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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

सुन्दरवती (सिंहासन बत्तीसी)

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पन्द्रहवीं पुतली की कथा इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उज्जैन राज्य की समृद्धि आकाश छूने लगी थी। व्यापारियों का व्यापार अपने देश तक ही सीमित नहीं था, बल्कि दूर के देशों तक फैला हुआ था। उन दिनों एक सेठ हुआ जिसका नाम पन्नालाल था। वह बड़ा ही दयालु तथा परोपकारी था। चारों ओर उसका यश था। वह दीन-दुखियों की सहायता के लिए सतत तैयार रहता था। उसका पुत्र था हीरालाल, जो पिता की तरह ही नेक और अच्छे गुणों वाला था। वह जब विवाह योग्य हुआ, तो पन्नालाल अच्छे रिश्तों की तलाश करने लगा। एक दिन एक ब्राह्मण ने उसे बताया कि समुद्र पार एक नामी व्यापारी है जिसकी कन्या बहुत ही सुशील तथा गुणवती है। पन्नालाल ने फौरन उसे आने-जाने का खर्च देकर कन्या पक्ष वालों के यहाँ रिश्ता पक्का करने के लिए भेजा। कन्या के पिता को रिश्ता पसंद आया और उनकी शादी पक्की कर दी गई। विवाह का दिन जब समीप आया, तो मूसलाधार बारिश होने लगी। नदी-नाले जल से भर गए और द्वीप तक पहुँचने का मार्ग अवरुद्ध हो गया। बहुत लम्बा एक मार्ग था, मगर उससे विवाह की तिथि तक पहुँचना असम्भव था। सेठ पन्नालाल के लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित हुआ। इस स्थिति के लिए वह तैयार नहीं था, इसलिए बेचैन हो गया। उसने सोचा कि शादी की सारी तैयारी कन्या पक्ष वाले कर लेंगे और किसी कारण बारात नहीं पहुँची, तो उसको ताने सुनने पड़ेगे और जगहँसाई होगी। जब कोई हल नहीं सूझा, तो विवाह तय कराने वाले ब्राह्मण ने सुझाव दिया कि वह अपनी समस्या राजा विक्रमादित्य के समक्ष रखे। उनके अस्तबल में पवन वेग से उड़ने वाला रथ है और उसमें प्रयुक्त होने वाले घोड़े हैं। उस रथ पर आठ-दस लोग वर सहित चले जाएँगे और विवाह का कार्य शुरु हो जाएगा। बाकी लोग लम्बे रास्ते से होकर बाद में सम्मिलित हो जाएँगे। सेठ पन्नालाल तुरन्त राजा के पास पहुँचा और अपनी समस्या बताकर हिचकिचाते हुए रथ की माँग की। विक्रम ने मुस्कराकर कहा कि राजा की हर चीज़ प्रजा के हित की रक्षा के लिए होती है और उन्होंने अस्तबल के प्रबन्धक को बुलाकर तत्काल उसे घोड़े सहित वह रथ दिलवा दिया। प्रसन्नता के मारे पन्नालाल को नहीं सूझा कि विक्रम को कैसे धन्यवाद दे। जब वह रथ और घोड़े सहित चला गया, तो विक्रम को चिन्ता हुई कि जिस काम के लिए सेठ ने रथ लिया है, कहीं वह कार्य भीषण वर्षा की वजह से बाधित न हो जाए। उन्होंने माँ काली द्वारा प्रदत्त बेतालों का स्मरण किया और उन्हें सकुशल वर को विवाह स्थल तक ले जाने तथा विवाह सम्पन्न कराने की आज्ञा दी। जब वर वाला रथ पवन वेग से दौड़ने को तैयार हुआ, तो दोनों बेताल छाया की तरह रथ के साथ चल पड़े। यात्रा के मध्य में सेठ ने देखा कि रास्ता कहीं भी नहीं दिख रहा है, चारों ओर पानी ही पानी है तो उसकी चिन्ता बहुत बढ़ गई। उसे सूझ नहीं रहा था क्या किया जाए। तभी अविश्वसनीय घटना घटी। घोड़ों सहित रथ ज़मीन के ऊपर उड़ने लगा। रथ जल के ऊपर ही ऊपर उड़ता हुआ निश्चित दिशा में बढ़ रहा था। दरअसल बेतालों ने उसे थाम रखा था और विवाह स्थल की ओर उड़े जा रहे थे। निश्चित मुहू में सेठ के पुत्र का विवाह सम्पन्न हो गया। कन्या को साथ लेकर जब सेठ पन्नालाल उज्जैन लौटा, तो घर के बदले सीधा राजदरबार गया। विक्रमादित्य ने वर-वधु को आशीर्वाद दिया। सेठ पन्नालाल घोड़े और रथ की प्रशंसा में ही खोया रहा। राजा विक्रमादित्य उसका आशय समझ गए और उन्होंने अश्व तथा रथ उसे उपहार स्वरुप दे दिया। == सिंहासन बत्तीसी की अन्य पुतलियाँ ==