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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

गणेश दामोदर सावरकर

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गणेश दामोदर सावरकर Ganesh Damodar Savarkar.jpg 13 जून 1879 भागुर, बाम्बे प्रेसिडेन्सी yes 1945 3 16 1879 6 13 सांगली, बाम्बे प्रेसिडेन्सी बाबाराव सावरकर भारतीय स्वतंत्रता के क्रान्तिकारी राजनैतिक कैदी (1909-1922; 1933-1937), हिन्दुत्व कार्यकर्ता यशुबाई सावरकर विनायक दामोदर सावरकर (भाई) गणेश दामोदर सावरकर (जून १३, १८७९Som Nath Aggarwal https://books.google.com/books?id=9pBHAAAAMAAJ The Heroes of Cellular Jail Publication Bureau, Punjabi University 1995 978-81-7380-107-5 59 - मार्च १६, १९४५) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण सेनानी थे। वे स्वतंत्र्यवीर सावरकर के बड़े भाई थे। वे 'बाबाराव सावरकर' नाम से उपाख्य हैं। एम॰ जे॰ अकबर के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना ५ मित्रों ने की थी- बी एस मुंजे, लक्ष्मण वासुदेव परांजपे, डॉ० थोलकर, गणेश दामोदर सावरकर, तथा स्वयं हेगडेवार।M. J. Akbar (1985). India: The Siege Within. Penguin Books. ISBN 9780140075762. बचपन सावरकर परिवार मूलतः महाराष्ट्र राज्य के रत्नागिरी जिले के चिपळूण तहसील के गुहागर पेट्या के पालशेत गांव का था। उस क्षेत्र के सेमल (मराठी : सांवर) के पेड़ों के कारण कुछ लोगों को 'सांवरवाड़ीकर' कहा जाने लगा। कालान्तर में 'सांवरवाड़ीकर' से 'सावरकर' हो गया। आगे चलकर काम के सिलसिले में कुछ लोग कोंकण छोड़कर घाट पर बस गए। बालीजी बाजीराव पेशवा के काल में किए गए पराक्रम के कारण पेशवाओं ने नारायण दीक्षित (सावरकर) और उनके मित्र धोपावकर को नासिक जिले के भगूर गांव के पास स्थित राहुरी गांव की जागीर दी। घाट पर बसे सावरकर परिवार के नारायण दीक्षित (सावरकर) से दामोदरपंत सावरकर सातवीं पीढ़ी के वंशज थे। दामोदरपंत की शिक्षा मैट्रिक तक हुई थी। भगूर क्षेत्र में उनके जितना शिक्षित कोई अन्य नहीं होने के कारण उनका विशेष सम्मान था। पुश्तैनी जागीर संभालना और सावकारी उनके व्यवसाय थे। दामोदरपंत सावरकर का विवाह मनोहर परिवार की राधाबाई से हुआ। विवाह के बाद उन्हें दो पुत्र हुए लेकिन वे जीवित नहीं रहे। इसके बाद इस दंपत्ति को तीन पुत्र और एक पुत्री, ऐसी चार संतानें हुईं। १३-जून-१८७९ को गणेश दामोदर सावरकर उर्फ बाबा का जन्म हुआ, २८-मई-१८८३ को विनायक उर्फ तात्या और उसके बाद लगभग तीन-तीन वर्षों के अंतराल पर माई (बाद में माई काले) और नारायण उर्फ बाल सावरकर का जन्म हुआ। बाबाराव का बचपन भगूर गांव में बीता। बचपन से ही बाबाराव बुद्धिमान, अध्ययनशील, संगठनकुशल और निरंतर परिश्रमी थे। साथ ही वे शतरंज, आट्यापाट्या, गिल्ली-डंडा, धनुष-बाण चलाने आदि विभिन्न खेलों में भी निपुण थे। बचपन में बाबा को विभिन्न प्रकार की बीमारियों ने सताया। उसमें २०-२१ दिनों का मियादी बुखार सामान्य बात थी और बाबा को बिच्छू ने भी कई बार (लगभग २०० बार) डंक मारा था। थोड़ा बड़े होने पर पिता दामोदरपंत की देखरेख में बाबाराव तलवार और बंदूक भी उत्तम तरीके से चलाना सीख गए। पिता, मामा और तात्याराव कविता करते थे लेकिन बाबा को कविता में रुचि नहीं थी। पिता को पशु-पक्षियों का शौक होने के कारण उन्होंने घर में गाय-बैल, कुत्ता पाले हुए थे। साथ ही घर में फूलों के पौधे भी बहुत लगाए थे। बाबाराव ने पिता से अनुशासन, अध्ययन और सबके साथ मिलजुल कर रहने के गुण सीखे, तो माता से वे खाना बनाना सीखे। माता के असामयिक निधन के बाद बाबाराव कुछ समय तक अपने घर में स्वयं ही खाना बनाया करते थे। center|thumb|500px|सावरकर बन्धु : नारायण, गणेश, और विनायक , शान्ता, बहन मैना काले और यमुना शिक्षा / अध्ययन घर की परिस्थितियों और परिवार की जिम्मेदारी के कारण बाबाराव की स्कूली शिक्षा मैट्रिक से पहले ही समाप्त हो गई, लेकिन योगविद्या और वैद्यक का शौक होने के कारण उन्होंने इस संबंध में कई पुस्तकों का अध्ययन किया। वे स्वयं कई प्रकार की औषधियां भी तैयार करते थे। फलज्योतिष, शरीर सामुद्रिक, हस्त सामुद्रिक, मंत्रशास्त्र, योग, वेदान्त जैसे शास्त्रों का उन्होंने गहन अध्ययन किया। वे स्वयं अच्छा गाते थे और तबला व सितार बजा सकते थे। उनके संग्रह में इतिहास, राजनीति, शासन, भाषा, सैन्य व्यवहार, धर्म, दर्शन, जीवनी, संगठन शास्त्र, कला आदि कई विषयों की हजारों पुस्तकें थीं, जिनका बाबाराव ने गहरा अध्ययन किया था। ख्रिस्त परिचय अर्थात ख्रिस्ताचे हिंदुत्व 'ख्रिस्ताचे हिंदुत्व' बबाराव द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक है। बाबाराव ने इसमें कहा है कि ‘ईसा मसीह एक तमिल हिंदू थे। साथ ही वे जन्म से विश्वकर्मा ब्राह्मण थे। ईसाई धर्म हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा है‘। यह पुस्तक १९४६ में प्रकाशित हुई थी और २६-२-२०१६ को पुनः प्रकाशित की गई। ‘ऑल इंडिया ट्रू क्रिश्चियन काउंसिल‘ नामक संस्था ने इस पुस्तक के विरुद्ध मुंबई हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर पुस्तक की प्रत्येक प्रति जब्त करने की मांग की है। विवाह माता के असामयिक निधन के बाद १८९६ में बाबाराव का विवाह हुआ। विवाह के बाद उन्होंने अपनी पत्नी का नाम 'यशोदा' रखा। तात्याराव सहित कई लोग उन्हें येसू वाहिनी (भाभी) कहते थे। येसू वाहिनी तात्याराव और नारायणराव की प्रेरणा स्रोत थीं। बाबाराव को दो पुत्र हुए लेकिन दोनों अधिक समय तक जीवित नहीं रह सके। क्रांतिकार्य तात्याराव और उनके मित्रों ने १८९९ के नवंबर महीने में राष्ट्रभक्तसमूह नामक एक गुप्त संस्था की स्थापना की। शुरुआत में बाबाराव को इस संस्था के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। हालांकि बाद में जानकारी मिलने पर बाबा ने इस संस्था के लिए काम शुरू कर दिया। गुप्त संस्था में युवाओं को प्रवेश देने से पहले उनकी मानसिक तैयारी जांचने के लिए १-जनवरी-१९०० को मित्रमेळा नामक संस्था सार्वजनिक रूप से शुरू की गई। बाबाराव मित्रमेळा संस्था के कार्यवाह थे।() Bhāratīya krāntikārī āndolana kā itihāsa Gupta Manmath Nath 1966 Ātmārāma hi मित्रमेळा संस्था के माध्यम से गणेश उत्सव, शिवजयंती सहित अन्य महापुरुषों की जयंतियां मनाना, सार्वजनिक भाषणों का आयोजन करना, कविता और पोवाड़े गाना आदि तरीकों से युवाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य हाथ में लिया गया। बाबाराव ने संस्था के युवाओं को मार्गदर्शन दिलाने के लिए लोकमान्य तिलक सहित कई नेताओं को समय-समय पर नाशिक आमंत्रित किया। बाबा के प्रयासों से नासिक राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र के रूप में पहचाना जाने लगा। १९०४ में मित्रमेळा की गुप्त संस्था के रूप में अभिनव भारत संस्था की स्थापना करने में भी बाबा की प्रमुख भूमिका थी। अभिनव भारत गरम दल के क्रांतिकारियों की संस्था थी। उसमें शामिल लोगों का एकमात्र ध्येय पूर्ण स्वतंत्रता था और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार युवाओं को ही उसमें प्रवेश दिया जाता था। इन दो संस्थाओं के अलावा बाबाराव की पहल पर ही १९०३ में मित्रसमाज नामक छात्र संस्था और १९०५ में आत्मनिष्ठ युवतीसंघ नामक महिला संगठन की स्थापना की गई। ये सभी संस्थाएं अपने-अपने कार्यक्षेत्र में स्वदेशी का प्रचार करती थीं और इनमें से चुनिंदा लोगों को अभिनव भारत से जोड़ा जाता था। २०-जुलाई-१९०५ को बंग-भंग की आधिकारिक घोषणा हुई। इसके बाद विरोध स्वरूप हर जगह विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार - होली और स्वदेशी का प्रचार शुरू हुआ। बाबाराव नासिक से और तात्याराव पुणे से इस आंदोलन का संचालन करते थे। सशस्त्र क्रांति का प्रचार भी गुप्त रूप से शुरू किया गया।https://hindi.news18.com/news/knowledge/know-about-ganesh-savarkar-who-conspired-killing-of-congress-leader-maulana-azad-2938219.html https://web.archive.org/web/20210613101707/https://hindi.news18.com/news/knowledge/know-about-ganesh-savarkar-who-conspired-killing-of-congress-leader-maulana-azad-2938219.html 13 जून 2021 गणेश सावरकर क्या सचमुच मौलाना आज़ाद को मारना चाहते थे?] अभियोग सरकारी तंत्र बाबाराव पर नजर रखे हुए था। इसी बीच बाबाराव मुंबई गए और एक मामूली विवाद में फंस गए। उस आधार पर जांच कर बाबा को २८-फरवरी-१९०९ को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन्हें नासिक ले जाया गया। गहन जांच के बाद बाबा के घर पर कई आपत्तिजनक चीजें मिलने के कारण उन पर तत्कालीन दंड संहिता की धारा १२१ और १२४ अ के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। ०८ जून १९०९ को बाबाराव को काले पानी की सजा और पूरी संपत्ति की जब्ती के साथ ही सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। Sain Pravina Bhim Remembering Our Leaders: Mahadeo Govind Ranade https://books.google.com/books?id=epPiG7IytcUC&pg=PA117 1989 Children's Book Trust 978-81-7011-767-4 इस सजा के सुनाए जाने के कुछ ही समय बाद बाबाराव ने उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की। लेकिन समय के साथ उसका निर्णय भी बाबा के विरुद्ध ही आया और पुरानी सजा बरकरार रखी गई। परिणाम बाबाराव को आजीवन कारावास की सजा होने की खबर लंदन में रह रहे भारतीयों को मिली। तात्याराव और उनके साथी ब्रिटिश सरकार को सबक सिखाने पर विचार कर रहे थे। तभी एक ओर मदनलाल ढींगरा ने बंग-भंग के लिए जिम्मेदार कर्जन वायली की १ जुलाई १९०९ को गोली मारकर हत्या कर दी तो दूसरी ओर, नासिक में अभिनव भारत के सदस्य गुप्त रूप से एकत्र हुए और अनन्त कान्हेरे, अण्णा कर्वे और विनायक देशपांडे ने बाबाराव को सजा दिलाने के लिए जिम्मेदार मुख्य अधिकारी जैक्सन का वध २१ दिसंबर १९०९ को कर दिया। इसके अलावा देशभर में हर माध्यम से इसका विरोध हुआ। अंडमान काले पानी की सजा काटने के लिए १९११ में उन्हें अंडमान भेज दिया गया। अंडमान की सजा अत्यंत कठोर थी। बाबाराव हर दिन मृत्युतुल्य कष्ट सहते थे। इसी बीच तात्याराव को भी काले पानी की सजा हुई और उन्हें भी अंडमान भेज दिया गया। बाबाराव के छोटे भाई नारायणराव ने अपने दोनों बड़े भाइयों की रिहाई के लिए कई लोगों से मिलकर और आवेदन देकर प्रयास जारी रखे। अंततः १९२१ में दोनों सावरकर भाइयों को अंडमान से रिहा किया गया, लेकिन सजा की अवधि पूरी न होने के कारण उन्हें भारत की विभिन्न जेलों में भेजा गया। बाबाराव का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण १९२२ में उनकी सजा समाप्त होने की घोषणा जल्दबाजी में कर दी गई। निधन सजा समाप्त होने के बाद स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद बाबा ने अपना पुराना कार्य नए उत्साह के साथ शुरू किया। उनका लेखन, अध्ययन और प्रकाशन का कार्य भी बढ़ गया। कई युवाओं को प्रोत्साहित कर उन्होंने समझाया कि सशस्त्र क्रांति के बिना कोई विकल्प नहीं है। क्रांतिकारी कार्य निरंतर जारी रखते हुए ही १६-मार्च-१९४५ को बाबाराव सावरकर का सांगली (महाराष्ट्र) में निधन हो गया। स्मारक सांगली शहर के गावभाग सांगली में नदी किनारे एक इमारत में बाबाराव सावरकर का एक स्मारक है। स्मारक में क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर की भव्य पंचधातु से बनी मूर्ति है। इस वास्तु का उद्घाटन तत्कालीन सांसद अटल बिहारी वाजपेयी जी के हाथों हुआ था। शिवभक्त भालजी पेंढारकर इस समिति के पहले अध्यक्ष थे। बाबाराव सावरकर से संबंधित पुस्तकें क्रांतिकारक बाबाराव सावरकर (लेखक दुर्गेश परुळकर) क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर (लेखक द. न. गोखले) त्या तिघी (सावरकर भाइयों की पत्नियों येसूवहिनी (बाई), यमुना (माई) और शांता (ताई) पर आधारित उपन्यास - लेखिका डॉ. शुभा साठे) मुस्लिम नेताओं की हत्या का षड्यंत्र ? सन् 1929 में ब्रिटिश खुफिया विभाग की रिपोर्टों में यह दावा किया गया था कि गणेश दामोदर सावरकर कुछ प्रमुख मुस्लिम नेताओं की हत्या की एक कथित योजना से जुड़े हुए थे। इन रिपोर्टों के अनुसार, यह योजना स्वामी श्रद्धानन्द और प्रकाशक राजपाल की हत्याओं के प्रतिशोध के रूप में देखी जा रही थी। संभावित लक्ष्यों में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मुहम्मद अली जौहर, मुख्तार अहमद अंसारी तथा मुफ़्ती किफायतुल्लाह जैसे नेताओं के नाम बताए गए थे।https://scroll.in/article/873683/the-story-of-rss-co-founder-ganesh-savarkars-failed-plot-to-assassinate-a-prominent-muslim-leader The story of RSS co-founder Ganesh Savarkar’s failed plot to assassinate a prominent Muslim leader Jha Dhirendra K. Scroll.in 1 April 2018 8 May 2026 रिपोर्टों में यह भी उल्लेख था कि गणेश सावरकर ने कथित रूप से हथियारों और विस्फोटकों की व्यवस्था करने का प्रयास किया था, किन्तु योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी। इस कथित षड्यंत्र के संबंध में विस्तृत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और न ही किसी न्यायिक प्रक्रिया में इसे सिद्ध किया गया। साहित्य रचना राष्ट्रमीमांसा व हिंदुस्थानचे राष्ट्रस्वरूप, दुर्गातनय उपनाम से काशी में लिखा गया, १९३४ में प्रकाशित। हिंदुराष्ट्र - पूर्वी-आता-पुढे (हिन्दू राष्ट्र : पूरब, अब आगे) शिवरायांची आग्ऱ्यावरील गरुडझेप (शिवराय की आगरा से गरुड़-छलांग) वीरा-रत्‍न-मंजुषा ख्रिस्तपरिचय अर्थात ख्रिस्ताचे हिंदुत्व (ईसा का परिचय, अर्थात ईसा का हिन्दुत्व) धर्म कशाला हवा ? (धर्म की आवश्यकता क्यों?) मोपल्यांचे बंड (मोपला विद्रोह)https://books.google.com.au/books?id=HZSUZYStfmIC&newbks=0&printsec=frontcover&dq=%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A5%87%E0%A4%B6+%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0&q=%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A5%87%E0%A4%B6+%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%B0+%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0&hl=en&redir_esc=y Hindī upanyāsa kośa: 1917-1936 Gopāla 1968 Grantha Niketana hi वीर बैरागी, (मूल हिंदी भाषा की पुस्तक से अनूदित) पत्रलेखन १८५७चा स्वतंत्र्यसंग्रम (१८५७ का स्वतंत्रता संग्राम) प्रकाशन नेपाळी आंदोलनाचा उपक्रम (नेपाली आंदोलन का उपक्रम) संघटन संजीवनी भयसूचक घंटा स्फुट लेख केसरी (पुणे), लोकमान्य (मुंबई), महाराष्ट्र (नागपुर), सकाळ (मुंबई), आदेश (नागपुर), वंदे भारतम्‌ (मुंबई), मराठा (अंग्रेजी, पुणे), श्रद्धानंद (पुणे), प्रजापक्ष (अकोला), विक्रम (सांगली) आदि समाचार पत्रों में बाबाराव ने समय-समय पर विभिन्न विषयों पर लेख लिखे। इन्हें भी देखें विनायक दामोदर सावरकर अनन्त कान्हेरे बाहरी कड़ियाँ बाबाराव सावरकर सन्दर्भ श्रेणी:भारत के स्वतंत्रता सेनानी