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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

हिन्दी में शैव काव्य

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संस्कृत स्तोत्रों में वैदिक शतरुद्रि, उत्पलदेव की 'स्तोत्रावली', जगद्धर भट्ट की 'स्तुतिकुसुमांजलि', 'पुष्पदंत' का 'शिवमहिम्न स्तोत्र', रावणकृत 'तांडव स्तोत्र' एवं शंकराचार्य कृत 'शिवानंदलहरी' प्रमुख शैव रचनाएँ हैं। प्रबंधकाव्यों में कालिदासकृत 'कुमारसंभव' भारविकृत 'किरातार्जुनीयम्‌' मंखकरचित 'श्रीकंठचरितम्‌' एवं रत्नाकर प्रणीत 'हरविजय' उल्लेख्य हैं। हिंदी में भी शैवकाव्य की ये स्तोत्रात्मक एवं प्रबंधात्मक पद्धतियाँ चलीं पर इसके अतिरिक्त शिव के स्वरूपैश्वर्य का स्वतंत्र वर्णन, हास्य के आलंबन, शृंगार के उपमान एवं क्रांति और विनाश के प्रतीक के रूप में भी उनका चित्रण पर्याप्त रूप में हुआ है। मिथिला, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान में शैव साधना एवं शैव भाव का विशेष महत्व रहा है। फलत: इन प्रदेशों में शैव काव्य का अखंड सृजन होता रहा। हिंदी साहित्य के आदिकाल में अपभ्रंश और लोकभाषा दोनों में शैव काव्य का प्रचुर प्रणयन हुआ। जैन कवि पुष्पदंत ने अपने 'णायकुमारचरिउ' में शिव द्वारा मदनदहन तथा ब्रह्मा के शिरोच्छेद की कथा का वर्णन किया है। इसके अतिरिक्त 'प्राकृतपैंगलम्‌' में ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ शिव के विराट् स्वरूप का स्वतंत्र रूप से विलक्षण वर्णन उपलब्ध होता है। सिद्ध कवि गुंडरीपा और सरहपा आदि ने भी शैव मत से प्रभावित होकर अनेक पद रचे। नाथपंथ शैवों का ही एक संप्रदाय था अत: गोरख की बानियों में सर्वत्र ही शिव शक्ति के सामरस्य एवं असंख्य कलायुक्त शिव को सहस्रार में ही देखने का संदेश दिया गया है। चौदहवीं शताब्दी में मिथिला के महाकवि विद्यापति ने शताधिक शैव गीतों का सृजन किया जो नचारी के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनके गीतों में शिव के नटराज, अर्धनारीश्वर एवं हरिहर के एकात्म रूप का चित्रण है तथा शिव के प्रति व्यक्त एक भक्त के निश्छल हृदय की सहज भावनाओं का उद्रेक भी है। भक्तिकाल में मिथिला के कृष्णदास, गोविंद ठाकुर तथा हरिदास आदि ने स्वतंत्र रूप से शिवमहिमा एवं उनके ऐश्वर्यप्रतिपादक पदों का निर्माण किया। मिथिलेतर प्रदेशों के तानसेन, नरहरि एवं सेनापति ने भी शिव के प्रति भक्तिभाव से पूर्ण अनेक कवित्त रचे। सूफी कवि जायसी ने शैव मत से प्रभावित होकर पद्मावत में अनेक शैव तत्वों का पतिपादन किया। उन्होंने शिवशक्ति या रसायनवाद के सभी उपकरणों को मुक्त भाव से स्वीकार किया एवं रतनसेन को शिवानुग्रह से ही सिद्धि दिलाई। इसी भाँति कबीर आदि ज्ञानमार्गी संतों पर शैव मत एवं नाथपंथियों का प्रभाव है। उन्होंने निरंजन या शून्य को शिवरूप में ही ग्रहण किया। महाकवि तुलसीदास ने 'विनयपत्रिका' में शिव के प्रति भक्तिभाव से पूर्ण अनेक पदों की रचना की एवं 'पार्वतीमंगल' जैसे स्वतंत्र ग्रंथ में शिवविवाह की कथा को प्रथम बार लोकभाषा में प्रबंधात्मक रूप प्रदान किया। उनके 'रामचरितमानस' के आरंभ में ही शिवकथा कही गई है। मध्य में भी प्रसिद्ध शिवस्तुति है और शिव-उमा-संवाद के रूप में प्रस्तुत कर तुलसी ने रामकथा को शैव परिवेश प्रदान कर किया है। सूरदास ने भी सूरसागर में अंतर्कथा के रूप में शिवजीवन के अनेक प्रसंगों को गीतिप्रबंध का रूप देकर प्रस्तुत किया है। रीतिकालीन कवियों में प्राय: सबने शिव संबंधी काव्यप्रणयन किया जिनमें केशवदास, देव, पद्माकर, भिखारीदास और भूषण प्रमुख हैं। केशव और भिखारी आदि ने अपने लक्षमणग्रंथों के उदाहरण के लिए शिव का जहाँ अनेक स्थलों पर वर्णन किया है वहाँ मिथिला के अग्निप्रसाद सिंह, आनंद, उमानाथ, कुंजनदास, चंदनराम, जयरामदास, महीनाथ ठाकुर, लाल झा एवं हिमकर न स्वतंत्र रूप से शिवसंबंधी पद रचे। इनके अतिरिक्त इस काल में प्रणीत शैव काव्यग्रंथों में दीनदयाल गिरि का 'विश्वनाथ नवरत्न', दलेलसिंह का 'शिवसागर' (दो खंडों में दोहा चौपाई छंदों में रचित प्रबंधकाव्य) तथा बनारसी कवि की 'शिवपच्चीसी' आदि महत्वपूर्ण हैं। प्रबंध काव्यों में पं. गौरीनाथ शर्मा का दोहा, चौपाई छंद में रचित 'शिवपुराण' महाकाव्य अत्यंत उत्कृष्ट है। जयशंकरप्रसादकृत 'कामायनी' में शैवों के प्रत्यभिज्ञा दर्शन का प्रचुर प्रभाव है तथा इसमें शिव के नटराज रूप के अतिरिक्त उनके सृष्टिरक्षक, सृष्टिसंहारक, सृष्टि की मूल शक्ति एवं महायोगी रूप का भी भव्य और उदात्त वर्णन है। इसमें श्रद्धा के सहयोग से इच्छा, क्रिया और ज्ञान सामरस्य कर शाश्वत शिवानंद प्राप्त करने का दिव्य संदेश मानव को दिया गया है। गिरिजादत्त शुक्ल 'गिरिश' कृत 'ताराकवध' एक विशाल शैव महाकाव्य है। राजस्थान के कवि रामानंद तिवारी का 'पार्वती' महाकाव्य शैव काव्यों में एक उत्कृष्ट उपलब्धि है। इसकी कथा पर यद्यपि कुमारसंभव का प्रभाव है तथापि इसमें शिवसमाज, शिवदर्शन, शिवसंस्कृति आदि का विस्तृत वर्णन कर मानव को शिव समाज-निर्माण का संदेश दिया गया है। युगीन भावनाओं एवं राष्ट्रीय परिवेश के आवरण में शिव को तांडव, क्रांति और विध्वंस का प्रतीक मानकर काव्य रचनेवालों में कविवर आरसी, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' नाथूराम 'शंकर', रामकुमार वर्मा, रामधारी सिंह 'दिनकर' एवं सुमित्रानंदन पंत प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त अनूप शर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' आदि अनेक ऐसे उत्कृष्ठ कवि है जिन्होंने अपनी कविताओं में शिव के प्रति भक्तिभाव व्यंजित कर शैव काव्य के भंडार को भरने में योगदान दिया है। इन्हें भी देखें शैव सम्प्रदाय शैव दर्शन श्रेणी:हिन्दी काव्य