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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

एहसान

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इहसान या एहसान (إحسان) एक अरबी इस्तिलाह है जिसका मतलब है "ख़ुबसूरत काम करना", "ख़ुबसूरती", "कमाल" या "अमदगी"। एहसान किसी के बातिनी ईमान को लेने और उसे अमल में ज़ाहिर करने के मुआमला है, मज़हबी अक़ायद से पैदा होने वाली समाजी ज़िम्मेदारी का एहसास। मतलब इस्लाम में, एहसान इबादत में कमाल या फ़ज़ीलत हासिल करने मुस्लिम ज़िम्मेदारी है, इस तरह कि मुसलमान अल्लाह की इबादत इस तरह करने की कोशिश करें गोया वह उसे देख रहे हैं, और अगरचे वह उसे नहीं देख सकते, वह बिलाशबह यक़ीन रखते हैं कि वह उनपर मुसलसल नज़र रखे हुए है। ये तारीफ़ हदीस-ए-जिब्रील से आता है जिसमें हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं: "एहसान ये है कि अल्लाह की इबादत ऐसे करो जैसे तुम उसे देखते हो, और अगर तुम उसे नहीं देख सकते तो बेशक वो तुम्हें देखता है" (रिवायत-ए-बुख़ारी व मुस्लिम)Ayoub 2004 68–69। एक हदीस-ए-नबवी के मुताबिक़, हुज़ूर अकरम भी इरशाद फ़रमाते हैं: "बेशक अल्लाह ने हर चीज़ (और तमाम मख़लूक़ात) पर एहसान (मेहरबानी) का हुक्म दिया है"।muslim 1955a y2017-08-22 ar:الكتب – جامع العلوم والحكم – الحديث السابع عشر إن الله كتب الإحسان على كل شيء- الجزء رقم1 http://library.islamweb.net/newlibrary/display_book.php?idfrom=81&idto=86&bk_no=81&ID=19 dead https://web.archive.org/web/20170822212905/http://library.islamweb.net/newlibrary/display_book.php?idfrom=81&idto=86&bk_no=81&ID=19 2017-08-22 2020-04-22 ar इस्लाम और ईमान के ताल्लुक़ से एहसान इस्लाम के तीन जहतों से एक है: इस्लाम – अल्लाह के सामने रज़ाकाराना सर तस्लीम ख़म करना, जिसका इज़हार इस्लाम के पांच सुतूनों पर अमल करते हैं किया गया है। ईमान - ईमान के छह सुतूनों पर यक़ीन रखने। एहसान - ज़मीन में रास्तबाज़ी की तायनाती में कमाल या फ़ज़ीलत हासिल करना। इसमें दूसरों के फ़ायदे के लिए अच्छे काम करना भी शामिल है, जैसे मज़लूम और कमज़ोर लोगों की मदद करना। इस्लाम (किया करना चाहिए) और ईमान (क्यों करना चाहिए) की ताकीद के बरअक्स, एहसान का तसव्वुर बुनियादी तौर पर नीयत से वाबस्ता है। जो "ख़ुबसूरत काम करता है" वह मुहसिन कहलाता है। आम तौर पर ये ख़्याल किया जाता है कि इंसान सिर्फ़ अल्लाह की मदद और रहनुमाई है ही हक़ीक़ी एहसान हासिल कर सकता है जो हर चीज़ पर हुकूमत करता है। जहान रिवायती तौर पर इस्लामी फ़ुक़हा पर तवज्जो मरकूज़ की है और उलेमाए-दीन ईमान पर, सूफ़ियों ने अपनी तवज्जो एहसान पर मरकूज़ की है।Chittick 2008 9 जो मुहसिन है वो मोमिनों का ज़ीली मजमूआ हैं और जो मोमिन हैं वो मुसलमानों का ज़ीली मजमूआ हैं: साबिक़ा बहस से ये वाज़िह हो जाना चाहिए कि हर मुसलमान मोमिन मर्द या मोमिन औरत नहीं है, बल्कि हर साहिबे ईमान मुसलमान है। मज़ीद बरां, एक मुसलमान जो इस्लाम के तमाम उसूलों पर यक़ीन रखते है ज़रूरी नहीं कि वह एक सालिह, नेक काम करने वाले (मुहसीन) हो, लेकिन एक हक़ीक़ी नेक और सालिह शख़्स मुसलमान और सच्चा ईमान वाला शख़्स है। Ayoub 2004 54 कुछ इस्लामी आलिम एहसान को इस्लाम की अंदरूनी जहत क़रार देते हैं जबकि शरीअत को अक्सर बेरूनी जहत के तौर पर बयान किया जाता है। एहसान इबादत की आला तरीन शक्ल है।Ayoub 2004 54 ये काम और समाजी तआमुल में फ़ज़ीलत है। मिसाल के तौर पर, एहसान में मुस्लिम नमाज़ो और दुआएं के दौरान इख़्लास और वालिदैन, ख़ानदान और अल्लाह का शुक्रगुज़ार होना शामिल है। हवाले जात