। ब्राह्मण आगमन भी इसी काल में हुआ। उन दिनों केरल के विभिन्न क्षेत्रों में ब्राह्मणों की कुल मिलाकर 64 बस्तियाँ थीं। ईसा की पहली शताब्दी तक केरल में ईसाई धर्म भी पहुँच गया था। सन् 345 में कानायि के थॉमस के नेतृत्व में पश्चिम एशिया के सात कबीलों के 400 ईसाई धर्मावलम्बी केरल आकर बसे, जिनसे केरल में ईसाई धर्म प्रचार को बल मिला। यही वही समय था जब केरल का अरबवासियों के साथ समुद्र मार्ग से व्यापार चल रहा था। अतः स्वाभाविक था कि आठवीं ईस्वीं से ही केरलवासी इस्लाम धर्म से परिचित हो गए।
प्राचीन केरल को इतिहासकार तमिल भूभाग का अंग समझते थे। केरल के स्वतंत्र विकास में जो तत्त्व सहायक हुए हैं उनमें मुख्य हैं - निवासियों का प्रकृति प्रेम, आवास केन्द्रों का विकास, उत्पादन केन्द्रों का उदय और भाषायी समृद्धि। जब कृषि और संसाधन का नियंत्रण ज़मीन्दारों के हाथों में आ गया तब केरल में अनेक सामाजिक परिवर्तन हुए। परिणामस्वरूप छोटी रियासतों से लेकर बड़े राज्यों का विकास हुआ।
इस तरह केरल का इतिहास साम्राज्यों और युद्धों का इतिहास है, भाषा और साहित्य के विकास का इतिहास है, विदेशी सेनाओं के आगमन तथा उनके दीर्घकालीन उपनिवेश बन जाने का इतिहास है, जाति-पाँति और शोषण का इतिहास है, शिक्षा में हुई प्रगति और वैज्ञानिक क्षेत्रों में हुई तरक्की का इतिहास है, व्यापारिक प्रगति और सामाजिक नवजागरण और जनतांत्रिक संस्थाओं के आविर्भावों का इतिहास है।
सुविधा की दृष्टि से केरल के इतिहास को प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक कालीन - तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं।
प्राचीन केरल
मध्यकालीन केरल
आधुनिक केरल
सन्दर्भ
श्रेणी:केरल