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अनेकान्तिक हेतु
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अनेकांतिक हेतु, हेत्वाभास का एक भेद है जिसे सव्यभिचार भी कहते हैं।
अनुमान में हेतु को साध्य की अपेक्षा कम स्थानों पर किंतु साध्य के साथ रहना चाहिए। यदि हेतु ऐसा नहीं है तो वह अनेकांतिक है। इस अवस्था में हेतु या तो साध्य से अलग रहता है, या केवल उस स्थान पर रहता है जहाँ साध्य की सिद्धि करनी है या उस हेतु का कोई दृष्टांत नहीं होता। इसलिए इसके तीन भेद होते हैं :
१. साधारण अनेकांतिक में हेतु साध्य से अन्यत्र भी रहता है; जैसे, पर्वत में आग है क्योंकि बुद्धिगम्य है१ यहाँ बुद्धिगम्यता आग के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी रहती है।
२. असाधारण अनेकांतिक में हेतु केवल उस स्थान पर रहता है जहाँ साध्य की सिद्धि करनी है; जैसे, शब्द नित्य है क्योंकि वह शब्द है। यहाँ शब्द रूप हेतु केवल शब्द में रहता है जहाँ नित्यत्व की सिद्धि इष्ट है।
३. अनुपसंहारी अनेकांतिक में हेतु साध्य के संबंध का कोई दृष्टांत नहीं होता; जैसे, सब अनित्य हैं क्योंकि सब ज्ञेय हैं। यहाँ ज्ञेयता और अनित्यता के परस्पर संबंध का पक्ष के अतिरिक्त कोई दृष्टांत नहीं है क्योंकि यहाँ 'सब' से अलग कुछ भी नहीं है जिसको दृष्टांत रूप में उपस्थित किया जा सके।
सन्दर्भ ग्रन्थ
न्यायसिद्धांत मुक्तावली;
तर्कसंग्रह २-१
श्रेणी:भारतीय दर्शन