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विडंग
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amrutam अमृतमपत्रिका
बायविडंग के नुकसान फायदे क्या हैं?..
बायविडंग किस रोग में लाभकारी है?..
बायविडंग गण्डमाला के लिये-वायविडङ्ग, गुग्गुलु, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे-धीरे लाभ होता है।
चर्म रोगों में इसका आन्तरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। दाद में इसके लेप से लाभ होता है।
मज्जातन्तु के रोग जैसे अगिघात, आक्षेप एवं अपस्मार आदि में लहसुन के साथ दूध में उबालकर देना चाहिये।
पीनस, शिर:शूल तथा अर्धावभेदक में इससे सिद्ध तैल के नस्य से लाभ होता है। शिरःशूल में कपाल पर इसकी मालिश करनी चाहिये।
बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश पर इसका उपयोग लिखा गया है।
बच्चों व बड़ो के पेट के कीड़े बायविडंग खनाए से नष्ट हो जाते हैं।
बायविडंग खून साफ करता है।
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बायविडंग से बनने वाली दवाएं कौनसी हैं..
वायविडङ्ग के नाम तथा गुण–'विडङ्ग (यह शब्द पुल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग दोनों ही में व्यवहृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब वायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं।
वायविडङ्ग-कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्निवर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है ।
अथ विडङ्गस्य नामानि गुणांश्चाह
पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः ।
तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ॥१११॥
विडङ्ग कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ॥११२॥
वायविडङ्ग या विडङ्गः–
विडति भिनत्ति कृमीनिति, विड भेदने।।
अर्थात-जो कृमियों का नाश करता है। प्राय: सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित् लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं, किन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आजकल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं है बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' को उपयोग में लेना चाहिये।
कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही वायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार वायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं हैं और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है।
प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न, अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अत: इसी का व्यवहार औषधिकार्यों में करना चाहिए। चित्रतण्डुलः पर्याय इसी के लिये सार्थक है।
बायविडंग के अन्य नाम…हि०-वायविडङ्ग, भाभिरंग, वाविरंग । ब०-विरंग । म०-बावडिङ्ग । गु०-बावडीङ्ग । क०-वायुविडङ्ग, वायबिलंग। ते०-वायुविडंघमु । ता०-वायुविलंगम । पं०-बबरंग, वाबरंग। मा०-वायबिरंग। सिंहली।
उम्बेलिया, अम्बेलिया। ने०-हिमलचेरी। अ०-विरंज काबुली । फा०-बरंग कावली। अं०-Babreng | ले०-Embelia ribes Burm. f. (एम्बेलिया राइब्स)| Fam. Myrsinaceae (मिर्सिनेसी)।
यह मध्य हिमालय से भारतवर्ष के पहाड़ी भागों में तथा सिलोन से सिंगापुर तक बहुत पाया जाता है।
बायविडंग की झाड़ी-बहुत विस्तार में बढ़ने वाली होती है । छाल-वातरन्ध्रों के कारण खुरदुरी होती है। टहनियाँ-लंबी, पतली, लचीली, गोल एवं लंबे पर्व युक्त होती हैं।
बायविडंग के पत्ते-चर्मवत्, ५ से से.मी. लंबे, दीर्घवृत्ताकार या कुछ भालाकार, तीक्ष्णाग्र, ऊपर से चमकीले एवं अधोतल पर हलके या कुछ रजताभ एवं सूक्ष्म रक्ताभ ग्रन्थियों से युक्त होते हैं।
बायविडंग के फूल-सफेद या किञ्चित् हरियाली लिये फीके पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-५ मि.मी. तक गोलाकार, पकने पर लाल रंग के किन्तु सूखने पर झुरींदार काले रंग के दिखाई पड़ते हैं।
बायविडंग फलों में डण्ठल के साथ पाँच पट्टों का पुष्प पात्र लगा रहता है और अग्र की तरफ नुकीला रहता है।
बायविडंग फल तोड़ने पर चितकबरे लाल रंग के पतले आवरण से युक्त एक-एक बीज निकलता है, जो स्वाद में चरपरा और गरम मसाले के समान सुगन्धित होता है।
चित्रतण्डुलः यह पर्याय इसी चितकबरे वर्ण का द्योतक है।
बायविडंग के रासायनिक संगठन-इसके फलों में एम्बेलिक एसिड (Embelic acid) या एम्बेलिन (Embelin, CHO.) नामक एक सुनहरे पीले रंग का रवेदार पदार्थ २.५% पाया जाता है।
यह जल से अघुलनशील तथा मद्यसार, ईथर, क्लोरोफार्म और बेंझीन में घुलनशील होता है।
क्षारीय घोल में यह घुलकर घोल लाल रंग का हो जाता है। इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में क्रिस्टेम्बिन (Christembine) नामक एक क्षाराभ तथा तैल, उड़नशील तैल, रञ्जक द्रव्य, टॅनिन एवं राल सदृश पदार्थ पाये जाते हैं।
बायविडंग के फायदे, गुण और प्रयोग-यह उत्तम कृमिघ्न, वातानुलोमक, वातहर, दीपन, पाचन, वातनाडी संस्थान के लिये बल्य, रक्त शोधक, आनुलोमिक तथा रसायन है।
रसग्रन्थियों पर बायविडंग का विशेष प्रभाव पड़ता है । इसका उत्सर्ग मूत्र द्वारा होता है जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है।
(१) स्फीतकृमि (Tape-worm) के लिये यह अत्युत्तम औषधि है।
मेलफर्न (Malefern) के समान इससे मरोड़ नहीं होती और अधिक लाभ होता है।
बच्चों को 2 ग्रा. तथा बड़ों को 5 ग्रा. चूर्ण मधु या दही के साथ सुबह खिलाकर ४ घंटे पश्चात्, एरण्ड तैल अथवा कोई विरेचन देना चाहिये।
अथवा कोष्ठ शुद्धि के पश्चात् रात में इसका चूर्ण मढे के साथ देकर दूसरे दिन सुबह विरेचन देना चाहिये ।
बायविडंग के सेवन से मरे हुए कृमि निकल जाते हैं। अन्य कृमियों पर भी इससे लाभ होता है।
बायविडंग का कृमिघ्न गुण एम्बेलिक एसिड के कारण है। इसके लवण मोनियम् एम्बेलेट Ammonium embelate (२००-३५० मि.ग्रा.) का भी उपयोग मधु के साथ अच्छा होता है। इसके पूर्व तथा पश्चात् एरण्ड तैल से विरेचन कराना चाहिये।
(२) बायविडंग यह एक अच्छा रसायन है।
सुश्रुत में एक ‘सर्वोपघातशमनीय' नामक प्रयोग बतलाया है।
नित्य एक महीने तक विडंग के मगज का चूर्ण तथा मुलेठी खाकर ऊपर से ठण्डा जल पीना चाहिये।
पथ्य में बिना नमक, मूंग का आंवले के साथ सिद्ध किया यूष तथा घी और भात औषध पचने पर लें।
बायविडंग के उपयोग से सब प्रकार के अर्श अच्छे होते हैं। ग्रहण शक्ति तथा धारणा शक्ति बढ़ती है।
शरीर के सभी प्रकार के कृमि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ होता है।
बायविडंग के हर साल प्रयोग से मनुष्य निरोग तथा शतायु होता है।
बायविडंग से सब प्रकार के पुराने रोग जैसे अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कुष्ठ, क्षय, श्वास, उपदंश एवं व्रण आदि अच्छे होते हैं तथा हैजा, प्लेग आदि उपसर्गों का भय नहीं रहता। ।
(३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है।
सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है।
इसका ताजा रस शीतल, मूत्रल तथा आनुलोमिक होता है। मात्रा-चूर्ण ४ से ८ ग्रा.
गण्डमाला में अनन्तमूल के साथ इसका क्वाथ पिलाते हैं तथा ठण्डे जल में पीसकर गाँठो पर लेप करते हैं।
दन्तशूल में इसका चूर्ण हींग के साथ दाँत के गड्ढे में रखने से लाभ होता है तथा इसका मञ्जन में व्यवहार करते हैं। इसके मूल की छाल का भी इसमें उपयोग होता है ।
इसके कोमल पत्तों का सोंठ के साथ क्वाथ बनाकर गले की सूजन, मुख के छाले एवं व्रण में कवल कराने से लाभ होता है।
न्यूमोनिया तथा अन्य छाती के विकारों में चावल की माँड़ के साथ इसकी छाल को उबालकर पिलाते हैं तथा छाल पीसकर छाती पर लेप करते हैं।
बायविडंग के फलों को पीसकर मक्खन के साथ छाती पर लगाने से फुफ्फुसावरण शोथ में लाभ होता है तथा शिरःशूल में भी इसी प्रकार कपाल में इसका लेप करते हैं।
विशेष-एक अन्य मिरसीन अफ्रिकाना (Myrsine africana Linn.) के फलों को भी कहा कहीं विडंग कहा जाता है, किन्तु इसमें शास्त्रोक्त गुण नहीं हैं।
बायविडंग या विडङ्ग भेद…सं०-विडङ्गभेद । हि०-वायविडङ्ग भेद, वायविडङ्ग । अवध०-बेबरङ्ग । देहरादून०-वायविरङ्ग, गैया गोंड०-कोपडल्ली। कुरकु०-भरङ्गेली। मु०-आमटी, गोंदली, बार्बटी। ने०-कलय बोगोटी। अं०Basal (बासल)। ले०-E. tsjeriam-cottam A. DC. (ए. त्स्जेरियम्-कोट्टम)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनॅसी)।
यह हिमालय पहाड़ के पूर्व की ओर बङ्गाल तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक कहीं न कहीं पाया जाता है।
इसके वृक्ष-छोटे और बहुत झाड़दार होते हैं। पत्ते कुछ अधिक बड़े होते हैं तथा शिराएँ कुछ मुरचई रोमावरण से युक्त होती है।
फूल-हरियाली लिये सफेद रंग या हरापन युक्त फीके पीले रंग के बहुत छोटे-छोटे आते हैं। फल-छोटे-छोटे गोल होते हैं और लंबाई में महीन धारीदार होते हैं। गुण और प्रयोग–यह वातानुलोमक, कृमिघ्न, अर्शोघ्न, शोथप्रतीकारक और रसायन है। इसका उपयोग विडङ्ग के समान किया जाता है। बाजार में दोनों ही जाति के फल मिले हुये रहते हैं।
वह भी विडङ्ग के समान विशेषरूप से स्फीतकृमि नाशक होता है।
right|thumb|300px|बिडंग के बीज
right|thumb|300px|पुष्पित बिडंग
बिडंग या बाय बिडंग (संस्कृत : वायु बिडंग ; वानस्पतिक नाम : Embelia ribes ) एक औषधीय पादप है। आयुर्वेद में अनेकानेक रोगों की चिकित्सा में यह उपयोगी माना जाता है। होम्योपैथी में भी इसका उपयोग किया जाता है। यह पूरे भारत में पाया जाता है।
यह औषधि पेट के कीड़े मारने में प्रयोग की जाती है।
श्रेणी:औषधीय पादप