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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

कोली समुंद्री लुटेरे

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कोली जाती की सबसे ज्यादा आबादी गुजरात में रहती है और गुजरात का काठियावाड़ हमेशा से ही कोली जाती के समुद्री लुटेरों के लिए प्रसिद्ध रहा था। ब्रिटिश सरकार के अस्थिर काल में, काठियावाड़ के तटों पर कोली जाती के समुंद्री लुटेरों का बहुत ज्यादा आतंक था, जो यहां से गुजरने वाले समुंद्री जहाजों से कर लिया करते थे अगर कोई भी जहाज कर देने से इनकार करता था तो उस जहाज को कोली समुंद्री लुटेरे लूट लेते थे। दक्षिणी तट पर प्रमुख समुद्री डाकू शियाल गोत्र के कोली और बारिया गोत्र के कोली थे, जबकि कच्छ की खाड़ी और द्वारका व पोरबंदर के समुद्री क्षेत्र में, प्राचीन काल से ही सभी गोत्रों के कोली समुंद्री जहाजों को लूटते आ रहे थे।Tambs-Lyche Harald https://books.google.com/books?id=5ntuAAAAMAAJ Power, Profit, and Poetry: Traditional Society in Kathiawar, Western India 1996-12-31 Manohar Publishers & Distributors 1996 978-81-7304-176-1 New Delhi, India 134–136 enBarendse Rene J. https://books.google.com/books?id=inClDAAAQBAJ&q=Kathiawar+Koli+Pirate The Arabian Seas: The Indian Ocean World of the Seventeenth Century: The Indian Ocean World of the Seventeenth Century 2016-07-08 Routledge 2016 978-1-317-45836-4 New Delhi, India 355–357 en 1326 में, गुजरात के घोघा द्वीप और पीरम द्वीप कोली डाकुओं का गढ़ बने हुए थे और वे अक्सर पास के समुद्र से गुजरने वाले व्यापारियों के जहाजों से जबरजस्ति कर बसूलते, नहीं तो समुंद्री जहाज को लूट लिया करते थे। लेकिन 1340 में कोली समुंद्री डाकुओं और घोघा के राजा मोखडाजी के बीच समुद्र में युद्ध हुआ जिसमें कोली समुंद्री लुटेरों को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन बाद में 1340 में, मोखडाजी को दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने मार डाला जिसके कुछ समय बाद कोली समुद्री लुटेरे फिर से जहाजों को लूटने लगे। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद कोली जाती के समुंद्री लुटेरों ने "मॉर्निंग स्टार" नामक एक बड़े जहाज पर हमला कर कब्ज़ा कर लिया, जो बहुत ही महंगा और कीमती माल से लदा हुआ था।Singhji Virbhadra https://books.google.com/books?id=NYK7ZSpPzkUC&q=Ghogha+Koli The Rajputs of Saurashtra 1994 Popular Prakashan 978-81-7154-546-9 New Delhi, India 39 enPfeffer Georg https://books.google.com/books?id=NEBLAAAAYAAJ Contemporary Society: Concept of tribal society Behera Deepak Kumar 1997 Concept Publishing Company 978-81-7022-640-6 New Delhi, India 199 en 1531 में, गुजरात में काठियावाड़ के दक्षिणी तट पर कोली समुद्री डाकुओं ने पुर्तगाली भारत के शियाल द्वीप पर हमला कर दिया और इस लड़ाई में पुर्तगाली नेवी को हराकर कोली लुटेरों ने शियाल द्वीप पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद चांच द्वीप भी कोली समुद्री डाकुओं का गढ़ बन गया।Campbell James M. https://books.google.com/books?id=FAXGpcEdbfUC Hindu Castes and Tribes of Gujurat 1988 Vintage Books New Delhi, India 245 enWilberforce-Bell Harold https://books.google.com/books?id=JmZDAAAAYAAJ The History of Kathiawad from the Earliest Times 1980 Ajay Book Service New Delhi, India 48 en एक बार फिर से 1734 में, कोली जाती के समुंद्री लुटेरों ने गुजरात के तट पर आतंक मचा दिया। काठियावाड़ में कुर्ला नदी के किनारे स्थित सुल्तानपुर को कोली लुटेरों ने अपना गढ़ बना लिया, उन्होंने ब्रिटिश इंडिया के बड़े जहाजों को लूटना शुरू कर दिया। कुछ धनी कोली जैसे कि कोली जागीरदार, कोली पटेल और कोली ठाकोर और अन्य अमीर कोलियों द्वारा भी कोली समुंद्री लुटेरों को संरक्षण दिया जा रहा था क्योंकि वो कोली लुटेरों का इस्तेमाल अपने दुश्मनों को निपटाने के लिए भी कर लेते थे। जिससे कोली लुटेरे अपनी कुख्यात गतिविधियाँ जारी रखने के लिए प्रेरित थे। ब्रिटिश सरकार ने कैप्टन रेडफोर्ड नन और कैप्टन डैनियल इंचबर्ड के नेतृत्व में ब्रिटिश भारतीय नौसेना भेजी और कोली लुटेरे एवं ब्रिटिश नेवी के बीच लड़ाई हुई जिसमें कोली लुटेरों को हार का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश नेवी ने कोलियों के 5 बड़े सशस्त्र जहाजों पर कब्ज़ा कर लिया और 14 अन्य जहाजों को जला दिया। आगे से रियासतों के जहाजों पर कोली हमला ना करें, रियासतों को बचाने के लिए कप्तान नन ने कोली समुद्री डाकुओं के लगभग 50 छोटे जहाज जला दिए। लगभग छह महीने बाद, कोली लुटेरों के 10 और जहाजों में आग लगा दी गई और ज्यादा बुरी हार के कारण कोली समुंद्री लुटेरे कुछ समय के लिए खामोश हो गए। बॉम्बे कैसल डायरी से रविवार, 21 जनवरी, 1739 को प्राप्त एक पत्र से पता चलता है कि कोलियों ने फिर से ब्रिटिश जहाजों कर हमला करना शुरू कर दिया और कई ब्रिटिश एवं रियासतों के जहाजों पर कब्जा कर लिया था, जिनमें "टाइगर गैलिवेट" जहाज (जो समुंद्री जहाज फारस से लौट रहा था) भी शामिल था, मुख्य जहाज था जिसके कारण ब्रिटिश गवर्मेंट को बहुत नुकसान हुआ था। इसके बाद 1749 में, कोली समुंद्री लुटेरों की कुख्यात गतिविधियाँ एक बार फिर प्रकाश में आईं, जब उन्होंने 60,000 रुपये नकद और इतनी ही कीमत का माल ले जा रहे एक "बंगाल जहाज" (Wengol Ship) पर कब्जा कर लिया जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत को बड़ा झटका लगा। कोली समुद्री डाकुओं से लड़ने के लिए डच भारत (Netherlands) ने दिसंबर, 1750 में ब्रिटिश भारत (British India) से मदद मांगी और ब्रिटिश नेवी एवं डच नेवी ने मिलकर कोली समुंद्री लुटेरों पर आक्रमण कर दिया लेकिन इस लड़ाई में ब्रिटिश कप्तान मारा गया।Saletore Rajaram Narayan https://books.google.com/books?id=1PVMMoChwY4C&q=koli+Pirate Indian Pirates 1978 Concept Publishing Company New Delhi, India 80–88 enSorabshah Manekshah https://books.google.com/books?id=KURuAAAAMAAJ A History of Gujarat: Including a Survey of Its Chief Architectural Monuments and Inscriptions 1980 Longmans, Green & Company Limited New Delhi, India 685 en भावनगर रियासत का तलाजा तट गुजरात के काठियावाड़ के कोली डाकुओं से आक्रांत था। कोली समुंद्री लुटेरों ने अंग्रेजों और भावनगर रियासत के व्यापारिक जहाजों पर कब्ज़ा कर लिया था जिसके बाद भावनगर रियासत के राजा ने ब्रिटिश गवर्मेंट के साथ समझौता किया और कोली लुटेरों को हराने की मदद मांगी। भावनगर रियासत की समुंद्री सेना और ब्रिटिश नौसेना ने 1771 में कोली डाकुओं पर हमला कर उन्हें हरा दिया। लेकिन अखेराजजी की मृत्यु के बाद, कोलियों ने फिर से जहाजों से कर वसूलना शुरू कर दिया और दो ब्रिटिश और एक भावनगर रियासत के जहाज पर कब्ज़ा कर लिया। 1807 में, भावनगर के राजा वखत सिंह ने सौराष्ट्र महासागर में शांति के लिए "वॉकर सेटलमेंट" संधि के तहत कोली डाकुओं को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार से हाथ मिलाया और कोली डाकुओं को फिर से हराया। कोलियों के खिलाफ राजा के साहस के लिए बॉम्बे सरकार ने उन्हें बधाई दी एवं बॉम्बे मे जसन बनाया गया।India) Oriental Institute (Vadodara https://books.google.com/books?id=NookXlAb2koC Journal of the Oriental Institute, M.S. University of Barida, Baroda 1987 Oriental Institute, Maharajah Sayajirao Gaekwad University New Delhi, India 157 enBhadani B. L. https://books.google.com/books?id=JExuAAAAMAAJ Facets of a Marwar Historian: Aspects of India's Social and Economic History : a Volume in Honour of Shri Govind Ag[a]rwal Tripathi Dwijendra 1996 Publication Scheme 978-81-86782-18-7 New Delhi, India 294 en संदर्भ