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मूँगा (जीव)
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मूँगा (कोरल) शब्द के कई अर्थ हैं - अन्य अर्थों के लिए मूँगा का लेख देखें
मूँगा PillarCoral.jpg 200px स्तंभ मूंगा प्राणी निडारिया Anthozoa एह्रेनबर्ग, 1831 विद्यमान उपवर्ग और कोटि Alcyonaria
Alcyonacea
Helioporacea
Zoantharia
Antipatharia
Corallimorpharia
Scleractinia
Zoanthidea Daly, M., Fautin, D.G., and Cappola, V.A.
2003
March
Systematics of the Hexacorallia (Cnidaria: Anthozoa)
Zoological Journal of the Linnean Society
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419–437
http://www.ingentaconnect.com/content/bsc/zoj/2003/00000139/00000003/art00003
10.1046/j.1096-3642.2003.00084.x
9 मई 2013
https://web.archive.org/web/20131020230215/http://www.ingentaconnect.com/content/bsc/zoj/2003/00000139/00000003/art00003
20 अक्तूबर 2013
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McFadden, C.S., France, S.C., Sanchez, J.A., and Alderslade, P.
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A molecular phylogenetic analysis of the Octocorallia (Cnidaria: Anthozoa) based on mitochondrial protein-coding sequences
Molecular Phylogenentics and Evolution
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413–527
16876445
10.1016/j.ympev.2006.06.010
thumb|right|200px|मूँगे के शरीर के अन्दर का दृश्य
मूँगा, जिसे कोरल और मिरजान भी कहते हैं, एक प्रकार का नन्हा समुद्री जीव है जो लाखों-करोड़ों की संख्या में एक समूह में रहते हैं। मूँगे की बहुत सी क़िस्मों में, यह जीव अपने इर्द-गिर्द एक बहुत ही सख़्त शंख बना लेते है, जिसके अन्दर वह रहता है। जब ऐसे हजारों-लाखों नन्हे और बेहद सख़्त शंख एक दुसरे से चिपक कर समूह में बनते हैं, तो उस समूह की सख़्ती और स्पर्श लगभग पत्थर जैसा होता है। समुद्र में कई स्थानों पर मूंगे की बड़े क्षेत्र पर फैली हुई शृंखलाएं बन जाती हैं, जिन्हें रीफ़ कहा जाता है। किसी भी मूंगे के समूह में हर एक मूंगे और उसके शंख को वैज्ञानिक भाषा में "पॉलिप" कहते हैं।
मूँगा गरम समुद्रों में ही उगता है और अलग-अलग रंगों में मिलता है। लाल और गुलाबी रंगों के मूँगे के क़ीमती पत्थर को पत्थर की ही तरह तराश और चमका कर ज़ेवरों में इस्तेमाल किया जाता है। इनके सब से लोकप्रिय रंग को भी मूँगा (रंग) कहा जाता है।
मूँगे समुद्रतल में रहने वाले एक प्रकार के कृमि हैं जो खोलड़ी की तरह का घर बनाकर एक दूसरे से लगे हुए जमते चले जाते हैं। ये कृमि अचर (न चलने वाले) जीवों में हैं। ज्यों ज्यों इनकी वंशवृद्धि होती जाती है, त्यों त्यों इनका समूहपिंड थूहर के पेड़ के आकार में बढ़ता चला जाता है। सुमात्रा और जावा के आसपास प्रशांत महासागर में समुद्र के तल में ऐसे समूहपिंड हजारों मील तक खड़े मिलते हैं। इनकी वृद्धि बहुत जल्दी जल्दी होती है। इनके समूह एक दूसरे के ऊपर पटते चले जाते हैं जिससे समुद्र की सतह पर एक खासा टापू निकल आता है। ऐसे टापू प्रशांत महासागर में बहुत से हैं जो 'प्रवालद्वीप' कहलाते हैं।
मूँगे की केवल गुरिया ही नहीं बनती; छड़ी, कुरसी आदि चीजें भी बनती हैं। आभूषण के रूप में मूँगे का व्यवहार भी मोती के समान बहुत दिनों से है। मोती और मूँगे का नाम प्रायः साथ साथ लिया जाता है। रत्नपरीक्षा की पुस्तकों में मूँगे का भी वर्णन रहता है। साधारणतः मूँगे का दाना जितना ही बड़ा होता है, उतना अधिक उसका मूल्य भी होता है। कवि लोग बहुत पुराने समय से ओठों की उपमा मूँगे से देते आए हैं।
अन्य भाषाओँ में
thumb|left|एक गुलाबी रंग की मूँगे की रीफ़
संस्कृत : प्रवाल, विद्रुम
अंग्रेजी में मूँगे को "कोरल" (coral) कहते हैं
अरबी और फ़ारसी में मूँगे को "मिरजान" (ur مرجان) कहते हैं
तुर्की में मूँगे को "मेरचान" (mercan) कहते हैं
जापानी में मूँगे को "सांगो" (子蘭琉) कहते हैं
अंग्रेजी में "रीफ़" को "reef" और "पॉलिप" को "polyp" लिखा जाता है
मूँगे का शरीर
समुद्रों के किनारों पर बसने वाले मनुष्य हज़ारों साल से मूँगे से परिचित हैं और उन्होंने देखा है के कैसे मूँगे के रीफ़ बिलकुल पौधों की तरह धीरे-धीरे बढ़ते और फैलते हैं। लेकिन रीफ़ों के अन्दर का हर जीव इतना छोटा होता है के वह देखा नहीं जा सकता। इसलिए हमेशा से लोग समझते आए हैं के मूंगा एक तरह का सख़्त समुद्री पौधा है। अठारवी सदी में विलियम हरशॅल ने पहली दफ़ा मूँगे को सूक्ष्मबीन (माइक्रोस्कोप) में देखा और उसकी कोशिकाओं (सॅलों) का रूप-रंग बिलकुल जानवरों की कोशिकाओं जैसा पाया। उन्होंने ने यह भी देखा की जो मूँगे के रीफ़ का हिस्सा सिर्फ आँख के देखने में एक ही सख़्त पौधे की एक टहनी लगती है, वास्तव में सैंकड़ों-हज़ारों नन्हे जीवों का समूह है।The Light of Reason 8 अगस्त 2006 02:00 BBC Four
एक मूँगे के जीव चंद मिलीमीटर बड़ा ही होता है। उसकी एक पतली ख़ाल होती है जिसके अन्दर उसका अवलेह (जॅली) जैसा मास होता है। इस अवलेही मास को "मिसोग्लिआ" कहते हैं। मूँगे का एक मुंह होता है जिसके इर्द-गिर्द नन्हे उँगलियों-जैसे स्पर्शक (टॅन्टॅकल्स) पानी में झूलते रहते हैं। जब भी कोई नन्हा प्राणी या खाने का टुकड़ा इनके नज़दीक आता है, यह उसे पकड़कर मुंह में धकेल देते हैं जहां से वह मूँगे के पेट में चला जाता है। जब यह खाना हज़म हो जाता है, तो जो भी न हज़म होने वाला हिस्सा है, वह इसी मुंह से बाहर पानी के प्रवाह में थूक दिया जाता है।
इन्हें भी देखें
समुद्री जीवविज्ञान
मूँगा (ज़ेवर)
सन्दर्भ
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श्रेणी:समुद्री जीवन
श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना