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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

दैववाद

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भगवद्गीता के अनुसार, प्रत्येक क्रिया के पाँच कारण होते हैं- अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव। दैव कारण का वह भाग है जो मनुष्य के उद्योग से सबंद्ध नहीं। दैववाद के अनुसार यह अंश क्रिया का संपूर्ण कारण है; मनुष्य भी कर्ता नहीं, करण ही है, हमारा सारा जीवन भाग्यवश व्यतीत होता है। प्रकृतिवाद प्रकृतिनियम को इस भाग्य का विधाता बताता है। विकसित धर्मों में कुछ देव को ईश्वरेच्छा के अर्थ में लेते हैं। प्रकृतिवाद कहता है कि जब सारा विश्व नियमाधीन चल रहा है, तो इसका अति अल्प भाग नियम की उपेक्षा नहीं कर सकता। सेंट आगस्तिन ने कहा कि सर्वज्ञ होने के कारण ईश्वर भविष्य में होनेवाले कर्मों को भी जानता है। परंतु ज्ञान का विषय कोई ऐसा पदार्थ ही हो सकता है जिसका वास्तविक अस्तित्व हो; इसलिए ऐसे कर्म पहले ही ईश्वर की ओर से निर्णीत हो चुके होते हैं। अनुभव बताता है कि हमारी स्वाधीनता परिमित तो है, परंतु हम यह नहीं मान सकते कि हम सर्वथा पराधीन हैं। किसी वस्तु को देखने में ही हमारा मन उपलब्धों को संयुक्त करता है और अपनी स्वाधीनता की घोषणा करता है। नैतिक जीवन का तो आधार ही स्वाधीनता है। अभाव में उत्तरदायित्व के लिए कोई स्थान नहीं। स्वंय धर्म के लिए भी दैववाद कठिनाइयाँ खड़ी कर देता है। यदि हमारा भाग्य पूर्ण रूप से ईश्वर ने निश्चित किया है, तो पुण्य पाप हमारे कर्म ही नहीं; उनका फल हमें क्यों मिलेगा? इस कठिनाई से बचने के लिए कुछ विचारक कहते हैं कि दैव हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों का संस्कार ही है; हमारा भाग्य, हमारा अपना बनाया हुआ है। इन्हें भी देखें देववाद (Deism) बाहरी कड़ियाँ Fatalism vs. Free Will from Project Worldview श्रेणी:भाग्य श्रेणी:दर्शन