Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

नेपच्यून ट्रोजन

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

नेपच्यून ट्रोजन (अंग्रेज़ी: Neptune trojan) हमारे सौर मंडल में उन क्षुद्रग्रहों या 'लघु-ग्रहों' की एक विशाल आबादी को कहा जाता है, जो वरुण ग्रह के साथ ठीक 1:1 के 'माध्य-गति अनुनाद' में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इसका अर्थ यह है कि इन क्षुद्रग्रहों की सूर्य से औसत दूरी वरुण ग्रह के बिल्कुल बराबर (लगभग 30 खगोलीय इकाई) होती है, और उन्हें भी सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में वरुण के समान ही लगभग 165 पृथ्वी-वर्ष लगते हैं। ये पिंड वरुण की कक्षा के ठीक ऊपर स्थित 'लैग्रेंज बिंदुओं' पर एक अत्यंत स्थिर गतिकीय क्षेत्र में कैद होते हैं। == कक्षीय गतिकी और लैग्रेंज बिंदु (L4 और L5) == भौतिकी और कक्षीय यांत्रिकी के अनुसार, जब एक छोटा पिंड किसी बड़े ग्रह (जैसे वरुण) के साथ सूर्य की परिक्रमा करता है, तो ग्रह की कक्षा में दो ऐसे बिंदु होते हैं जहाँ सूर्य और ग्रह का संयुक्त गुरुत्वाकर्षण बल एक संतुलन बनाता है। इन्हें लैग्रेंज बिंदु कहा जाता है: L4 बिंदु (अग्रणी): यह बिंदु वरुण ग्रह से उसकी कक्षा में ठीक 60° आगे स्थित होता है। यहाँ स्थित क्षुद्रग्रह वरुण के आगे-आगे चलते हैं। L5 बिंदु (अनुगामी): यह बिंदु वरुण ग्रह से कक्षा में ठीक 60° पीछे स्थित होता है। यहाँ स्थित क्षुद्रग्रह वरुण के पीछे चलते हैं। ये दोनों क्षेत्र गुरुत्वाकर्षण के दृष्टिकोण से 'गतिकीय रूप से स्थिर' हैं, जिसके कारण क्षुद्रग्रह अरबों वर्षों तक यहाँ सुरक्षित रूप से परिक्रमा कर सकते हैं और वरुण ग्रह से कभी नहीं टकराते। बृहस्पति ट्रोजनों की तुलना में नेपच्यून ट्रोजनों का पता लगाना बहुत कठिन है क्योंकि वे पृथ्वी से अत्यधिक दूर हैं और बहुत ही धुंधले दिखाई देते हैं। पहले नेपच्यून ट्रोजन, जिसे 2001 QR322 नाम दिया गया, की खोज 2001 में 'डीप एक्लिप्टिक सर्वे' के दौरान की गई थी। यह L4 बिंदु पर स्थित है। 2008 में, खगोलशास्त्री स्कॉट शेपर्ड और चाड ट्रुजिलो ने 2008 LC18 की खोज की, जो L5 बिंदु (वरुण के पीछे) पर खोजा गया इतिहास का पहला ट्रोजन था। L5 क्षेत्र का अध्ययन करना विशेष रूप से कठिन है क्योंकि यह अक्सर हमारी आकाशगंगा (मिल्की वे) के घने तारा-क्षेत्रों के पीछे छिप जाता है। एक अन्य प्रमुख ट्रोजन 2011 HM102 है, जिसे 'न्यू होराइज़न्स' अंतरिक्ष यान के मार्ग के पास खोजा गया था। नेपच्यून ट्रोजनों की उत्पत्ति को लेकर दो मुख्य सिद्धांत हैं: 'सह-निर्माण' और 'पकड़ा जाना'। आधुनिक खगोल विज्ञान के सबसे स्वीकृत 'नाइस मॉडल' के अनुसार, जब प्रारंभिक सौर मंडल में विशाल गैस दानवों (बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण) की कक्षाओं में बदलाव हो रहा था, तो वरुण ग्रह ने सूर्य से दूर बाहर की ओर 'प्रवासन' किया। इस प्रवासन के दौरान, वरुण ग्रह बाहरी 'कुइपर बेल्ट' के आदिम पिंडों के एक घने बादल से गुजरा। इस प्रक्रिया में, वरुण के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण ने इनमें से कई छोटे क्षुद्रग्रहों को हमेशा के लिए अपने L4 और L5 बिंदुओं पर 'कैद' कर लिया। इस सिद्धांत को इस तथ्य से बल मिलता है कि कई नेपच्यून ट्रोजनों की कक्षा का झुकाव बहुत अधिक है। यदि वे वरुण के साथ वहीं बने होते, तो उनकी कक्षाएँ समतल होतीं। उनका उच्च झुकाव सिद्ध करता है कि वे वरुण के प्रवासन के दौरान अराजक गुरुत्वाकर्षण द्वारा पकड़े गए थे। आकार में, कई नेपच्यून ट्रोजन 100 किलोमीटर से अधिक व्यास के हैं। खगोलविदों का अनुमान है कि बड़े नेपच्यून ट्रोजनों की कुल संख्या बृहस्पति ट्रोजनों की तुलना में भी बहुत अधिक हो सकती है। स्पेक्ट्रोस्कोपिक अवलोकनों से पता चला है कि अधिकांश नेपच्यून ट्रोजनों का रंग अत्यधिक लाल होता है, जो 'क्लासिक कुइपर बेल्ट ऑब्जेक्ट्स' के समान है। यह रंग उनकी सतह पर मौजूद कार्बनिक पदार्थों के कारण होता है, जो अरबों वर्षों से तीव्र सौर विकिरण के संपर्क में हैं। == सन्दर्भ == == बाहरी कड़ियाँ == नासा (NASA) - कुइपर बेल्ट और बाह्य सौर मंडल माइनर प्लैनेट सेंटर - नेपच्यून ट्रोजनों की सूची