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विवाहसूक्त
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right|thumb|300px|ऋग्वेद की मन्त्रसंख्या १०.८५, जिसमें विवाहसूक्त भी सम्मिलित है। हिन्दू विवाह में आज भी इसका पाठ किया जाता है।Singh N. 1992 The vivaha (marriage) Samskara as a paradigm for religio-cultural integration in Hinduism https://archive.org/details/journal-for-the-study-of-religion_1992-03_5_1/page/31 Journal for the Study of Religion 5 31–40 24764135 1Vivekananda Swami https://books.google.com/books?id=pJjXAAAAMAAJ Prabuddha Bharata Prabuddha Bharata Press 2005 362, 594 978-81-7823-180-8 Awakened India
विवाहसूक्त ऋग्वेद संहिता के दसवें मंडल का 85वां सूक्त है।वैदिक विवाह परम्परा की सूत्रधार इसमें सूर्य की पुत्री सूर्या और सोम के विवाह की कथासोम और सूर्या के विवाह की कथा है जिसमें अश्विनी कुमार सहयोगी का कार्य करते हैं। इस सूक्त को सोमसूर्या सूक्त भी कहा जाता है। इस मन्त्र की द्रष्टा ऋषिका सावित्री सूर्या हैं।
इस सूक्त में वर एवं वधू के अखण्ड सौभाग्य की कामना एवं प्रार्थना की गयी है। विवाह संस्कार में वधू को सौभाग्यशालिनी परमकल्याणकारिणी तथा मङ्गल प्रदान करने वाली कहा गया है। सोम, सूर्य आदि देवों की स्तुति भी इन सूक्तों के द्वारा की गयी है। यहां स्त्री के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन है। उसे सास-ससुर की सेवा करने का उपदेश दिया गया है। परिवार का हित करना उसका कर्तव्य है। साथ ही स्त्री को गृहस्वामिनी, गृहपत्नी और 'साम्राज्ञी' कहा गया है। अतः स्त्री को परिवार में आदरणीय बताया गया है।
सूर्या के वर्णन को ऋग्वेद में आलङ्कारिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ सूर्य एवं चन्द्र को सूर्या के रथचक्र के रूप में वर्णन किया गया है। सूर्य तो सकल भुवनों का दर्शन करता है और चन्द्रमा, मास, ऋतु एवं सम्वत्सर आदि का निर्माण करता है। सूर्य और चन्द्रमा की स्तुति के द्वारा दीर्घायुष्य की कामना की गयी।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
समाज की प्राचीन और सर्वमान्य रीति विवाह
वेद : विवाहसूक्तम्