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मणींद्रनाथ बनर्जी
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June 2025
मणींद्रनाथ बनर्जी Manindra Nath Bannerjee.tif शहीद मणींद्रनाथ बनर्जी 13 जनवरी 1909 वाराणसी, उत्तर प्रदेश, ब्रिटिश भारत 20 जून 1934 फतेहगढ़, उत्तर प्रदेश, ब्रिटिश भारत अनशन से मृत्यु भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय सुनयनी देवी डॉ. ताराचंद बनर्जी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य; फतेहगढ़ जेल में अनशन करते हुए शहीदमणींद्रनाथ बनर्जी (মণীন্দ্ৰনাথ ব্যানার্জি; मणींद्रनाथ बनर्जी) (13 जनवरी 1909 – 20 जून 1934) एक भारतीय क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे जो हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़े हुए थे। उनका जन्म वाराणसी (तब बनारस) में एक राष्ट्रवादी बंगाली परिवार में हुआ था। वे क्रांतिकारी राजेंद्र लाहिड़ी से प्रेरित थे, और उन्होंने उनकी फांसी का प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से ब्रिटिश खुफिया अधिकारी जितेन्द्रनाथ बनर्जी की गोली मारकर हत्या का प्रयास किया, जिनकी गवाही काकोरी कांड के मुकदमे में निर्णायक मानी जाती है। इस कार्य के लिए मणींद्रनाथ को दस वर्षों के कठोर कारावास की सजा हुई।http://archive.org/details/dli.scoerat.13938therollofhonour The Roll of Honour Ghosh Kali Charan
प्रारंभिक जीवन
मणींद्रनाथ बनर्जी का जन्म 13 जनवरी 1909 को बनारस (अब वाराणसी) में हुआ था। उनके पिता डॉ. ताराचंद बनर्जी एक प्रसिद्ध होम्योपैथिक चिकित्सक थे और उनकी माता सुनयनी देवी अपने पुत्रों के राष्ट्रवादी कार्यों की समर्थक थीं। उनके दादा हरेप्रसन्न बनर्जी ब्रिटिश प्रशासन में डिप्टी कलेक्टर थे, लेकिन 1899 में इस्तीफ़ा देकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए।https://archive.org/details/dli.bengal.10689.21007
मणींद्रनाथ आठ भाइयों में से एक थे और सभी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए थे। उनके छोटे भाई बसंत कुमार बनर्जी, विभाजन के बाद उत्तराखंड के दिनेशपुर क्षेत्र में बस गए। उनके परिवार का समर्पण बंगाली प्रवासियों के बीच गौरव का कारण बना।https://archive.org/details/dli.bengal.10689.4923
क्रांतिकारी गतिविधियाँ और गिरफ़्तारी
एचएसआरए से जुड़ाव
काकोरी कांड के बाद मणींद्रनाथ हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी उनके प्रेरणास्रोत थे।https://archive.org/details/dli.bengal.10689.21003 ब्रिटिश सरकार द्वारा जिस अधिकारी ने काकोरी केस में गवाही दी थी — जितेन्द्रनाथ बनर्जी — उसे "राय बहादुर" की उपाधि दी गई थी।http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.457892 Jagaran O Bisphoran Ed. 1st Ghosh Kalicharan 1962
जितेन्द्रनाथ बनर्जी पर हमला
13 जनवरी 1928 को अपने 19वें जन्मदिन के दिन मणींद्रनाथ ने बनारस के गोदौलिया चौराहे पर जितेन्द्रनाथ पर तीन गोलियां चलाईं। गोली लगने के बाद वे कोमा में चले गए और लगभग तीन महीने तक अचेत रहे।https://archive.org/details/dli.bengal.10689.17206 गिरफ्तारी के समय मणींद्रनाथ ने कहा — "राजेंद्र लाहिड़ी की फांसी का बदला लो"।
मुकदमा और सजा
उन्हें गैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुए दस वर्षों की कठोर सजा हुई।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.457812
फतेहगढ़ जेल में अनशन
जेल की स्थिति
मणींद्रनाथ को फ़तेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजा गया, जो राजनीतिक बंदियों के लिए बेहद कठोर मानी जाती थी। वहाँ जेलर गंडा सिंह द्वारा भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.354849
जब मन्मथनाथ गुप्त को वहाँ लाया गया, तो उन्होंने मणींद्रनाथ को वहाँ पाकर आश्चर्य और आनंद दोनों अनुभव किया।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.267045
अत्याचार और अनशन
कर्नल होलरॉयड के आने के बाद कैदियों को मांसाहार, पत्राचार, समाचार पत्र आदि से वंचित कर दिया गया। इस अन्याय के विरुद्ध कैदियों ने मई 1934 में अनशन शुरू किया।https://archive.org/details/rememberingourle0000unse बाद में एक समझौता हुआ और कुछ सुविधाएं बहाल हुईं।
लेकिन जब चंद्रमा सिंह को पीटा गया, तो एक और अनशन शुरू हुआ जिसमें मणींद्रनाथ फिर शामिल हुए। उनकी तबीयत बिगड़ने लगी।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.339375
गिरती हुई सेहत
मई 1934 के बाद मणींद्रनाथ को एल्ब्युमिन्यूरिया (गुर्दा रोग का संकेत) और हृदय दुर्बलता हो गई।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.457664 उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया, लेकिन स्थिति लगातार बिगड़ती रही।
20 जून 1934 को यशपाल और मन्मथनाथ गुप्त को उनसे मिलने की अनुमति मिली। वे उन्हें तकिए पर लेटा, आँखों से अंधा और कराहते हुए पाए। उनकी बातों में स्पष्टता थी: "मैं मृत्यु से नहीं डरता, पर अफ़सोस है कि मैं बीमारी से मर रहा हूँ, शहीद की तरह नहीं।"https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.352658
अंतिम क्षण
20 जून को अपराह्न 4:15 बजे, मणींद्रनाथ का निधन हो गया। उनका शरीर परिवार को सौंपा गया, लेकिन अंतिम संस्कार शांतिपूर्वक, बिना सार्वजनिक घोषणा के किया गया। उनकी अस्थियाँ वाराणसी के पांडे घाट में विसर्जित की गईं।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.453419
विरासत
उनकी मृत्यु ने जेल के सभी कैदियों को शोकग्रस्त कर दिया। उन्हें "सुदामा" और "युधिष्ठिर" जैसे उपनामों से याद किया जाता था।https://archive.org/details/bombinbengalrise0000heeh हालाँकि बनारस में कोई स्मारक नहीं बना, लेकिन हाल के वर्षों में फतेहगढ़ जेल में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। रुद्रपुर और उत्तराखंड में उनकी पुण्यतिथि पर कार्यक्रम होते हैं।https://www.livehindustan.com/uttarakhand/pithoragarh/story-revolutionary-manindranath-banerjee-remembered-6666104.html
उनकी मृत्यु को आज भी राजनीतिक बंदियों के संघर्ष और अहिंसक प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.353031/page/n48/mode/thumb
संबंधित लेख
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भगत सिंह
चंद्रशेखर आज़ाद
यशपाल
रमेशचंद्र गुप्त
स्रोत
ग्रंथसूची
दे लाइव्ड डेंजरसली — मनमथनाथ गुप्त
रोल ऑफ ऑनर — कालिचरण घोष, 1960
जागरण ओ विस्फोरन — कालिचरण घोष, 1962
इतिहास: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन — मनमथनाथ गुप्त, 1972
अबिस्मरणीय — गंगानारायण चंद्र
इतिहास ऑफ फ्रीडम मूवमेंट — रमेशचंद्र मजूमदार, खंड 3, 1963